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Friday, January 30, 2026

एक नयी भोर: आत्मसम्मान की जीत

श्यामली और संजू की शादी को 5 साल बीत चुके थे। बाहर से देखने वालों के लिए यह एक सुखी परिवार था, पर पड़ोसियों को कभी भनक तक न लगी कि जो श्यामली हर सुबह मुस्कुराकर नमस्ते करती है, उसकी रातें किन सिसकियों में गुज़रती हैं।

नन्हीं सृति को अपनी माँ की ख़ामोश पीड़ा का कोई अंदाज़ा नहीं था। उसके लिए तो पिता का इंतज़ार करना एक रोज़ का खेल था। हर रात जब संजू घर लौटता, सृति की नींद उड़ जाती। वह अपने पापा की पीठ पर चढ़ती, उनके साथ खेलती और तभी सोती। सृति कभी-कभी अपनी माँ को परेशान करना भी एक खेल समझ लेती, यह सोचे बिना कि उसकी माँ का दिल पहले से ही कितना लहूलुहान है। श्यामली अपनी बेटी को इतना चाहती थी कि वह अपनी सारी तकलीफें रसोई की दीवारों के पीछे छुपा लेती। वह अकेले में रो लेती, आँखों के घेरे साफ़ कर लेती, लेकिन सृति के सामने आते ही उसके चेहरे पर एक बनावटी मगर प्यारी मुस्कान सज जाती।

हर शुक्रवार की रात संजू का वही संवाद गूँजता जब वो घर बैठे देर रात तक शराब पीता और टीवी पर नेटफ्लिक्स या अमेजन पर हिंसात्मक नाटक देखा करता। फिर श्यामली से जल्दी सृति को लेकर सोने के लिए कह देता। मगर नन्ही बच्ची अपने पिता के इंतज़ार में जागी रहती। श्यामली के सुलाने पर भी नहीं सोती क्योंकि उसे तो उसके पापा चाहिए। फिर वही होता, सृति को जगा हुआ देख संजू श्यामली पर तंज कसता, "सृति बेटा, तेरा बाप अभी ज़िंदा है... तुझे किसी की ज़रूरत नहीं।" इन शब्दों से वह श्यामली के अस्तित्व को हर रोज़ काटता था। जब कभी श्यामली ने हिम्मत जुटाकर संजू को टोकना चाहा या अपनी सफ़ाई देनी चाही, तो संजू का चेहरा भयानक हो जाता। वह अपनी आवाज़ इतनी ऊँची कर लेता कि श्यामली का गला सूख जाता, और कई बार तो अपनी बात कहना उसे भारी पड़ता जब संजू का हाथ उस पर उठ जाता।

थप्पड़ की वह गूँज घर की दीवारों में ही दब जाती। श्यामली ने एक उम्मीद के साथ अपने सास-ससुर से बात करने की कोशिश की थी। उसे लगा था कि शायद वे एक औरत का दर्द समझेंगे। लेकिन उन्होंने भी उसे ही गलत ठहरा दिया। "संजू कमाता है, थका-हारा आता है, तुझे ही थोड़ा चुप रहना चाहिए,"—सास के इन शब्दों ने श्यामली को एहसास दिला दिया कि वह इस घर में बिल्कुल अकेली है। उसके सास-ससुर 'मूक दर्शक' मात्र नहीं थे, बल्कि वे अपनी चुप्पी से संजू के जुल्मों को खाद-पानी दे रहे थे।

लेकिन धैर्य की भी एक सीमा होती है। जब संजू ने सृति के मन में अपनी माँ के प्रति ज़हर घोलना शुरू किया और उसे बेकार माँ साबित करने की कोशिश की, तो श्यामली के भीतर की 'माँ' जाग गई। उसे समझ आ गया कि अगर वह आज नहीं रुकी, तो सृति भी इसी ज़हरीले माहौल को 'नॉर्मल' समझकर बड़ी होगी। इसलिए वह संजू से तलाक लेने का फैसला कर लेती है। 

जब तलाक का केस कोर्ट में पहुँचा, तो संजू और उसका परिवार निश्चिंत था। उन्हें लगा कि बंद कमरे की बातें बाहर कैसे आएँगी? लेकिन जब श्यामली ने तारीखों, घटनाओं और उन खामोश ज़ख्मों के सबूत पेश किए, तो सबका भ्रम टूट गया। मोहल्ले वाले भी स्तब्ध रह गए यह जानकर कि 'शांत' दिखने वाले संजू का असली चेहरा क्या है।

कोर्ट में संजू ने बड़ी शेखी बघारी कि सृति उसके बिना नहीं रह सकती, श्यामली उसका पालन पोषण नहीं कर सकेगी, उसने आज तक एक पैसा भी नहीं कमाया है। कोर्ट श्यामली को एलिमनी के तौर पर कुछ रुपया लेने की सलाह देता है तब श्यामली ने चट्टान की तरह खड़े होकर कहा:

"मुझे संजू से एक पैसा भी नहीं चाहिए। न कोई एलिमनी, न कोई जायदाद। मैं अपनी बेटी को उस घुटन से आज़ाद करना चाहती हूँ जहाँ सम्मान की बलि देकर प्यार का ढोंग किया जाता है। मैं इतनी सक्षम हूँ कि अपनी बेटी का भविष्य अपने दम पर बना सकूँ।"

जज ने श्यामली के साहस और संजू के व्यवहार को देखते हुए सृति की कस्टडी श्यामली को दे दी। कोर्ट से बाहर निकलते समय श्यामली का सिर गर्व से ऊँचा था। उसने सृति का हाथ थामकर एक ऐसी दुनिया की ओर कदम बढ़ाया जहाँ अब कोई डर नहीं था।

डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

सर्वाधिकार सुरक्षित 

Tuesday, January 20, 2026

দুই কবিতা ––অনিতা চক্রবর্তী

 


১. নিবেদন


লেখিকা: অনিতা চক্রবর্তী


রৌদ্র তীব্রতা দিচ্ছে, গরমে কোলা কলি,

এসি না হলে চলছে না, ঝমঝম বৃষ্টি হলে ভালো।

হিসাব করতে হবে প্রকৃতির দান, অবদান,

ক্ষুব্ধ হয়ে ওঠে, অনুতাপ করে।

মগন পরিশ্রমের ফসল ঝরছে জলে,

বিনাশ হয় বড় কাল প্লাবনে।

হাহাকারে ভরে যায়,

মুখে অন্ন জুটাবে কে?

দিতে যেতে হবে ঋণ, অনুদান

প্রকৃতির রোষ থেকে বাঁচো।

করোনা তা তুচ্ছতাচ্ছিল্য, করোনা আক্ষেপ—

বসুমতী কৃপণ নয়, তোমায় জানিবে মান

করো চক্ষু উন্মোচন, হও বলবান, হাল ধর জীবনের।



২. জবাব দিবি না


লেখিকা: অনিতা চক্রবর্তী



ওমা, কি করে বেলা হলো এতদূর,

আর এই তো গেলো খোকা স্কুল।

এই এসে গেলি এরই মধ্যে?

টিফিন খেলি কখন?

পোলাও টুকু ফেলে দিসনি ত?

বোতলও টুকু ফেলে দিসনি তো?

পেয়ারার টুকরোগুলি চিবিয়ে খেয়েছিলি তো?

আর ওই যে জুতো জুড়ো রেখেছিস রেকে 

Uniform hanger-এ টাঙিয়ে।

বেগ টা রাখোনা বাপু যতনে টেবিলে

discipline শিখাতে পেরেছি

hygiene ও handwash এর স্প্রসহীন ফোটাই 

smart বুঝি হয়েই গেছিস! মাকে জবাব দিলিনা,

মানবতা, বিবেক, শ্রদ্ধা এসব কোথায়?

ধর্ম যে শিক্ষা সংস্কৃতিতে ভুলে গেলি,

অবজ্ঞা কখনো গুরুজনে করিয় না,

বিশেষত মা জননী ও জন্মদাতা পিতাকে 

এরা পরম দাতা শিক্ষক। 

Friday, January 16, 2026

दिखावा

  


आर्यन नाम का एक लड़का था। वह बहुत अमीर था और उसे सोशल मीडिया पर मशहूर होने का बहुत शौक था। वह अक्सर शहर में घूम-घूम कर गरीब और बेसहारा लोगों को खाना या कपड़े देता था। पर वह यह सब नेक दिल से नहीं करता था। जब भी वह किसी की मदद करता, तो उसका दोस्त पीछे से मोबाइल से वीडियो बनाता था। आर्यन उन वीडियो को इंटरनेट पर डालता ताकि लोग उसकी तारीफ करें और उसे बहुत सारे 'लाइक्स' मिलें। वह उन गरीब लोगों की मजबूरी का इस्तेमाल अपनी रील बनाने के लिए करता था, जिससे उन लोगों को बहुत शर्मिंदगी महसूस होती थी।

एक दिन आर्यन ने सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे एक बुजुर्ग दादाजी को बैठे देखा। उसने सोचा कि आज इनके साथ रील बनाना बहुत अच्छा रहेगा। उसने तुरंत कैमरा ऑन करवाया और बड़े प्यार का नाटक करते हुए उनके पास जाकर खाना और कंबल रख दिया। आर्यन ने कैमरे की तरफ देखते हुए पूछा, "बाबा, आपके घरवाले कहाँ हैं? क्या किसी ने आपकी मदद नहीं की जो आप यहाँ सड़क पर बैठे हैं?" आर्यन को लगा कि बाबा रोने लगेंगे और उसका वीडियो हिट हो जाएगा।

लेकिन उन बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए आर्यन की आँखों में देखा। उन्होंने कहा, "बेटा, मेरे पास सब कुछ है। मेरे बच्चे बड़े पदों पर हैं और मैं बहुत सुखी हूँ। मैं तो बस यहाँ पुरानी यादों के लिए बैठता हूँ।" फिर उन्होंने आर्यन के कैमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा, "बेटा, असली मदद वह होती है जो चुपचाप की जाए। तुम खाना तो दे रहे हो, लेकिन साथ में मेरी गरीबी का वीडियो बनाकर मेरा सम्मान छीन रहे हो। तुम दुनिया को अपनी अच्छाई दिखा रहे हो, पर क्या तुम्हारा दिल सच में साफ़ है? किसी की लाचारी का तमाशा बनाकर तुम बड़े नहीं बन सकते।" यह सुनकर आर्यन सन्न रह गया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसे खुद पर बहुत शर्म आई। उसने तुरंत कैमरा बंद करवाया और चुपचाप अपना सिर झुकाकर वहाँ से चला गया।

 डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती


Wednesday, January 14, 2026

भाई-दूज



सन् 1970 की बात है। असम की शांत बराक घाटी के एक छोटे से गाँव, कातीराइल, में उत्सव की धीमी आहट सुनाई दे रही थी। मीनू अभी-अभी आं गन से सूख चुके कपड़े समेटकर भीतर लाई थी। उसकी माँ, खिरोदा देवी, ने तुरंत उसे आवाज़ दी और तुलसी के पौधे की जड़ से थोड़ी मिट्टी लाने को कहा। घर के एक कोने में चंदन घिसने की धीमी, सोंधी क्रिया चल रही थी। पीतल की थाली में धान और दूर्वा (दूब घास) करीने से सज चुके थे। आज कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि थी, और कल 'भाई दूज' (यम द्वितीया) का पावन पर्व था। माँ और बेटी इसी मंगल तैयारी में तल्लीन थीं।

वहीं, घर के पुराने, छोटे से खाट पर लेटे उपेन्द्र जी रह-रहकर व्याकुलता से पूछ रहे थे, "अनिल आया क्या रे?"

मीनू ने धीमे से उत्तर दिया, "नहीं, बाबा। छुड़दा (छोटा दादा) अभी कहाँ पहुंचे होंगे। बदरपुर घाट पर रेलगाड़ी शाम छः बजे ही पहुँचती है। फिर वहाँ से कोई बस मिलेगी तो रानी फेरी के रास्ते आएंगे।"

उपेन्द्र जी की व्याकुलता कम नहीं हुई। "अरे! पता नहीं कितना समय लगेगा? अनिल कब आएगा? ओ अनिल की माँ, कहाँ हो तुम?"

