बंगलुरू शहर की एक तंग गली के छोटे से घर की खिड़की पर बैठी, कविता की आँखें दूर नीले आसमान में न जाने क्या खोज रही थीं। गहरी सोच के ताने-बाने में उलझी वह किसी अनकहे इंतज़ार में गुम थी। तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई, "कविता, तू यहाँ क्या कर रही है? देख, कितना दिन चढ़ आया है, कब नहाएगी?" माँ के इन शब्दों ने उसकी सोच की डोर तोड़ दी। दिल में एक गहरी उदासी लिए वह उठकर नहाने चली गई।
इस साल गर्मी ने अपना रौद्र रूप दिखाया था। हवा और पानी, मानो जीवन के पर्याय बन गए थे। ठंडे पानी की बौछार उसके तन को तो भिगो रही थी, पर उसके दिल में एक ज्वालामुखी उबल रहा था। भीगे चेहरे पर गर्म आँसुओं की बूँदें टपक रही थीं। हाँ, कविता रो रही थी। क्योंकि जो कुछ उसके साथ हुआ था, उस पर उसे यक़ीन नहीं हो रहा था।
कविता का दिल बहुत साफ़ था और व्यवहार सरल। वह हमेशा सबके लिए अच्छा सोचती थी और कभी किसी से झगड़ा नहीं करती थी। शायद यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गई थी। उसके पति, राजेश, और ससुराल वाले अक्सर उसे ताने मारते थे। "तुमसे कुछ नहीं होगा," "तुम अकेली कहीं आ-जा नहीं सकती," "तुममें हिम्मत नहीं है।" ये बातें सुन-सुनकर उसका दिल टूट गया था। उसे लगने लगा था कि शायद ये सब सच है।
एक दिन, उसे महसूस हुआ कि इस दुनिया में शायद उन्हीं लोगों को सम्मान मिलता है जो झगड़ालू और क्रूर होते हैं। जो लोग तेज़ आवाज़ में बोलते हैं, लोग उनकी बात मानते हैं। लेकिन जो उसके जैसी सीधी-सादी और सच्ची है, उसे कोई नहीं पूछता। उसका अकेलापन और दुःख और भी गहरा होता जा रहा था।
उसने कई बार अपनी बहन से बात की, जिसने उसे अपने लिए एक मज़बूत क़दम उठाने की सलाह दी। लेकिन राजेश और ससुराल वालों के लगातार तानों ने उसे इतना कमज़ोर बना दिया था कि वह खुद को बेकार मानने लगी थी। राजेश ने शादी के पहले दिन से ही ठंडे दिमाग़ से उसके आत्मविश्वास को तोड़ना शुरू कर दिया था। जब तक कविता को इस घृणित चाल का एहसास होता, राजेश अपना काम कर चुका था। अब वह हर बात के लिए खुद को दोषी मानने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि राजेश ने ऐसा क्यों किया।
फिर एक दिन उसके देवर रमेश की शादी हुई और देवरानी आशा घर आई। शुरुआत में सबने आशा के ऊँचे घराने और अंग्रेज़ी बोलने के तरीक़े की तारीफ़ की, लेकिन जल्द ही उसे भी छोटी-छोटी ग़लतियों के लिए ताने मिलने लगे। एक दिन कविता ने देखा कि रमेश अपनी पत्नी आशा को सिर्फ इस बात पर डाँट रहा था कि उसे शराब की गंध बर्दाश्त नहीं थी। दोनों भाई अक्सर शुक्रवार और शनिवार को शराब पीते थे। कविता को याद आया कि कैसे उसने भी एक बार राजेश को समझाने की कोशिश की थी, और राजेश ने उसे एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया था।
लेकिन इस बार कविता ने हार नहीं मानी। उसने आशा के साथ मिलकर सास-ससुर से बात की। ससुर ने सीधे कह दिया कि दोनों भाई शादी से पहले शराब नहीं पीते थे, यह उन्होंने शादी के बाद शुरू किया। इस पर कविता ने हिम्मत कर के कहा कि वे शादी से पहले भी पीते थे। इस पर ससुर ने दोनों बहुओं से कहा, "जब यह बात मालूम थी तो शादी ही क्यों की?" यह बात कविता और आशा को दिल पर लग गई।
गुस्से में कविता ने कहा, "मैंने तो शादी से मना ही किया था, लेकिन राजेश और आपने ही मेरे पिताजी को बार-बार मजबूर किया। और क्या शराब की बोतल मेरे पिताजी ने दहेज में दी थी, जो आप इतने शौक़ से पी रहे हैं?" कविता को उस वक़्त अपने क्रोध का अंदाज़ा नहीं था। ठीक उसी समय राजेश घर आया और यह बात सुनकर आग बबूला हो गया। उसने कविता को सवालों की झड़ी लगाते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया। जब कविता ने अपनी बात रखी, तो राजेश ने उसे एक और थप्पड़ मार दिया।
इस थप्पड़ ने कविता के भीतर की सारी हिम्मत जगा दी। उसने तुरंत कहा, "मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ।" राजेश ने उपहास करते हुए कहा, "तुम्हारे जैसी बेवकूफ़ को कौन रखेगा? और पिताजी के घर जाओगी तो सब तुम्हें ही दोषी मानेंगे।"
कविता ने दृढ़ता से कहा, "मेरी सरलता और सच्चाई ही मेरी सबसे बड़ी ताक़त है। लोग शायद मुझे अभी न समझें, लेकिन लंबे समय में मेरी अच्छाई ही मेरी पहचान बनेगी। और अगर मैं अपने पिताजी के घर जा रही हूँ, तो सही कर रही हूँ, क्योंकि मुझे समझने वाले केवल वही हैं।"
उस दिन के बाद से कविता अपने पिताजी के घर रह रही है। उसने अभी तक राजेश को तलाक़ नहीं दिया है। उसके मन में अभी भी एक उम्मीद बाकी है कि शायद राजेश सुधर जाएगा और वापस लौट आएगा। यही उम्मीद उसकी उदासी का कारण है।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
के आर पूरा बंगलुरू

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