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Monday, February 2, 2026

जंगल और बस्ती की जंग



सिमट रहा है जंगल अब,

गहरा उसका दुख है,

पशु-पक्षी बेघर हुए,

कैसा यह कलयुग है?

दूजी तरफ है भीड़ बड़ी,

इंसान को घर की प्यास है,

जहाँ दिखा थोड़ा जंगल,

वहाँ बस्ती की आस है।

चलती रस्सा-कस्सी दोनों में,

निर्दोष मारे जाते हैं,

कभी जानवर, कभी गरीब,

बिना वजह दुख पाते हैं।

बीच में बैठा स्वार्थी मानव,

अपनी लालसा बुनता है,

विकास का देकर नाम सिर्फ,

अपना फायदा चुनता है।

तहस-नहस सब कर देता वह,

करता सबकी अनदेखी,

लेकिन प्रकृति लिखती है,

एक भयंकर नयी लेखी।

जब क्रोध में आती कुदरत है,

तब सबक बड़ा सिखाती है,

इंसान की हर एक अकड़ को,

मिट्टी में मिलाती है।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

बेंगलुरू

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