खिरोदा देवी ने रसोई से आवाज़ दी, "क्या हुआ जी? क्यों बुला रहे हैं?"

उपेन्द्र जी बोले, "पंचांग में देखो, प्रतिपदा कितने बजे तक है? और हाँ, अनिल जब आए तो उसके लिए 'संदेश' (बंगाली मिठाई) और खीर बनाकर रखना। मेरे अनिल को बहुत पसंद है। न जाने उसे वहाँ ये सब खाने को मिलता भी होगा या नहीं।"

खिरोदा देवी बोलीं, "प्रतिपदा तो कल सुबह नौ बजे तक है। पर ये सब मुझसे क्यों पूछते हैं जी? भाई दूज पर बहन ही भोजन कराती है। मीनू से पूछो, उसने सारी तैयारी की है कि नहीं।"

मीनू ने दोनों को आश्वस्त किया, "आप दोनों इतनी चिंता क्यों करते हैं? जुगल (सबसे छोटा भाई) और मैंने सब कुछ लाकर रख दिया है। छुड़दा की पसंद का ही सब बनेगा। आख़िर पूरे दो साल बाद जो आ रहे हैं! भगवान का शुक्र है कि वे जीवित और सकुशल लौट रहे हैं।"

देखते-ही-देखते शाम पाँच बजते-न-बजते अंधेरा गहराने लगा। तभी, कातीराइल से कुछ दूर सती रेल जंक्शन से आती ट्रेन की लंबी, गम्भीर आवाज़ सुनाई दी। सभी चौंक उठे।

मीनू प्रसन्नता से बोली, "माँ! आज यह ट्रेन बड़ी जल्दी आ गई! लगता है घाट पर यह बीस मिनट में ही लग जाएगी। छुड़दा जल्दी आएंगे!"

खिरोदा देवी का चेहरा खुशी से दमक उठा। उसी समय, आस-पास के घरों से संध्या की दीया-बाती और झाँझ (छोटी-छोटी मंजीरा) बजने की मंगल ध्वनि आने लगी। महिलाओं ने मिलकर 'उलू ध्वनि' (प्रसन्नता प्रकट करने का ध्वनि) की। खिरोदा देवी और बेटी मीनू ने भी जल्दी से शाम की दीया-बाती पूरी की। इसके बाद मीनू ने तुरंत अपने भाइयों के लिए भाई दूज की थाली सजानी शुरू कर दी। आज प्रतिपदा पर वह तुलसी की मिट्टी से टीका करके एक नियम रखेगी, और कल चंदन से भाई दूज का टीका करके यम-द्वार में एक बाधा डालेगी (या 'काँटा गाड़ेगी', स्थानीय रीति अनुसार) ताकि यम उसके भाइयों को छू भी न सके।

इधर, उसका मंझला भाई भी अपने परिवार सहित आ चुका था। नागालैंड के दिमापुर में एक छोटी सी दुकान चलाने वाले मझले भाई की दो संतानें थीं – चार साल की झूमा और गोद भर का रोंटू। मीनू अपनी मंझली भाभी के संग खाने की तैयारी में जुट गई। खिरोदा देवी अपने पोते-पोती को संभालने लगीं।

तभी, अचानक बाहर से "माँ!" की पुकार सुनकर सभी के चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गई। मीनू रसोई में से लालटेन लेकर बाहर निकली। अनिल अभी-अभी घर पहुँचा था। मीनू ने दौड़कर अपने भाई का हाथ पकड़ा और उसे घर के भीतर ले आई।

दो साल बाद बेटे को देखकर खिरोदा देवी की आँखें भर आईं। दुबला-पतला अनिल अब काफ़ी बलिष्ठ हो गया था। सेना की वर्दी में वह बहुत सुंदर लग रहा था और मूंछें भी बड़ी कर ली थीं। हाथों में अपना बिस्तर और ट्रंक पकड़े हुए, वह माँ के पास आकर खड़ा हुआ। उसने अपना सामान रखा, पहले माँ को प्रणाम किया, फिर पिता के चरण स्पर्श किए। इसके बाद मंझले भाई (या मेजदा) और मंझली भाभी के पैर छूकर उनसे भी आशीर्वाद लिया। घर के हर चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। खिरोदा देवी बार-बार अपने आँसू पोंछने लगीं।

फिर, मीनू ने दोनों भाइयों को आसन पर बिठाया, प्रतिपदा का टीका लगाया और धान-दूर्वा से उन्हें शुभकामनाएँ दीं कि दोनों स्वस्थ और सफल रहें। उसने अपने हाथों से भोजन कराने का आग्रह किया।

रात को, सब अनिल के आस-पास बैठ गए और उसके सेना के कैंप की कहानियाँ सुनने लगे। उसने बताया कि कैसे उन्हें अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर बनी चौकी की गश्त के लिए भेजा गया था। वहाँ वे तेज़ बर्फ़बारी और बरसात के दिनों में लगातार गश्त लगाते थे, और रात की ड्यूटी सबसे ज़्यादा उसी की लगा करती थी।

तभी खिरोदा देवी ने उस घटना के बारे में पूछा जिसमें उनकी झूठी गुमशुदगी की रिपोर्ट आ गई थी।

अनिल ने बताया कि एक बार चौकी पार से चीनी सैनिक ज़बरदस्ती घुस आए थे। उन्हें रोक तो लिया गया था, पर थोड़ी-बहुत गोलाबारी भी हुई थी। तभी अनिल को हेडक्वार्टर में रिपोर्ट करने की ज़िम्मेदारी दी गई। अनिल वापस अपनी चौकी पर जाकर वायरलेस रेडियो सेट से संपर्क साधने की कोशिश करने लगा, लेकिन अधिक बर्फ़बारी के कारण चौकी के भीतर से संपर्क करना मुश्किल था। वह मशीन को बाहर ले जाकर संपर्क साधने की कोशिश कर ही रहा था कि धूर्त चीनी सेना के एक जवान ने चौकी की तरफ़ एक ग्रेनेड फेंक दिया, जिससे चौकी ध्वस्त हो गई। चौकी के पास की ढलान काफी दिनों की घनी बर्फबारी से अस्थिर हो चली थी। ग्रेनेड के असर से एक 'एवलांच' (हिमस्खलन) आया, जिसने चौकी के साथ-साथ सभी सैनिकों को भी बहा दिया।

हेडक्वार्टर को इसकी जानकारी चीनी रेडियो से आ रही ख़बरों से पता चली। वे तुरंत अपनी दूसरी टुकड़ी लेकर चौकी के लोकेशन तक पहुँचे और लगभग तीन-चार दिनों की कठिन खोज के बाद सभी घायल भारतीय और चीनी सैनिकों को ढूँढ़ निकाला। अनिल ने बताया कि उसके तीन साथी इसमें शहीद हुए, जबकि घायल चीनी सैनिकों को भारतीय सेना ने गिरफ़्तार कर लिया और कड़ी निगरानी में आर्मी अस्पताल में इलाज के लिए रखा गया।

जब माँ ने पूछा कि उसकी गुमशुदगी क्यों घोषित की गई थी, तो अनिल ने बताया, "ग्रेनेड का हमला इतना तेज़ था कि मैं काफ़ी दूर जाकर गिरा था, और मशीन भी टूट गई थी। मैं बर्फ़ की पाँच फ़िट मोटी परत के नीचे दबा हुआ था। लेकिन किस्मत अच्छी थी कि वहाँ एक बर्फ की गुफा जैसी बनी हुई थी। थोड़ी सी जगह होने के कारण मुझे उस समय अपने आप को बचा पाने के लिए उपाय सोचने का अवसर मिला। बर्फ़ के नीचे दबने के बाद मैंने बहुत संघर्ष किया और अपनी राइफ़ल से एक सुराख कर लिया, जिससे मैं थोड़ा साँस ले पा रहा था। पूरे सात दिन बाद भी जब उन्हें मैं नहीं मिला, तो उन्होंने मुझे गुमशुदा घोषित कर दिया।"

अनिल आगे बोला, "माँ, यह तुम्हारा ही आशीर्वाद था कि जहाँ मैं गिरा था, उधर से कुछ ही दूरी पर पहाड़ी चरवाहों की बस्ती शुरू होती थी। उन्हीं में से दो चरवाहे थे, जिनकी बकरी खो गई थी। उसे ढूँढ़ते हुए जब वे भटक रहे थे, तो उन्हें मेरी बंदूक नोक दिखी। उन्होंने ही दूसरी टुकड़ी को ख़बर दी। माँ, मुझे तो यह सब मालूम न था क्योंकि मैं तो घायल और बेहोश हो चुका था। मेरे दोस्त ने बताया कि कैसे मुझे उन्होंने बर्फ से निकाला और हस्पताल पहुंचाया। पूरे चार हफ़्ते लगे मेरे घाव सूखने में, और तब जाकर मैं खड़ा हो सका। मैं तो छुट्टी पर आना चाहता था, लेकिन कमांडर साहब ने मुझे पूरी तरह से स्वस्थ होने के लिए गुवाहाटी के अस्पताल भेज दिया। जब मैं स्वस्थ हुआ, तो चौकी पर हुए हमले की जाँच (इंक्वायरी) हुई। सारी बातें जब साफ़ हो गईं, तब उन्होंने हमारे चौकी के कमांडर और हम सबकी छुट्टी मंज़ूर की।"

बेटे की साहस भरी कहानी सुनकर खिरोदा देवी का हृदय गर्व से भर उठा। वहीं मीनू भी अपने भाई की सुरक्षा और दीर्घायु की कामना कर रही थी। अगले दिन, सभी ने बड़े उत्साह और प्रेम से भाई दूज का पर्व मनाया।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

अतिथि व्याख्याता 

सरकारी प्रथम दर्जा कॉलेज के आर पूरा बंगलुरू 36

एक शाम और हरसिंगार के प्रेम



अरुणाचल प्रदेश के ख़ूबसूरत पहाड़ी ज़िले पश्चिमी सियांग  का सुंदर शहर अलोंग । यह 90 के दशक का अंतिम समय रहा होगा, और शहर अपनी हरी-भरी ख़ूबसूरती लिए दुनिया के सामने इठला रहा था। अभी-अभी अच्छी बारिश होकर गुज़री थी। हल्की-सी धुंध और भीगी हरियाली तन-मन को जितनी शीतलता दे रही थी, उससे कहीं अधिक एक अजीब-सी कसक पैदा कर रही थी। चंदा अपने क्वार्टर के बरामदे में माँ के साथ छत से टपकते बारिश के पानी को पास रखे एक लोहे के ड्रम में इकट्ठा कर रही थी। इतनी ऊँचाई वाली जगहों पर पानी की आपूर्ति दिन में केवल एक ही बार आती थी, इसलिए घर के अन्य ज़रूरतों के लिए पानी बड़ी मुश्किल से हो पाता था। असम राइफल्स के क्वार्टर में रहने वाले सभी परिवारों का यही एक तरीक़ा था जिससे वे पानी की कमी पूरी करते थे। सभी के घर में बड़े-बड़े, खाली पड़े पेट्रोल के ड्रम थे, जिनमें वे बारिश के दिनों का पानी भरते और उसी से काम चलाते थे।

अगले दिन चंदा की स्कूल से छुट्टी थी। घर के सारे काम हो चुके थे। शाम के समय चंदा माँ के साथ बैठकर एक सफ़ेद कपड़े पर पास रखी एक किताब से देखकर क्रॉस स्टिच की फूलों-पत्तियों की डिज़ाइन बना रही थी। वहीं उसकी माँ क्रोशिए से मेज़ पर रखने के लिए सुंदर-सा मैट बुन रही थीं। पुराने समय में घर की महिलाएँ ही ज़्यादातर साज-सज्जा का सामान स्वयं तैयार किया करती थीं। चंदा अपनी सिलाई बड़े ध्यान से किताब में से देखकर बना रही थी, तभी पास के घर से मोहन पीटी यूनिफ़ॉर्म पहने निकलता है। वह असम राइफल्स में जवान था। उसके पिता भी असम राइफल्स के अस्पताल में नर्सिंग असिस्टेंट का काम करते थे। दोनों परिवार एक ही क्वार्टर परिसर में रहते थे। लगभग हर दिन मोहन की ट्रेनिंग का कोई-न-कोई सत्र चलता ही रहता था, और आज शाम उसकी पीटी थी। जब मोहन चंदा के क्वार्टर के सामने से गुज़रता है तो दोनों की नज़रें आपस में मिलती हैं और दोनों हल्के से मुस्कुरा देते हैं। चंदा सतर्कतापूर्वक कँखियों से अपनी माँ को देखती है, जो सिलाई में पूरी तरह मग्न थीं। चंदा मोहन को दूर तक देखती रहती है। मोहन भी पलट-पलटकर चंदा को देख पीटी के लिए निकल जाता है। चंदा मोहन को बहुत चाहती थी। 15 साल की उस अल्हड़ उम्र में 'चाहत' के गहरे मायने उसे पता नहीं थे, पर मोहन के लिए उसके मन में एक आकर्षण था। वह यह भी नहीं जानती थी कि मोहन भी उसे क्यों चाहता होगा।

चंदा एक भोली और चंचल लड़की थी। वह अभी भी अपनी सहेलियों के साथ स्टापू या किट-किट खेला करती थी। उसे अपने भाई-बहनों के साथ बाँस की तीलियों से अस्थाई गुड़िया-घर बनाकर खेलना बहुत पसंद था, जिसमें तीनों पागलपन की हद तक हँसते थे। चंदा स्कूल के अलावा अपने बालों की चोटी नहीं करती थी, उसे खुले, बिखरे बाल ही रखना पसंद था।

एक शाम स्कूल से लौटते समय चंदा को मोहन दिखाई दिया जो अपनी यूनिट के बाकी जवानों के साथ वर्दी में राइफ़ल लेकर दौड़ लगा रहा था। पीछे-पीछे उसके कमांडर साहब चले आ रहे थे। चंदा रास्ते के एक किनारे खड़ी हो जाती है। मोहन उसके पास से गुज़रते वक़्त बड़ी सावधानी से एक काग़ज़ का टुकड़ा फेंक जाता है। चंदा यह देख नहीं पाती और वहीं खड़ी हो सबको जाते हुए देखती रह जाती है। सभी जवानों की नज़रें एक-एक बार कँखियों से चंदा को घूरकर आगे निकल जाती हैं। जैसे ही चंदा आगे बढ़ती है तो उसके पैरों के नीचे वही काग़ज़ का टुकड़ा पड़ता है। चंदा उसे उठाती है तो पाती है कि मोहन ने उसे एक ख़त लिखा था, जिसमें उसने अपने दिल की बात कह रखी थी। वह ख़त पढ़कर बहुत ख़ुश होती है। घर लौटकर वह माँ से छुपाकर उस चिट्ठी को बिस्तर के नीचे दबा देती है। प्रेम की यह उसकी पहली कड़ी थी और मोहन की ओर से उसे मिला यह प्रेम-पत्र पहला उपहार।

चंदा बहुत ख़ुश थी। स्कूल आते-जाते वह प्रायः मोहन को देखा करती थी। मोहन भी उसे ख़ूब देखता रहता था। दोनों के क्वार्टर आस-पास होने के कारण उन्हें किसी-न-किसी बहाने मिलने का मौक़ा मिल जाता, लेकिन वे कभी भी प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलते थे कि कहीं उनका भेद न खुल जाए। परंतु ईश्वर ने उनके प्रेम मिलन का एक सहज बहाना ढूँढ लिया था। मोहन के क्वार्टर के आँगन में एक बड़ा-सा हरसिंगार  का पेड़ था, जिस पर अब ख़ूब फूल खिलने लगे थे। चंदा के घर के आँगन में फूलों की क्यारियाँ तो थीं, पर शीत ऋतु में खिलने वाला हरसिंगार का फूल नहीं था। इसलिए वह मोहन के घर हरसिंगार के फूल लेने जाया करती थी। मोहन के पिताजी से इजाज़त लेकर वह फूल तोड़ती थी। मोहन के पिता भी अपने सहकर्मी की बेटी को पूजा के फूल चुनने के लिए आया देखकर ख़ुश होते और उसे फूल तोड़ने की अनुमति दे दिया करते थे। यही वह मौक़ा होता था जब मोहन के पिता अनजाने में मोहन को चंदा को फूल तोड़ने में मदद करने के लिए बाग़ में भेज देते थे। चंदा एक-एक कर फूल चुनती और अपनी फूलों की टोकरी में भरती। मोहन भी दूसरे शीत ऋतु के फूलों को, जो ऊँची डालियों पर होते थे, चुनकर उसकी टोकरी में रख दिया करता था। तब दोनों की नजरें मिला करती और मुस्कुराहट में बदल जाती। यह सिलसिला तब तक चलता जब तक मोहन की सुबह की कोई ड्यूटी न होती। बाकी दिनों में मोहन घर पर ज़्यादा समय नहीं रहता था; उसे ट्रेनिंग और अन्य कार्यों के लिए जाना पड़ता था। चंदा उन दिनों उसे न देख उदास हो जाया करती थी।

प्रेम की पराकाष्ठा विरह में ही अधिक दिखाई पड़ती है, और प्रेम का सच्चा रूप भी तभी निखरकर आता है। शायद नियति भी इस नियम को अच्छे से जानती थी, तभी वह प्रेमियों को ज़्यादा देर मिलने नहीं देती। बात कुछ यूं हुई कि असम राइफल्स में हर महीने दो दिन निरीक्षण हुआ करता था, जिसमें बड़े अफ़सरों की पत्नियाँ पूरे कैंपस में जाकर क्वार्टर में यह देखती थीं कि कितनी सफ़ाई और स्वच्छता बरती जा रही है। इसकी घोषणा दो-तीन दिन पहले ही कर दी जाती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। चंदा के माता-पिता और चंदा के दोनों भाई-बहन घर की साफ़-सफ़ाई में लग जाते हैं। अच्छे से एक-एक कोना झाड़कर साफ़ किया जाता है। तभी चंदा के कमरे की सफ़ाई के दौरान उसके बिस्तर के नीचे रखी चिट्ठी पर उसकी माँ की नज़र पड़ जाती है। वह यह चिट्ठी सीधे चंदा के बापू को दे देती है, जिसे पढ़कर उनका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वे चंदा को पास बुलाकर पूछते हैं, मगर चंदा डर के मारे कुछ न कहकर सीधे रोने लगती है। चंदा की माँ उसे ज़ोर-ज़ोर से डाँटने लगती हैं, लेकिन तभी उसके पिता उन्हें रोक देते हैं। जब चंदा की माँ उनके रोकने का कारण पूछती हैं तो वे कहते हैं, "अरे, यहाँ क्वार्टर में आज हर कोई मौजूद है। तुम इतनी ज़ोर-ज़ोर से डाँटोगी तो हमारी बेटी की करतूतों का सबको पता चल जाएगा। चुप रहो। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?" इस पर चंदा की माँ कहती हैं, "मुँह से दूध के दाँत नहीं टूटे कि महारानी को प्रेम सूझ गया है। घर के काम बोलो तो बड़े नख़रे करती है। जानती है न, प्रेम करके ब्याह कर ले जाएगा तो तुझे घर का ही काम करना पड़ेगा। तब न तो तू सुबह नौ-नौ बजे तक सो पाएगी और न ही अपनी मर्ज़ी का चोरी-चोरी कुछ खा पाएगी। ये तो तेरे नख़रे हैं, जो हम ही लोग बर्दाश्त कर रहे हैं। " चंदा की माँ उसे बहुत डाँट सुनाती हैं और चंदा खड़े-खड़े आँसू बहा रही थी।

अगले दिन निरीक्षण हो जाने के बाद चंदा सामने के बरामदे में खड़ी थी। तभी वह देखती है कि मोहन भी निकल कर जा रहा है। उसके कंधे पर अपना बस्ता टंगा था और हाथ में एक बड़ा-सा ट्रंक। चंदा की माँ ने मोहन को व्यंग्यात्मक दृष्टि से देखने के बाद पूछा, तब पता चला कि मोहन का चीन सीमा के पास कहीं तबादला हो गया है और उसे आज ही निकलना है। मोहन का चेहरा गंभीर था। चंदा और मोहन दोनों एक-दूसरे को विरह-भरी दृष्टि से देखते हैं और एक-दूसरे को मन ही मन विदा करते हैं।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

के आर पूरा बंगलुरू 36 

माँ लोक्खी और नारद मुनि: कर्म और कृपा की कहानी



शरद पूर्णिमा की निर्मल रात थी। स्वर्ग लोक में, शांत और सुगंधित हवा बह रही थी। भगवान नारायण (विष्णु) अपनी प्रिय पत्नी लोक्खीदेवी (लक्ष्मी) के साथ बैठे, सुखद बातचीत में लीन थे।

तभी, वीणा की मधुर ध्वनि के साथ देवर्षि नारद मुनि वहाँ पहुँचे। उन्होंने दोनों को प्रणाम किया और माँ लक्ष्मी की ओर देखकर एक सवाल किया: "हे माँ! आप तो तीनों लोकों की माता हैं, पर आपका स्वभाव इतना चंचल क्यों है? आप हमेशा एक जगह से दूसरी जगह विचरण करती रहती हैं।"

नारद ने दुःख भरे स्वर में कहा, "इसी चंचलता के कारण, धरती के लोग (मृत्युलोकवासी) हमेशा गरीबी और कष्टों से घिरे रहते हैं। उनका भाग्य अस्थिर रहता है। वे अन्न के अभाव में कमज़ोर और दुःखी रहते हैं।"


नारद की बात सुनकर माँ लक्ष्मी ने एक गहरी, शांत साँस ली। उन्होंने कहा, "हे ऋषि! मैं किसी से नाराज़ नहीं हूँ। मनुष्यों के दुःख का कारण उनके अपने कर्मों का दोष है। पर आप चिंता न करें, मैं अवश्य इसका उपाय करूँगी।"

फिर, माँ लक्ष्मी ने नारायण से पूछा कि वह कैसे पृथ्वीवासियों के दुःख दूर करें। भगवान हरि ने मुस्कुराते हुए उन्हें उपाय दिया, "मेरी प्यारी लोक्खी! तुम गुरुवार (बृहस्पतिवार) को होने वाले लक्ष्मी व्रत का प्रचार धरती पर करो। जो लोग श्रद्धा और भक्ति से इस व्रत को करेंगे और कथा सुनेंगे, तुम्हारे आशीर्वाद से उनका ऐश्वर्य बढ़ेगा और सारे दुःख-कष्ट दूर हो जाएँगे।"

नारायण के वचन सुनकर, माँ लक्ष्मी बहुत प्रसन्न हुईं और तुरंत धरती लोक की ओर चल पड़ीं। अवंती नगर में लक्ष्मी का आगमन हुआ। 

माँ लक्ष्मी घूमते-घूमते अवंती नगर पहुँची। वहाँ उन्होंने एक बहुत अजीब दृश्य देखा।

कुछ समय पहले, वहाँ धनेश्वर राय नाम का एक महा-धनी व्यक्ति रहता था, जिसका घर धन-धान्य से भरा था और कुबेर के खज़ाने जैसा था। पर धनेश्वर की मृत्यु के बाद, उसके सात बेटों ने अपने धन का घमंड किया और आपस में बंटवारा कर लिया। अहंकार और द्वेष के कारण, माँ लक्ष्मी ने धीरे-धीरे उस परिवार को छोड़ दिया। देखते ही देखते, उनका सोने जैसा संसार उजड़ गया।

धनेश्वर की बूढ़ी पत्नी इस दुःख को सह न पाई और उसने आत्महत्या करने के लिए घने जंगल का रास्ता लिया।

जंगल में, माँ लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का वेश धारण किया और वृद्धा के सामने आईं। उन्होंने वृद्धा को आत्महत्या के महापाप से रोका और उसे गुरुवार का लोक्खी ब्रत करने को कहा। उन्होंने कहा कि हर गुरुवार को सुहागिनें इस व्रत का पालन करे। उन्होंने पूजा की विधि भी बताई। सबसे पहले उस दिन घर की सफाई कर चावल के।  आटे से घर में रंगोली बनाए और पूजा के स्थान में रंगोली बनाकर उसमें कलश रखे। कलश पानी से भरा हो और उसमें पांच आम के पत्ते रखे। फिर धान रखे। एक थाली में चावल रखे। उसने सोना चांदी के गहने और थोड़े से पैसे रखें न हो तो केवल चावल और सिक्के भी चलेंगे। फल वाले नैवेद्य में पांच फल रखे तथा भोग में  नारियल और चिवड़ा गुड के लड्डू रखे। अन्य मिष्ठान रखे। पूरी विधि के साथ माता लक्ष्मी का आह्वान करे। पूजा समाप्ति पर पांच सुहागिनें मिलकर उलू ध्वनि करें। सभी सुहागिनें एक दूसरे को तेल सिंदूर लगाए। माता लक्ष्मी के कलश में भी तेल सिंदूर लगाए। माता लक्ष्मी ने वादा किया कि यह व्रत करने से उसका दुर्भाग्य दूर हो जाएगा और उसका जीवन पहले जैसा हो जाएगा।

जब वृद्धा ने एक क्षण के लिए माँ लक्ष्मी का असली रूप देखा, तो वह आनंद से भर गई। वह तुरंत घर लौटी और अपनी बहुओं को पूरे विधि-विधान से व्रत करने को कहा। बहुओं ने जब एक मन से व्रत किया, तो उनके मन से ईर्ष्या, द्वेष और स्वार्थ दूर हो गए और घर में पुनः शांति और ऐश्वर्य का वास हो गया।

इस व्रत की महिमा इतनी फैली कि एक गरीब, दुःखी और रोगी पति की पत्नी ने भी यह व्रत किया। माँ की कृपा से उसका पति स्वस्थ हो गया और उनके घर में भी ख़ुशियाँ लौट आईं।


एक दिन, जब अवंती नगर में व्रत हो रहा था, एक घमंडी सौदागर (व्यापारी) का बेटा वहाँ आया। उसने व्रतियों को देखकर हँसते हुए कहा, "यह कैसा व्रत है? जो गरीब और अभावग्रस्त होते हैं, वे ही यह सब करते हैं। मेरे पास तो धन की कोई कमी नहीं है।" उसने घमंड में कहा कि भाग्य में न हो तो पूजा से कुछ नहीं मिलता।

सौदागर के अहंकार भरे शब्दों से माँ लक्ष्मी नाराज़ हो गईं और उन्होंने उसे त्याग दिया। कुछ ही समय में, उस सौदागर के सात जहाज़ समुद्र में डूब गए, और घर का सारा धन नष्ट हो गया। वह भीख माँगने पर मजबूर हो गया।

जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उसने रो-रोकर माँ लक्ष्मी का ध्यान किया और उनसे माफ़ी माँगी। सौदागर के पश्चात्ताप से माँ का हृदय पिघल गया। उसने अपने घर आकर फिर से व्रत किया और उसका उजड़ा संसार पहले जैसा हो गया।

इस प्रकार, माँ लक्ष्मी ने यह संदेश दिया कि उनकी कृपा पाने के लिए केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और विनम्रता भी आवश्यक है। उनका व्रत सबसे श्रेष्ठ है और जो इसे एक मन से करते हैं, उनका घर हमेशा धन, संतान और शांति से भरा रहता है।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

सरकारी प्रथम दर्जा कॉलेज के आर पूरा बंगलुरू 36

उम्मीदों का आसमान



बंगलुरू शहर की एक तंग गली के छोटे से घर की खिड़की पर बैठी, कविता की आँखें दूर नीले आसमान में न जाने क्या खोज रही थीं। गहरी सोच के ताने-बाने में उलझी वह किसी अनकहे इंतज़ार में गुम थी। तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई, "कविता, तू यहाँ क्या कर रही है? देख, कितना दिन चढ़ आया है, कब नहाएगी?" माँ के इन शब्दों ने उसकी सोच की डोर तोड़ दी। दिल में एक गहरी उदासी लिए वह उठकर नहाने चली गई।

इस साल गर्मी ने अपना रौद्र रूप दिखाया था। हवा और पानी, मानो जीवन के पर्याय बन गए थे। ठंडे पानी की बौछार उसके तन को तो भिगो रही थी, पर उसके दिल में एक ज्वालामुखी उबल रहा था। भीगे चेहरे पर गर्म आँसुओं की बूँदें टपक रही थीं। हाँ, कविता रो रही थी। क्योंकि जो कुछ उसके साथ हुआ था, उस पर उसे यक़ीन नहीं हो रहा था।

कविता का दिल बहुत साफ़ था और व्यवहार सरल। वह हमेशा सबके लिए अच्छा सोचती थी और कभी किसी से झगड़ा नहीं करती थी। शायद यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गई थी। उसके पति, राजेश, और ससुराल वाले अक्सर उसे ताने मारते थे। "तुमसे कुछ नहीं होगा," "तुम अकेली कहीं आ-जा नहीं सकती," "तुममें हिम्मत नहीं है।" ये बातें सुन-सुनकर उसका दिल टूट गया था। उसे लगने लगा था कि शायद ये सब सच है।

एक दिन, उसे महसूस हुआ कि इस दुनिया में शायद उन्हीं लोगों को सम्मान मिलता है जो झगड़ालू और क्रूर होते हैं। जो लोग तेज़ आवाज़ में बोलते हैं, लोग उनकी बात मानते हैं। लेकिन जो उसके जैसी सीधी-सादी और सच्ची है, उसे कोई नहीं पूछता। उसका अकेलापन और दुःख और भी गहरा होता जा रहा था।

उसने कई बार अपनी बहन से बात की, जिसने उसे अपने लिए एक मज़बूत क़दम उठाने की सलाह दी। लेकिन राजेश और ससुराल वालों के लगातार तानों ने उसे इतना कमज़ोर बना दिया था कि वह खुद को बेकार मानने लगी थी। राजेश ने शादी के पहले दिन से ही ठंडे दिमाग़ से उसके आत्मविश्वास को तोड़ना शुरू कर दिया था। जब तक कविता को इस घृणित चाल का एहसास होता, राजेश अपना काम कर चुका था। अब वह हर बात के लिए खुद को दोषी मानने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि राजेश ने ऐसा क्यों किया।


फिर एक दिन उसके देवर रमेश की शादी हुई और देवरानी आशा घर आई। शुरुआत में सबने आशा के ऊँचे घराने और अंग्रेज़ी बोलने के तरीक़े की तारीफ़ की, लेकिन जल्द ही उसे भी छोटी-छोटी ग़लतियों के लिए ताने मिलने लगे। एक दिन कविता ने देखा कि रमेश अपनी पत्नी आशा को सिर्फ इस बात पर डाँट रहा था कि उसे शराब की गंध बर्दाश्त नहीं थी। दोनों भाई अक्सर शुक्रवार और शनिवार को शराब पीते थे। कविता को याद आया कि कैसे उसने भी एक बार राजेश को समझाने की कोशिश की थी, और राजेश ने उसे एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया था।

लेकिन इस बार कविता ने हार नहीं मानी। उसने आशा के साथ मिलकर सास-ससुर से बात की। ससुर ने सीधे कह दिया कि दोनों भाई शादी से पहले शराब नहीं पीते थे, यह उन्होंने शादी के बाद शुरू किया। इस पर कविता ने हिम्मत कर के कहा कि वे शादी से पहले भी पीते थे। इस पर ससुर ने दोनों बहुओं से कहा, "जब यह बात मालूम थी तो शादी ही क्यों की?" यह बात कविता और आशा को दिल पर लग गई।

गुस्से में कविता ने कहा, "मैंने तो शादी से मना ही किया था, लेकिन राजेश और आपने ही मेरे पिताजी को बार-बार मजबूर किया। और क्या शराब की बोतल मेरे पिताजी ने दहेज में दी थी, जो आप इतने शौक़ से पी रहे हैं?" कविता को उस वक़्त अपने क्रोध का अंदाज़ा नहीं था। ठीक उसी समय राजेश घर आया और यह बात सुनकर आग बबूला हो गया। उसने कविता को सवालों की झड़ी लगाते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया। जब कविता ने अपनी बात रखी, तो राजेश ने उसे एक और थप्पड़ मार दिया।

इस थप्पड़ ने कविता के भीतर की सारी हिम्मत जगा दी। उसने तुरंत कहा, "मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ।" राजेश ने उपहास करते हुए कहा, "तुम्हारे जैसी बेवकूफ़ को कौन रखेगा? और पिताजी के घर जाओगी तो सब तुम्हें ही दोषी मानेंगे।"

कविता ने दृढ़ता से कहा, "मेरी सरलता और सच्चाई ही मेरी सबसे बड़ी ताक़त है। लोग शायद मुझे अभी न समझें, लेकिन लंबे समय में मेरी अच्छाई ही मेरी पहचान बनेगी। और अगर मैं अपने पिताजी के घर जा रही हूँ, तो सही कर रही हूँ, क्योंकि मुझे समझने वाले केवल वही हैं।"

उस दिन के बाद से कविता अपने पिताजी के घर रह रही है। उसने अभी तक राजेश को तलाक़ नहीं दिया है। उसके मन में अभी भी एक उम्मीद बाकी है कि शायद राजेश सुधर जाएगा और वापस लौट आएगा। यही उम्मीद उसकी उदासी का कारण है।



डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

 के आर पूरा बंगलुरू

दीवारों के पार

 


अनामिका की शादी को पाँच साल हो चुके थे। शुरू में उसे लगा कि हर पति-पत्नी में तकरार सामान्य है, लेकिन जल्द ही उसने देखा कि उसका पति राकेश छोटी-सी बात पर भी चीखता, घर की चीजें पटकता, और कभी-कभी हाथ भी उठा देता। यह निरंतर उत्पीड़न अनामिका का आत्मविश्वास तोड़ता रहा। वह भीतर से पूरी तरह टूट गई थी।

रिश्ते सुधारने के उसके हर प्रयास ने इसे और जटिल और तनावपूर्ण बना दिया था।

एक दिन, खाली समय में अखबार पढ़ते हुए उसने एक भयानक खबर पढ़ी कि पति की सच्चाई सामने आने पर पति ने पत्नी को मार डाला। यह खबर पढ़ते ही अनामिका अंदर तक सिहर गई। उसे लगा, यह तो उसकी अपनी कहानी है। उसके मन में सवाल उठने लगे—"क्या राकेश की ज़िंदगी में कोई और औरत है? क्या यह नफ़रत उसी वजह से है?"

एक शाम, जब राकेश ने फिर बिना वजह चिल्लाया और उसे धक्का दिया, तो अनामिका की आँखें भर आईं। उस पल उसे अहसास हुआ कि यह सिर्फ़ गुस्सा नहीं, बल्कि उसे घर से बाहर करने की साज़िश है।

उस रात, वे जमकर लड़े। राकेश अपनी हैवानियत पर उतर आया। किसी तरह खुद को बचाकर अनामिका घर से भागी और अपनी माँ के घर चली आई। बेटी की हालत देख माता-पिता सदमे में थे। रिश्तेदारों ने अलग-अलग सलाहें दीं—पुलिस, कोर्ट, या सुलह। पर किसी ने यह नहीं समझा कि उसका डर कितना गहरा था।

बहुत थक हार कर, जब वह तलाक लेने का फ़ैसला कर रही थी, तभी राकेश अपने माता-पिता के साथ आया और गिड़गिड़ाते हुए माफ़ी माँगी। उसने कसमें खाईं और एक आख़िरी मौका माँगा। समाज के दबाव और अकेलेपन के डर से, अनामिका ने उसे माफ़ कर दिया।


राकेश सचमुच सुधर गया था। अब मारपीट या चिल्लाहट नहीं थी। अनामिका को लगा कि जीवन ने सच में नई करवट ली है।

मगर यह तूफान से पहले की शांति थी।

राकेश अब अक्सर गुस्से वाली बातों पर चुपचाप घर से बाहर चला जाता और शांत व प्रसन्न होकर लौटता। अनामिका को लगा कि वह खुद पर काबू पाना सीख रहा है। लेकिन जल्द ही वह किसी–न–किसी बहाने एक या दो दिन के लिए घर से बाहर रहने लगा।

एक शाम, राकेश ने कहा कि वह दो दिन के लिए ऑफ़िस ट्रिप पर पूना जा रहा है। उसके जाने के बाद, अनामिका अपनी सास के साथ सब्जी मंडी जाती है ।तभी उसकी नज़र एक बिल्डिंग में जाते हुए राकेश और उनकी पड़ोसन पर पड़ी। पड़ोसन, जिसकी तारीफ़ राकेश अक्सर करता था। अनामिका का दिल बैठ गया, पर वह खुद को समझाती रही कि यह शक नहीं है।

रात को, सास-ससुर को खाना देकर जब वह किचन गार्डन में आई, तो उसे पड़ोसन के घर में राकेश दिखाई दिया। वह पड़ोसन से कह रहा था: "मैं उस बेवकूफ़ औरत को बोल आया हूँ कि मैं ऑफ़िस ट्रिप पर हूँ।"

अगले ही पल, दोनों एक दूसरे में लिप्त हो गए।


अनामिका को अपनी आँखों देखी पर विश्वास नहीं हुआ। भावावेश में आकर वह तुरंत पड़ोसन के घर पहुँची और दोनों को रंगे हाथों पकड़ लिया।

सच्चाई सामने आते ही राकेश बौखला गया। शर्मिंदगी और क्रोध में उसने अनामिका को ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया। इसके बाद, राकेश और पड़ोसन दोनों उस पर टूट पड़े। उन्होंने अनामिका को तब तक मारा, जब तक कि उसने दम नहीं तोड़ दिया।

राकेश घबराकर अनामिका के शव को अपने घर के बेडरूम में ले आया। माता-पिता ने समाज की इज़्ज़त बचाने के लिए इस घृणित कृत्य को छुपाने का फ़ैसला किया। उन्होंने कहानी गढ़ी कि रात में घर में चोर-लुटेरे घुसे थे और उन्होंने लुट–पाट मचाने से रोकती अनामिका को खूब बुरी तरह से पीटा। वही सास ससुर कैसे बच गए तो उन्होंने कहा कि बंदूक की नोक पर ये सब हो रहा था। ससुर ने मनगढ़ंत कहानी रचते हुए अपने शरीर पर कुछ चोट के निशान दिखा दिए जो कि हत्या वाली रात को झूठ मूट बनाई गई थी। 


इधर अनामिका के माता-पिता के दबाव पर पुलिस ने जाँच शुरू की। उन्हें पता था कि लूटपाट की कोई घटना नहीं हुई थी। पुलिस का दबाव बढ़ा, पर राकेश अपने झूठ पर अड़ा रहा।

यहीं पर, दीवारों के पार, एक नई गूँज शुरू हुई। अक्सर 

राकेश को अब घर में अनामिका की उपस्थिति महसूस होने लगी। किचन गार्डन से लेकर बेडरूम तक, उसे हर जगह अनामिका का साया दिखता। उसे लगता, जैसे कोई उसे घूर रहा है। उसका झूठ, उसके ही मन में दीवारों की गूँज बनकर लौट रहा था।

एक रात, राकेश को नींद में ही भयानक सदमा लगा। उसे लगा कि अनामिका की आत्मा उसके सामने खड़ी है, और उसकी आँखें आरोप नहीं, बल्कि एक शांत मुस्कान लिए हुए हैं।

आत्मा ने फुसफुसाते हुए कहा: "तुमने सोचा कि मुझे मार देने से यह सच 'दीवारों के पार' नहीं जाएगा? हर दीवार की अपनी गूँज होती है, राकेश। अब तुम्हारा झूठ तुम्हें सोने नहीं देगा।"

राकेश दहशत में उठ बैठा। वह पागलों की तरह चीखने लगा, और बार-बार चिल्लाया: "मैंने नहीं मारा! मैंने नहीं मारा! मुझे माफ़ कर दो अनामिका!"

अगले दिन, जब पुलिस दोबारा पूछताछ के लिए आई, तो उन्होंने राकेश को एक मानसिक रोगी की तरह पाया। वह लगातार अनामिका का नाम ले रहा था और अपना अपराध स्वीकार कर रहा था। उसकी यह मानसिक हार पुलिस के लिए सबसे बड़ा सबूत बन गई। राकेश को गिरफ्तार कर लिया गया।


जैसे ही राकेश और पड़ोसन  को पुलिस की गाड़ी में बिठाकर ले जाया गया, अनामिका की आत्मा उस घर की दहलीज पर खड़ी थी। उसके माता-पिता यह सब दृश्य को चुपचाप, सहमे हुए देख रहे थे। पुलिस ने उन्हें भी झूठी गवाही और पुलिस को गुमराह करने के लिए गिरफ्तार कर लिया। वही पड़ोसन जिसने अपना मुंह पल्लू से छुपा रखा था ताकि दुनिया उसे न देख सके अब वह अनामिका की आत्मा के सामने बे–आबरू हो चुकी थी। 

अनामिका की आत्मा मुस्कुराई। उसने समाज या किसी व्यक्ति को एक शब्द भी नहीं कहा।

उसने पहले किचन गार्डन की ओर देखा—वह जगह जहाँ उसने दूसरी बार विश्वास किया था। फिर उसने पड़ोसन के घर की ओर देखा—वह जगह जहाँ वासना छिपी थी।

अपनी अधूरी लड़ाई का न्याय होते ही, अनामिका की आत्मा उस घर की दीवारों को पार करके मुक्ति पा गई।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

के आर पूरा बंगलुरू।

दो चेहरे



मीरा और सैंडी की शादी को कुछ साल हो चुके थे। वे बैंगलोर में एक पॉश इलाके में रहते थे। मीरा एक स्कूल में शिक्षिका थी, वहीं सैंडी एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर काम करता था। हाल-फिलहाल ही उसकी तरक्की हुई थी। देखने से ये दोनों ही अच्छी-खासी ज़िंदगी जीने वाले लगते थे। बाहर से सब कुछ ही बहुत बढ़िया और शानदार लगता था। बाहर की दुनिया के लिए, सैंडी एक आदर्श पति था। वह सामाजिक समारोहों में मीरा का हाथ थामे कहता, "मेरी मीरा ने घर को स्वर्ग बना दिया है, यह सब इसी की मेहनत है।" लोग मीरा को भाग्यशाली मानते थे।

मगर घर की चारदीवारी के भीतर, सैंडी का मुखौटा उतर जाता। सैंडी का चिड़चिड़ा स्वभाव सुबह की पहली किरण के साथ ही शुरू हो जाता। चाय की मेज पर छोटी-सी बात पर भी वह गुस्से से चिल्लाता। मीरा स्कूल जाने के लिए तैयार होते-होते सैंडी की चाय के साथ नाश्ता रख देती थी, लेकिन सैंडी किसी-न-किसी तरह उसमें कमी निकालता। कभी नाश्ता पसंद न आना, तो कभी चाय ठंडी हो जाना, या फिर केवल दो-तीन मिनट की देरी में भी वह चिल्लाता। मीरा जो कि रोज़ रात घर और रसोई समेट कर सोने आती तो 12 बज जाते थे और सुबह 6 बजे ही उठकर अगले दिन की तैयारियों में लग जाती थी। अधूरी नींद और थकावट में भी वह चुपचाप काम करती थी। क्योंकि मीरा जानती थी कि सैंडी रोज़ ही ऐसा करता है, लेकिन कभी-कभी मीरा अगर थकान से चूर होकर कहती कि उसने भी पूरे दिन काम किया है, तो सैंडी तिरस्कार से होंठ सिकोड़ता, "हाँ, मुझे तो तुम स्वर्ग में लेकर आ गई हो! तुम्हारी महान सेवाओं के लिए मुझे तुम्हारा ऋण चुकाना चाहिए, है न?"

उसका हर शब्द मीरा के आत्मविश्वास पर एक छोटा-सा वार होता था। तब मीरा दुख से केवल चुपचाप आँसू बहाकर रह जाती। वह जानती थी कि पलट कर दोबारा कहेगी तो सैंडी मीरा को स्कूल ड्रॉप करते समय रास्ते पर ही या फिर स्कूल के गेट के सामने ही उस पर चिल्ला देगा ताकि स्कूल में उसके स्टूडेंट्स और सहकर्मी भी सुन सकें। वह ऐसा जान-बूझकर करता था।

एक शाम, सैंडी को किसी पार्टी में जाना था। मीरा ने सैंडी की पसंदीदा कमीज़ प्रेस (इस्त्री) करके रखी, लेकिन एक कॉलर पर हल्की-सी सिलवट रह गई। सैंडी ने कमीज़ को लापरवाही से उठाया, सिलवट देखी, और गुस्से से ज़मीन पर फेंक दिया। "देखो! तुमसे एक छोटा-सा काम भी ठीक से नहीं होता। तुम किसी काम को दिल से करती ही नहीं हो," वह दहाड़ा। जब मीरा ने चुपचाप कमीज़ उठाई, तो उसने फुसफुसाते हुए कहा, "रहने दो। ज़्यादा प्यार दिखाने की ज़रूरत नहीं है। मुझे पता है तुम कितनी परवाह करती हो।" मीरा ने इस बात को अनसुना कर दिया और सैंडी की कमीज़ फिर से इस्त्री कर उसे दी। जब वह पार्टी के लिए ख़ुद भी तैयार होती है, तभी उसे ऐसा ख़याल आता है कि अगर वह पार्टी में न ही जाए तो कितना अच्छा हो। लेकिन वह जानती है कि चाहे कुछ भी हो सैंडी कुछ-न-कुछ कहेगा ज़रूर। चाहे तो साधारण कपड़े पहने तो कहेगा कि मीरा को उसकी इज्जत की फ़िक्र नहीं है, अगर अच्छे कपड़े पहनेगी तो कहेगा सिर्फ़ अपनी फ़िक्र है, और न जाए तो कहेगा कि वह अपनी बचकानी हरकत से उसका आकर्षण पाना चाहती है। और अगर जाने के लिए अपनी तरफ से उद्योग दिखाए तो कहेगा कि वह किसी भी जगह उसके साथ जाने लायक ही नहीं है फिर भी लेकर जा रहा है। अतः, मीरा चुपचाप यंत्रवत् सी तैयार होकर सैंडी के साथ चुपचाप जाती है, लेकिन मन में डर सा लगा ही रहता है।

मीरा को सबसे अधिक निराशा तब होती, जब उनके बीच कोई अंतरंग पल गुज़रता। उस क्षणिक नज़दीकी के बाद, सैंडी तुरंत एक 'बेतूकी' बात उठा देता। एक बार ऐसे ही पल के बाद, सैंडी ने अचानक रसोई की ओर देखते हुए कहा, "क्या माँ ने आज काम वाली से झाड़ू लगवाया था? लगता है तुम तो अपनी नई दुनिया में हो, तुम्हें माँ के किसी काम की फ़िक्र ही नहीं है।" इस तरह वह मीरा को अपराधबोध में धकेल देता। मीरा ने कहा कि काम वाली को तो रखा ही इसलिए है कि वह घरेलू काम करे। फिर भी सैंडी कहता है कि यह सारा काम मीरा का था और काम वाली रखना सिर्फ़ मीरा के नख़रे हैं क्योंकि मात्र कुछ चिल्लर कमाती है फिर भी कमाई की धौंस जमा रही है। मीरा को समझ में नहीं आता कि वह करे तो करे क्या? क्योंकि काम वाली तो सिर्फ़ सुबह ही उसकी मदद करती है और बाक़ी सारा काम मीरा अकेले ही स्कूल जाने से पहले करके जाती है या फिर वापस आकर करती है। स्कूल और घर के दोनों काम अकेले मीरा को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से थका देते थे। उस पर से सैंडी के ताने आग में घी का काम करते। मीरा कई बार इस बात को समझ चुकी थी और अपनी सास तथा ससुर से भी बात कर चुकी थी। यहाँ तक कि साहस कर उसने सैंडी से भी कहा था। लेकिन नतीजा कुछ नहीं हुआ, बल्कि उल्टे मीरा को सैंडी के हाथ से चाँटा भी पड़ा।

यही सिलसिला चलता रहा। एक बार जब सास ने प्यार से मीरा को उसके जन्मदिन पर तोहफ़ा दिया, तो सैंडी ने तुरंत माहौल को ज़हरीला बना दिया। "देखो! सिर्फ़ मेरी माँ ही हैं जो तुम्हें इतना प्यार देती हैं, जबकि तुम्हें इसकी कोई क़द्र नहीं है," उसने ताना मारा, "तुम्हारे घर वालों ने कभी किसी की इज़्ज़त करना सीखा ही नहीं। उन्होंने तुम्हें कुछ 'सिखाया' ही नहीं है।" मीरा ने कहा कि तुम मेरे साथ मायके चलो मेरे माता-पिता को भी तुम्हारे लिए कुछ करने दो तो सैंडी झिड़कते हुए कहता है कि "रहने दो रहने दो जानता हूँ कितना करते हैं और क्या करते हैं। हूँह! मुझे जाकर वहाँ उबले चने खाकर गुज़ारा नहीं करना तुम जैसे भिखारी लेबरर्स की तरह..." मीरा अपने ही जन्मदिन पर अपने माता-पिता के लिए कहे गए अपमानजनक बातों को सुनकर आँसू बहाकर रह गई। वह जानती थी कि प्रतिवाद करने पर उसे सैंडी थप्पड़ न मार दे। उसकी बेइज्जती करने में वह कोई कसर नहीं छोड़ता था।

मीरा को कहानियाँ लिखने का बहुत शौक था। वह अक्सर अपने ख़ाली समय में कहानी लिखा करती थी। उसके स्कूल के एक वरिष्ठ सहकर्मी ने मीरा को प्रेरित कर एक राष्ट्रीय स्तर की कहानी प्रतियोगिता में भाग लेने को कहा। मीरा ने उसमें भाग तो ले लिया। देवयोग से वह उस कहानी प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर रही, लेकिन फिर भी यह मीरा के लिए बहुत बड़ी ख़ुशी की बात थी। उसने सोचा कि यह ख़ुशी वह सब से बाँटेगी। अपने माता-पिता के साथ-साथ उसने यह बात सैंडी को भी बताई, लेकिन सैंडी ने जान-बूझकर कहा, "क्या ज़रूरत है इतनी उड़ने की? यह सब बचकाना है। तुम हर छोटी चीज़ को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती हो। एक तो सेकंड आई हो और अपने आप को बड़ी साहित्यकार मानने लगी हो। फ़ालतू के ये सब किस्से कहानी छोड़ो और अपनी नौकरी पर ध्यान दो। दो पैसे आते हैं उससे। तुम्हारी ये बकवास कहानी हमें रोटी नहीं देगी।" मीरा बहुत दुखी हो जाती है। वह सैंडी को कहती है कि वह उसे ऐसी बातें क्यों कहता है? वह दुखी करने वाली और अपमानित करने वाली बातें क्यों कहता है? क्या वह उससे प्यार नहीं करता? तब सैंडी कहता है "तुम तो प्यार के काबिल ही नहीं हो। तुम बस स्वार्थी हो।" जब मीरा इस अन्याय पर गुस्सा दिखाती है, तो सैंडी गुस्से से आग-बबूला होकर उसे देखता, और एक पल में उसे 'मेंटल' कहकर कमरे से निकल जाता।

मीरा पढ़ी-लिखी और तार्किक थी, लेकिन सैंडी उसे लगातार 'गँवार' कहकर उसका आत्मविश्वास तोड़ता था।

इसी बीच दोनों की शादी की सालगिरह आई। परिवार के दबाव में सैंडी ने मीरा को घुमाने ले चलने का प्रस्ताव दिया। मीरा को लगा, शायद यह बदलाव की शुरुआत है। वे शहर से बाहर घूमने गए। यात्रा अच्छी रही, लेकिन घर लौटते ही सैंडी का भयानक गुस्सा फूट पड़ा। "जानती हो कितना ख़र्चा हुआ? और मुझे कितनी तकलीफ़ हुई? तुम्हारे लिए मुझे यह सब करना पड़ता है," उसने चिल्लाकर, एहसान जताते हुए कहा। फिर वह गरजते हुए मीरा से चाय के लिए पूछता है, ताकि वह घूमने ले जाने के 'एहसान' के अपराधबोध में तुरंत डरकर घर के सारे काम करने लगे। मीरा आख़िर वही करती है जो सैंडी चाहता था। लेकिन मीरा अब यह सब बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। उसके मन में सैंडी के प्रति प्यार और ख़ुद के लिए सैंडी से प्यार पाने की उम्मीद टूट चुकी थी।

समय के साथ, मीरा की आँखों से सैंडी का तिलिस्म टूट गया। उसने समझा कि यह प्यार नहीं, शोषण है। वह अपनी ख़ुशी के छोटे-छोटे पल सैंडी से छिपाकर जीने लगी। उसने सैंडी की चालाकियों को अब युक्तिपूर्वक सँभालना शुरू किया। जब वह ताना मारता, तो मीरा शांत रहती, कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं देती। वह घर के काम भी तेज़ी से निपटाती। सैंडी जब तक घर पर नहीं रहता वह सुकून से रहती। और अपने मन को शांत कर ख़ुद को सकारात्मक विचार प्रदान करती।

यह प्रतिरोध सैंडी को बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने मीरा से साफ़ कहा, "मैं जानता हूँ तुम क्या कर रही हो। तुम अपनी हरकतों से दुनिया को मेरे ख़िलाफ़ करना चाहती हो।" उसका व्यवहार और अधिक कटु हो गया। लेकिन मीरा इसके लिए अब मन-ही-मन तैयार होने लगी थी।

आख़िरकार वह मौक़ा भी मीरा को मिला। एक महत्वपूर्ण पारिवारिक समारोह में, सैंडी हमेशा की तरह, सबके सामने 'आदर्श पति' का नाटक कर रहा था। उसने मीरा का हाथ पकड़कर कहा, "मीरा कितनी प्यारी है, हमेशा मेरे परिवार के बारे में ही सोचती है।" फिर उसने हँसते हुए, एक छोटा, अपमानजनक मज़ाक जोड़ा जो केवल घर की बात थी।

बस! मीरा का सब्र टूट गया। उसने सैंडी की आँखों में देखा और वहीं, सबके सामने, शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,

"सैंडी, आप सबके सामने मेरी इतनी क़द्र दिखाते हैं, यह अच्छा है। लेकिन घर के अंदर की सच्चाई भी ज़रूरी है। अगर आप मेरी इतनी ही क़द्र करते, तो शायद मुझे बार-बार 'गँवार' नहीं कहते, और मेरे माँ-बाप को यह दोष नहीं देते कि उन्होंने मुझे कुछ सिखाया नहीं, न ही उनका अपमान करते। और मुझे 'मेंटल' कहकर तो आप मेरी समस्या का समाधान बिलकुल नहीं करते। न ही आप घर और बाहर अपने दो चेहरे लेकर घूमते। यह आपके घर वाले अच्छे से जानते हैं। लेकिन वे भी चुप हैं, पता नहीं क्यों? उन्हें यह समझ में आता क्यों नहीं कि उनका बेटा अपनी पत्नी की मानसिक पीड़ा दे-देकर उसकी ज़िंदगी ख़राब कर चुका है।"

पूरा हॉल सन्नाटे में डूब गया। सैंडी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसका मुखौटा, जो बरसों से लोगों को धोखा दे रहा था, एक झटके में नीचे गिर गया।

मीरा ने आख़िरकार ख़ुद को उस ज़हरीले बंधन से मुक्त करने की ओर पहला, साहसी कदम बढ़ा दिया था। उसने दुनिया के सामने सैंडी का वास्तविक 'दूसरा चेहरा' दिखाकर, अपने आत्म-सम्मान की ओर बढ़ने का रास्ता चुना। अगले कुछ दिन घर में इस बात पर बहुत झगड़े हुए और मीरा के माता-पिता को भी बुलाया गया। लेकिन मीरा इस बार पूरी तैयारी के साथ थी। उसने सैंडी से तलाक़ लेने की सोच ली थी।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

बंगलुरू

Tuesday, January 13, 2026

अभावों की मिठास

 


सिलचर की सर्द हवाएं हड्डियों को कँपा रही थीं। रूपक ने अपनी फटी हुई चादर को थोड़ा और कस लिया। वह एक दिहाड़ी मजदूर था, जिसके हाथों की लकीरें ईंटें ढोते-ढोते घिस चुकी थीं। उसकी पत्नी नैनामती दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर शाम को जब घर लौटती, तो दोनों की थकान एक-दूसरे को देख कर और बढ़ जाती।

"कल पौष संक्रांति है," नैनामती ने चूल्हे की राख साफ करते हुए धीरे से कहा। "मुन्ना पूछ रहा था कि क्या इस बार उसे भी ‘चुंगा पीठा‘ खाने को मिलेंगे?"

रूपक खामोश रहा। जेब में सिर्फ कुछ सिक्के थे, जिनसे अगले दो दिन का राशन भी मुश्किल था। संक्रांति का मतलब था—नए कपड़े, खजूर का गुड़ (नोलन गुड़), बिरौन चावल का पीठा, तिल के लड्डू । गरीबी के इस दौर में ये चीजें किसी शाही दावत से कम नहीं थीं।

अगली सुबह, पूरा शहर उत्सव की तैयारी में था। रूपक काम की तलाश में चौक पर खड़ा रहा, लेकिन कड़ाके की ठंड के कारण कंस्ट्रक्शन का काम बंद था। वह खाली हाथ घर लौटने लगा, तो रास्ते में उसे खेतों से ’नेरा’(पराली) ले जाते लोग दिखे। उसने सोचा, 'भले पेट खाली रहे, पर अपने बच्चे के लिए छोटा सा ’मेड़ा–मेड़ी घर’ तो बना ही सकता हूँ।' उसने कुछ गिरे हुए बाँस और पराली इकट्ठा की और शाम तक आंगन में एक नन्हा सा मेड़ा–मेड़ी घर खड़ा कर दिया। मुन्ना की आँखों में चमक देख उसे पल भर की खुशी मिली, पर पेट की भूख और त्योहार का अधूरापन उसे साल रहा था।

तभी नैनामती आई, उसकी आँखों में आँसू थे। जिस घर में वह काम करती थी, वहां उसे आज छुट्टी दे दी गई थी और पगार भी अगले हफ्ते मिलने वाली थी। उम्मीद की आखिरी किरण भी धुंधली पड़ गई।

तभी दरवाजे पर एक पुरानी साइकिल की घंटी बजी। वह उनके पुराने मालिक, प्रमोद बाबू थे। रूपक सालों पहले उनके बागान में काम करता था। प्रमोद बाबू के हाथ में एक भारी थैला था।

"रूपक रे! घर पर है क्या?" उन्होंने आवाज दी। "आज शहर आया था, सोचा तुझे पौष संक्रांति की कुछ सामग्री दे दूँ। तेरे हिस्से का पुराना बकाया भी बाकी था।"

थैले में चावल, मैदा,आटा, कुछ मीठे आलू , खजूर के गुड़ की एक भेली और ताज़ा नारियल था। रूपक और नैनामती की आँखों में कृतज्ञता के आँसू छलक आए। वह महज राशन नहीं, एक उम्मीद थी।

रात के सन्नाटे में, नैनामती ने सिलहटी परंपरा के अनुसार चूल्हा सुलगाया। उसने चावल के आटे को गूँथकर नन्हे-नन्हे चुंगा पीठा' और पाटीशापटा बनाए। दूध तो कम था, पर गुड़ की खुशबू ने पूरे झोपड़े को महका दिया। उधर रूपक ने आंगन में पवित्र 'बौनी' (धान की बालियां) बांधी, ताकि घर में बरकत बनी रहे।

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले, उन्होंने मुन्ना के साथ मिलकर मेड़ा– मेड़ी घर में अग्नि प्रज्वलित की। कड़कड़ाती ठंड में आग की तपिश और हाथ में गरम-गरम पीठे का कटोरा—रूपक और नैनामती के लिए यह किसी भी बड़े उत्सव से बढ़कर था। बाहर गौडिया मठ वाले अपनी कीर्तनियां की टोली लेकर हरि नाम गाते हुए जा रहे थे। उनके सामने उसने तिलुआ, बतासा, और कुछ फल भी लेकर रखता है और फिर हरि लूट(स्थानीय प्रथा) होती है। 

अभावों के बीच, पुराने मालिक की उदारता और अपनी जड़ों के प्रति प्रेम ने उनकी संक्रांति को सार्थक कर दिया था। मुन्ना के चेहरे पर गुड़ की मिठास और मुस्कान देखकर रूपक को लगा कि उसकी दिहाड़ी आज वसूल हो गई है।

Saturday, January 3, 2026

अंधेरी गली का चिराग

 


1

करीमगंज बाजार की उस तंग 'बाबन गली' में वक्त जैसे ठहर गया था। गली के मुहाने पर अपनी छोटी सी दुकान के फट्टे पर कृष्णकांत मणि, जिन्हें सब 'मणि दादू' कहते थे, पत्थर की मूरत बने बैठे रहते। उनकी आँखों में 1971 की उस भयानक रात का सन्नाटा आज भी पसरा था। वह अपनी बेटी के घर उसका जन्मदिन मनाने सरहद पार गए थे, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। दंगों की आग ने उनका सब कुछ छीन लिया, बस छोड़ गया तो एक साल का मासूम— अजय।

उस समय दुख की अधिकता में दादू ने अजय को देखकर भारी मन से कहा था— "ई अभागा रे लोइया आमी किता करमु? इगु ए तो आमार शोरबोनाश कोरी दिलो!" (इस अभागे को लेकर मैं क्या करूँगा? इसने तो मेरा सब कुछ खत्म कर दिया!)। पर उस अबोध बालक की मुस्कान ने दादू के भीतर की ममता को जगा दिया और उन्होंने उसे ही अपना संसार बना लिया।

2

बीस साल बीत गए। अजय अब एक जवान युवक था। एक शाम वह दुकान पर आया और बाहर की चकाचौंध को देख कर उसका मन भर आया। वह दादू से बोला:

अजय: "दादू, आपनी इखानो बईया आछइन? देखइन चाईन, बाहिरोर दुनिया किता अइसे! अउ जे नया सोसाइटी देखराय, ओगु किता चकमक करैर, आर आमारार ई गली अउ चिपात पड़िया आंधार अइया रइसे। आमारार कफ़ालों किता खाली अउ आंधार नि?"

(दादू, आप अभी भी यहीं बैठे हैं? देखिए तो सही, बाहर की दुनिया क्या हो गई है! वह जो नई सोसायटी देख रहे हैं, वह कैसी चमक रही है, और हमारी यह गली इस कोने में अंधेरे में पड़ी है। क्या हमारे भाग्य में बस यही अंधेरा है?)

मणि दादू ने धीरे से अजय के कंधे पर हाथ रखा और शांत स्वर में कहा:

दादू: "बाबा जी, सबर कर। अत उतला अइले अइत नाय। बाहिरोर अउ चकमकानी दिया किता करबे? इता दिया जिन्दगी चले ना। जेदिन आमारार ई गलीर मानुषोर मोन उज्ज्वल अइबो, देखबे ओदिन आमारार ई गली ओ दुनियार माझे सब ताकि बेसी चकमक करबो।"

(बाबाजी, सब्र कर। इतना उतावला होने से नहीं होगा। बाहर की इस चमक-धमक का क्या करेगा? इससे जिंदगी नहीं चलती। जिस दिन हमारी इस गली के लोगों का मन उज्ज्वल होगा, देखना उस दिन हमारी यह गली भी दुनिया में सबसे ज्यादा चमकेगी।)


3


काल बैसाखी का मौसम था। रिमझिम बारिश होने लगी थी। एक रात मौसम ने करवट ली। मूसलाधार वर्षा होने लगी और देखते–ही– देखते पूरे शहर की बिजली कट गई। नई सोसायटी की बड़ी-बड़ी इमारतें अंधेरे में डूब गईं। बाबन गली में घोर अंधेरा था, तभी मणि दादू ने अपनी पुरानी लालटेन जलाकर बाहर गली में रख दी।

नरेन काकू ने खिड़की से चिल्लाकर कहा, "ओ मणि दा इ तूफानों आफने लेनटोन जलाया किता कोररा?(अरे मणि दा, इस तूफान में लालटेन जलाकर क्या लाभ?)" दादू ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, " नरेन लेनटोन जलायले थुड़ा तो आन्दार कम आईबो। आओ शोबे मिली आगे बड़ाई।(नरेन, एक दीया जलेगा तो अंधेरा थोड़ा तो कम होगा! आओ, सब मिलकर इसे बढ़ाएं।")


तभी अचानक नई सोसायटी की ओर से एक हृदय विदारक चीख सुनाई दी। बारिश की वजह से बिजली का तार टूटकर गिर गया था और एक वृद्ध व्यक्ति उसकी चपेट में आ गए थे। चारों ओर हाहाकार मच गया, पर अंधेरे में कोई आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पा रहा था।

अजय की रगों में जोश दौड़ गया। वह चिल्लाया, "ओ दादू, देखइन! ओइ बयेश्क मानुष टा विपदौ पड़़ि गेसोइन! आमी जाइराम!"

मणि दादू का कलेजा मुँह को आ गया, उन्होंने पीछे से आवाज दी, "अजय रे, बाबाजी! शांमलीया जाइयो, आतो एकटा हुखना लाठी लोईया जा!" (अजय, संभलकर जाना, हाथ में एक सूखी लाठी लेकर जाओ!)

अजय और गली के अन्य लोग अपनी जान जोखिम में डालकर दौड़ पड़े। लालटेन की उस मद्धम रोशनी के पीछे-पीछे पूरी गली एक शक्ति बन गई। अजय ने सूखी लाठी की मदद से उन वृद्ध को सुरक्षित बचा लिया।

4

जब सब वापस लौटे, तो बाबन गली में एक अलग ही उत्सव था। लोग एक-दूसरे को मिठाई और चाय बाँट रहे थे। अगली सुबह जब सूरज की किरणें गली पर पड़ीं, तो वह सफाई और एकता के कारण नई सोसायटी से भी अधिक सुंदर लग रही थी।

मणि दादू ने अजय के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, बाबाजी आइज बुझचो नि मानुष ही आशोल उजाला। तुमि केवल एक्टा पोरान बाचाइसो ना तुमि इ गलिर आ जागाइसो ("बाबाजी, आज समझ गए न— इंसान ही असली उजाला होता है। तुमने आज केवल एक जान नहीं बचाई, बल्कि इस गली की सोई हुई आत्मा को जगा दिया है।")

अजय की वीरता और दादू की उस नन्हीं लालटेन ने बाबन गली का भाग्य सदा के लिए बदल दिया। अब वह केवल एक तंग गली नहीं, बल्कि अटूट एकता का प्रतीक बन चुकी थी।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

बंगलुरू

Thursday, January 1, 2026

श्यामा



"ओ रे श्यामा! कहाँ है रे तू?" बेटी को पुकारते हुए मालती घर में प्रवेश करती है। बैठक में जाकर चारपाई पर बैठती है और सुपारी से भरी टोकरी रखती है। फिर एक सरौता लेकर सुपारी के छिलके उतारने लगती है।

माँ की पुकार सुनकर सात-आठ वर्ष की एक बालिका कमरे में प्रवेश करती है। उसके मुखमंडल को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो विधाता ने कांस्य की मूर्ति में प्राण फूंक दिए हों। देखने में सुंदर, मीन-सी आँखें—जिनमें समूचा समुद्र समा गया हो—पतली, लम्बी नाक, कोमल ग्रीवा, और कमर तक लहराते हुए लंबे बाल। परंतु इन सभी सौंदर्य-गुणों के बावजूद विधाता ने उसे वर्ण नहीं दिया था। इसी कारण मोहल्ले के बच्चे उसे 'काली' कहकर चिढ़ाया करते थे।

श्यामा की माँ को भी यह बात ज्ञात थी। वह कई बार मन मसोस कर रह जाती—"मेरी कोख से जन्मी इस बच्ची का भविष्य न जाने क्या होगा?" अब तो वह बच्ची है, लेकिन जब बड़ी होगी, तो क्या उसके रंग की वजह से उसका विवाह कठिन हो जाएगा?

मालती सुपारी काटने में व्यस्त थी। ठंडी दोपहर थी। उसने श्यामा से एक चादर लाने को कहा। फिर वह सूख चुकी सुपारी के छिलके सरौते से निकालने लगी। उधर श्यामा बाहर आँगन में धूप में रखे वस्त्रों में से एक गरम चादर उठाकर ले आई और अपनी माँ को ओढ़ा दी। फिर वह पुनः बाहर गई और बाकी वस्त्र, रजाइयाँ, तकिए, और चादरें भी ले आई।

यह एक सिलेटी ग्रामीण परिवार था। घर के आँगन के चारों ओर सुपारी और नारियल के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष लगे थे। कहीं कहीं गुड़हल, टगर, घंटा फूल और नीले अपराजिता की झाड़ियाँ भी थीं। ईशान कोण की दिशा से एक आम की पतली सी टहनी आँगन में झाँक रही थी। आँगन के मध्य में तुलसी का चौबारा बना था। उसके चारों ओर चटाइयों पर धूप में कुछ कपड़े, रजाइयाँ, तकिए और चादरें सूखने के लिए रखे थे।

यह मालती के घर की रोज़ की दिनचर्या थी। सुबह से दोपहर तक इन वस्त्रों को धूप में सुखाने पर ही वे रात की ठंड में गरमाहट दे पाते थे।

श्यामा के पिता, देवराज भट्ट, जाति से ब्राह्मण थे और जजमानी प्रथा से जुड़े हुए थे। अग्रहायण मास में वे अत्यंत व्यस्त हो जाते थे—चारों ओर होने वाले विवाहों में उन्हें पुरोहिताई का कार्य मिल जाता था। उसी से उनकी सालभर की आजीविका चलती थी। दुर्गा पूजा से लेकर जगद्धात्री पूजा तक की कमाई से ही तीन सदस्यीय यह परिवार अपना गुज़ारा करता था।

कार्तिक मास चल रहा था और अग्रहायण आने में अब केवल चार-पाँच दिन शेष थे। इस बार विवाहों में पुरोहिताई का कार्य बहुत कम मिला था, जिससे विशेष आमदनी की संभावना नहीं थी। दो जजमान परिवार तो इतने गरीब थे कि उनसे दक्षिणा माँगना भी संकोचजनक था। उधर जगद्धात्री पूजा के लिए भी अब तक कोई आमंत्रण नहीं आया था। जबकि हर वर्ष भट्टाचार्य बाबू के घर से बुलावा अवश्य आ जाता था।

इसका भी एक कारण था—भट्टाचार्य जी हर वर्ष जगद्धात्री पूजा के अवसर पर अपनी नातिन या किसी रिश्तेदार की कन्या को माता के रूप में सजवाते और पूजा कराते थे। परंतु इस वर्ष उनकी सभी नातिनें बड़ी हो चुकी थीं, अतः कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं था।

श्यामा के पिता को चिंता हुई, सो वे एक दिन भट्टाचार्य जी के घर जगद्धात्री पूजा के विषय में चर्चा करने पहुँचे। न जाने क्या सोचकर वे अपनी बेटी श्यामा को भी साथ ले गए। श्यामा अभी छोटी थी, इसलिए अक्सर वह अपने पिता के साथ पूजा-पाठ और यजमानों के घर जाया करती थी।

सिलेटी परंपरा के अनुसार, जो पूजा एक बार प्रारंभ हो जाए, उसे प्रत्येक वर्ष करना अनिवार्य होता है। यदि कोई विशेष कारण न हो, तो उसे स्थगित करना अमंगल का संकेत माना जाता है।

देवराज महाशय जब भट्टाचार्य महाशय जी के घर पहुँचे और पूजा के बारे में बात चलायी, तो भट्टाचार्य जी गहन सोच में पड़ गए। तभी उनकी दृष्टि श्यामा पर पड़ी। उन्होंने तत्काल प्रस्ताव रखा—"क्यों न इस बार श्यामा को ही देवी के रूप में पूजा हेतु चुना जाए?"

पहले तो देवराज भट्ट थोड़ा संकोच में पड़े, किंतु जब भट्टाचार्य बाबू ने कहा, "इसमें कोई आपत्ति नहीं है। गाँव की प्रत्येक बेटी हमारे लिए माँ जगद्धात्री के समान ही है," तो वे प्रसन्न हो उठे और उनकी उदार भावना से गद्गद हो गए।

घर आकर उन्होंने यह बात पत्नी मालती को बताई। मालती यह सुनकर खुशी से भर उठी। उसकी आँखों से आँसू छलक आए।

निर्धारित तिथि को जगद्धात्री पूजा का आयोजन हुआ। मालती अपनी बेटी श्यामा को लेकर पहुँची। भट्टाचार्य जी की पत्नी ने श्यामा का स्वयं श्रृंगार किया और पूजा स्थल तक ले गईं। वहाँ देवराज अपनी बेटी को देख मंत्रमुग्ध हो गए। आज श्यामा सचमुच माँ जगद्धात्री जैसी प्रतीत हो रही थी। उन्होंने अपनी बेटी में देवी का रूप देख उसका आह्वान किया और उसके चरणों में आलता लगाकर पूजा की विधि आरंभ की। कुमारी पूजा प्रारंभ होने के पहले से ही मालती देवी भी पूजा मंडप में उपस्थित थी। कुमारी रूपी श्यामा को देख कर उनकी आँखें छलक उठी, श्यामा के विवाह की दुष्चिन्ता उनके मन से दूर हो गयी और एक परम तृप्ति से उनका मन भर गया।

काली



बदरपुर श्रीगौरी गाँव अपने प्राकृतिक सौंदर्य का भंडार था, जहाँ छोटे-बड़े कच्चे-पक्के मकान और नन्हे-नन्हे पोखरों का घेरा था। गाँव के पास से गुज़रती रेल लाइन के किनारे चावल के खेतों की हरियाली मन मोह लेती थी। सुनहरी मिट्टी की पगडंडियों के किनारे खिले जंगली फूलों की रंगत आँखों को तरो-ताज़ा कर देती थी।

उसी पगडंडी पर चंपा पानी से भरी कलसी को कमर पर सँभाले अपनी दो वर्ष की सुमना को लेकर घर जा रही थी। साथ में उसकी बड़ी बेटी तारा भी थी। सुमना जितनी गोरी थी, तारा उसके बिल्कुल विपरीत थी। अक्सर तारा को लोग उसके रंग-रूप के कारण चिढ़ाया करते थे, पर वह बेचारी, मात्र छह वर्ष की बच्ची, क्या जाने कि रंग-रूप क्या चीज़ है और एक लड़की के जीवन में उसका क्या महत्व है? वह तो बस ‘काली’ कहलाने पर इसलिए रो पड़ती थी कि पिछली बार जब उसने काली पूजा में माँ काली की विकराल मूर्ति देखी थी, तो डर गई थी। बड़ी मुश्किल से उसके पिता ने माँ काली के बारे में समझाकर उसे शांत किया था। साथ ही, यह भी बताया था कि तारा नाम भी माँ काली का ही सौम्य  रूप को कहा जाता होगा है और उन्हें माँ तारा कहकर ही पूजा जाता है।

तारा अपनी आँखें मलते हुए, सिसक-सिसक कर रोती हुई चल रही थी। वहीं सुमना भी रो रही थी। फ़र्क़ बस इतना था कि एक को माँ से मार पड़ी थी, तो दूसरी को बहन से।

बात यह थी कि सुमना और तारा, दोनों आपस में जितना प्यार से रहती थीं, वहीं किसी भी बात पर लड़ भी पड़ती थीं। अकसर सुमना तारा को मारती थी। तारा जानती थी कि सुमना अभी शिशु है, इसलिए उसे किसी चीज़ की समझ नहीं है। बड़ी बहन होने के नाते वह अपनी नन्ही-सी गुड़िया जैसी बहन की हर ज़िद और बदमाशियों को बर्दाश्त करती और उसे प्यार से सँभाले रखती। लेकिन कभी-कभी उसे भी लगता कि इतना प्यार कहीं बहन को बिगाड़ न दे और वह उसके सिर चढ़कर न बोलने लगे।

आज बात कुछ यूँ हुई कि चंपा अपनी दोनों बेटियों को लेकर पोखर में नहाने आई थी। माँ ने तारा और सुमना को कड़ी हिदायत दी थी कि वे पानी में बिल्कुल न उतरें। दोनों को ही उसने पानी की कलसी भर कर पोखर से दूर बिठा रखा था। पोखर के किनारे दोनों गीली मिट्टी लेकर खेलने लगी थीं। आज घर पर कोई न होने की वजह से चंपा को मजबूरन दोनों बेटियों को साथ लाना पड़ा था।

चंपा बच्चों पर नज़र रखते हुए जल्दी से स्नान करके, कपड़े बदलकर उनके पास आई। पर इधर केवल कुछ ही क्षणों में दोनों बच्चियों ने माँ की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर गीली मिट्टी से खुद को सान लिया था। जब माँ ने डाँट लगाई, तो तारा ने न जाने किस जोश में अपनी छोटी बहन को एक थप्पड़ जड़ दिया। बेचारी सुमना चीख मारकर रोने लगी। तब चंपा ने तारा को भी थप्पड़ मार दिया। फिर बारी-बारी से उन्हें पोखर के पानी से नहलाकर, कपड़े बदलवाकर वह घर की ओर चल पड़ी।

घर पहुँचकर चंपा दोनों को भोजन कराकर सुला देती है और अपने पति के आने की प्रतीक्षा करती है।


दो दिन बाद काली पूजा और दिवाली है। चौदह साग खाने और बत्ती (दीप) दान का तिथि और समय कब है, यह चंपा को नहीं पता। घर में पंचांग नहीं है। उसके पति रमेश पास के भट्ट बाबू के घर पता करने गए हैं। फिर बाज़ार जाकर उन्हें सभी चीज़ें भी लानी होंगी।

सिलहट के बंगाली समुदायों में दिवाली पर यह नियम है कि उन्हें चतुर्दशी के दिन चौदह तरह के साग-पत्तों को एक साथ पकाकर खाना होता है। फिर संध्या समय की तय तिथि में पुरुषों द्वारा अपने पूर्वजों के नाम पर चौदह दिए जलाने होते हैं। इसके बाद अगले दिन काली पूजा भी होती है और साथ ही दिवाली के लिए घर के हर कोने में महिलाएँ और बच्चियाँ दीप जलाकर सजा देती हैं। दिवाली पर माता काली का आह्वान होता है।

चंपा ने पति से कह दिया था कि मुहूर्त सभी पता कर बाज़ार से कुछ साग-पत्तियाँ खरीद लें। बाक़ी जो भी पत्तियाँ बचेंगी, वह बागान से और पड़ोस से माँग लाएगी। वही अश्विन महीना खत्म हो, कार्तिक महीना भी शुरू होने को है, सो आठ अनाज की संक्रांति भी आने वाली है। इसलिए अन्य सब्ज़ियाँ भी लेते आएँ। अश्विन के आखिरी दिन इन सब्ज़ियों को पकाकर खा लेंगे और फिर आधी सब्ज़ी कार्तिक के पहले दिन के लिए बचा लेंगे। कार्तिक के पहले दिन बासी सब्ज़ी खाकर वर (आशीर्वाद) माँगेगे। सिलहटीयों में यह भी एक प्रथा है।

चंपा इन्हीं सब विचारों में लगी हुई थी। देखते-देखते शाम होने को आई। बगल के घर से चटाई का काम पूरा कर उसकी विधवा ननद झूमि आती है। फिर दोनों ठाकुर घर जाकर दिया-बाती करती हैं, उलू ध्वनि करती हैं और काँसा बजाती हैं।

तब तक रमेश भी घर वापस लौट आता है। उसके हाथों में ढेरों सब्ज़ियों की दो बड़ी थैलियाँ हैं। झूमि इसे ले लेती है और रसोई में रख आती है।

चंपा: "क्यों जी! क्या कहा भट्ट दा ने?"

रमेश: "कल दोपहर 2 बजकर 47 मिनट के अंदर ही साग खा लेना है और फिर बत्ती (दीपदान) के लिए अगले दिन की 5 बजकर 36 मिनट तक का समय बताया है।"

चंपा: "हैं! इतना लंबी पड़ गई क्या तिथि? सर्वनाश!"

रमेश: "इसमें सर्वनाश की क्या बात है? तिथि ही तो है, कभी-कभी दो दिन पड़ जाती है। तुम दोनों औरतें मिलकर ये काम सँभाल लो। मैं तो चला काली पूजा के पटाखे खरीदने।"

चंपा: "और बच्चियों को कौन देखेगा? तुम तो चले बाज़ार फिर से। यहाँ मैं अकेले इन दो शैतानों को सँभाल कर थक गई हूँ जी।"

रमेश: "अच्छा, अच्छा, कोई नहीं। मैं सँभाल लूँगा। लाओ।"

इधर झूमि ने दोनों बच्चियों को उठाया तो सुमना रोने लगी। चंपा उसे लेकर दूध पिलाने लगी।


अगले दिन दोनों ननद-भाभी साग छाँटने बैठीं। रमेश काली पूजा हेतु सामान लेने बाज़ार निकल चुका था। माँ के सामने दोनों बच्चियाँ बैठ अपनी गुड़ियों से खेल रही थीं। इतने में सुमना उठकर पोखर की तरफ़ दौड़ने लगी। तारा ने उसे रोकना चाहा, लेकिन तब तक सुमना पोखर के पानी में अचानक कूद पड़ी।

तारा ने अपनी माँ को चीखकर पुकारा और अपनी जान की परवाह किए बिना ही वह भी पानी में कूद पड़ी। दोनों ननद-भाभी इससे पहले कि कुछ समझ पाते, दोनों बच्चियाँ पानी में डूबने-उतरने लगी थीं।

देवयोग से तारा के हाथों बाँस की कुछ पतली डालियाँ हाथ लगीं, जो कि पोखर में डाली हुई थीं। तारा ने अपनी बहन का हाथ जैसे-तैसे कसकर पकड़ा और खुद को बाँस की डाली के सहारे खींचने लगी।

उधर झूमि ने आनन-फानन में ज़ोर-ज़ोर से चीखना शुरू कर दिया, जिससे आस-पास के पड़ोसी जमा हो गए। सबके सम्मिलित प्रयास से अंत में तारा और सुमना को बचा लिया गया। वही बेचारी सुमना को तारा ने खींचते समय कुछ ज़्यादा ही कसकर पकड़ा था, सो उसका हाथ टूट गया।

लेकिन दोनों बच्चियाँ बचा ली गई थीं। सभी ने तारा के साहस की दाद दी। तारा, जो मात्र छह वर्ष की थी, उसकी सूझ-बूझ ने सुमना की जान बचा ली। सबने तारा की भूरी-भूरी प्रशंसा की। यह वही तारा थी, जिसको कभी उसके काले रंग की वजह से अकसर पड़ोसियों से ताने और मज़ाक सुनने पड़ते थे।

अंधेरा या रोशनी

लोग कहते हैं—काली अँधेरी रात बीत जाएगी, सुबह की पहली किरण के साथ खुशियाँ आएगी। अँधेरी रात शायद किसी को पसंद नहीं आती, मगर यह रात मुझे बहुत ह...