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Monday, June 22, 2026

अम्बुबाची मेला: आस्था, लोक-लोकाचार और प्रकृति का महापर्व

 


पौराणिक पृष्ठभूमि और शक्तिपीठ की उत्पत्ति--

अम्बुबाची पर्व का सीधा संबंध सती के पावन चरित्र, उनके आत्मदाह और शक्तिपीठों की स्थापना से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित भव्य यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का घोर अपमान देखकर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए थे। वियोग और क्रोध में व्याकुल भगवान शिव दक्ष यज्ञ का विनाश कर जब सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहां-जहां गिरे, वहां-वहां पावन शक्तिपीठ स्थापित हुए। इसी क्रम में असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर माता सती का 'योनि भाग' गिरा, जो आज जगत प्रसिद्ध और तंत्र साधना का मुख्य केंद्र 'मां कामाख्या मंदिर' कहलाता है।


अम्बुबाची का अर्थ और मां कामाख्या का रजस्वला होना

'अम्बुबाची' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'पानी का प्रस्फुटन' या 'जल का बोलना' माना जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में वर्षा ऋतु के आगमन के साथ मनाया जाता है। इस समय माता कामाख्या को साक्षात प्रकृति के रूप में रजस्वला माना जाता है; ऐसी मान्यता है कि इन तीन से चार दिन वे मासिक धर्म के चक्र से गुजरती हैं। कामाख्या शक्तिपीठ को स्त्री शक्ति, जनन क्षमता और मातृत्व के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में नारी के प्राकृतिक स्वरूप को कितना पूजनीय माना गया है। इन तीन से चार दिनों में मंदिर के गर्भगृह से बहने वाली प्राकृतिक जलधारा पूरी तरह लाल हो जाती है, जिसे बाद में अत्यंत पवित्र 'अम्बुबाची वस्त्र' (रक्त वस्त्र) भक्तों में प्रसाद रूप में बांटा जाता है। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों की संख्या में अघोरी, तांत्रिक, साधु और भक्त नीलांचल पर्वत पर जुटते हैं, जिससे यह पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक समागम बन जाता है।


बंगाली पंचांग और शास्त्रीय तिथि का महत्व--

बंगाली संस्कृति और समाज में अम्बुबाची पर्व का एक अत्यंत विशेष, अनिवार्य और व्यावहारिक स्थान है। बंगाली पंचांग (पांजी) में अम्बुबाची की शुरुआत और अंत का समय बेहद सूक्ष्मता से दिया होता है, जिसमें 'अम्बुबाची प्रवृत्ति' (शुरुआत) और तीन या चार दिनों के बाद 'अम्बुबाची निवृत्ति' (समाप्ति) की सटीक तिथि और समय का स्पष्ट उल्लेख रहता है। बंगाली पंचांग में प्रत्येक आषाढ़ महीने के सात तारीख को ही अंबुबाची शुरू होती है। बंगाली परिवारों में पंचांग की इन तिथियों का बड़ी कड़ाई और श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है, जहाँ प्रवृत्ति के शुरू होते ही घरों के नियम बदल जाते हैं और निवृत्ति के बाद ही गृहशुद्धि और भगवान के मंदिर की शुद्धि कर सामान्य जीवन शुरू होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस काल में पृथ्वी पर सूर्य की किरणें और वर्षा मिलकर एक नया जीवन चक्र शुरू करती हैं, जिससे इसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा के शुद्धिकरण का समय भी माना जाता है।


घरेलू लोकाचार और मंदिर के कपाट बंद रखने की परंपरा--

अम्बुबाची के इन तीन-चार दिनों में केवल कामाख्या मंदिर ही नहीं, बल्कि आम हिंदू घरों के मंदिरों के कपाट भी पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और भगवान के आसन को लाल कपड़े से ढक दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माता के रजस्वला होने के समय पूरी प्रकृति विश्राम की अवस्था में होती है, इसलिए इन दिनों में मूर्तियों या तस्वीरों को छूना, उन्हें स्नान कराना या तिलक लगाना पूरी तरह वर्जित होता है। विशेषतः जिन तस्वीरों में देवी के साथ कोई देवता रहते हैं उनकी भी पूजा नहीं होती। केवल नारायण पूजा और शालिग्राम की पूजा ब्राह्मण करते हैं।घर की महिलाएं इन तीन - चार दिनों में किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रिया या पूजा  नहीं करती हैं। इस दौरान केवल कुल पुरोहित या ब्राह्मण ही बिना मूर्तियों को छुए अत्यंत सात्विक विधि से पूजा करते हैं। इस काल में बिना आग पर पकाए गए भोजन का नियम होने के कारण ब्राह्मण केवल भोग के रूप में माता और देवताओं को दूध और खीरा (ककड़ी) अर्पित करते हैं, और यही दूध-खीरा बाद में परिवार के सदस्यों द्वारा अत्यंत श्रद्धापूर्वक प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।


धरती माता का विश्राम और कृषि निषेध--

माता कामाख्या के साथ-साथ इन दिनों पूरी पृथ्वी यानी धरती माता को भी रजस्वला माना जाता है, जिसके कारण उन्हें जीवनदायिनी और अन्नपूर्णा मानकर पूर्ण विश्राम दिया जाता है। यही कारण है कि अम्बुबाची के दौरान किसी भी प्रकार की खेती या कृषि कार्य पूरी तरह ठप रहता है और खेतों में हल चलाना, कुदाल मारना या मिट्टी खोदना वर्जित माना गया है। यहां तक कि घरों में लगे पौधों की मिट्टी को भी नहीं छुआ जाता और न ही नए पौधे रोपे जाते हैं, क्योंकि इस लोकाचार के पीछे प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और उसे पुनर्जीवित होने का अवसर देने की गहरी समझ छिपी है। तीन - चार दिनों के इस विश्राम के बाद जब धरती की 'निवृत्ति' होती है, तब उसे अधिक उपजाऊ माना जाता है और किसान नए उत्साह के साथ सावन की फसलों की बुआई शुरू करते हैं, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मिक संबंध को दर्शाता है। वही एक और विशेष ध्यान रखा जाता है कि इन दिनों लोग नंगे पैरों चलते हैं ताकि धरती को कोई कष्ट ना हो। पहले के दिनों में लोग खड़ाऊ भी नहीं पहना करते थे क्योंकि इससे धरती माता को कष्ट होगा। इस प्रकार धरती माता का पूरा ध्यान रखा जाता था।


महिलाओं के विशेष नियम: विधवा और सधवा लोकाचार--

पुराने समय से ही बंगाली हिंदू समाज में महिलाओं के लिए अम्बुबाची के दौरान बेहद कड़े और विशिष्ट नियम निर्धारित रहे हैं। विशेष रूप से बंगाली हिंदू विधवा महिलाएं इन तीन दिनों में कठोर तपस्वी जैसा जीवन जीती थीं। वे कुएं, तालाब या नदी का साधारण पानी पीना छोड़कर केवल प्राकृतिक नारियल पानी का सेवन करती थीं और भोजन में पका हुआ अन्न, नमक या मसालों का त्याग कर केवल कंद-मूल, फल और भीगे चने खाती थीं। वे नंगे पैरों चलती और नौका में जाकर रहा करती थी।दूसरी ओर, सधवा (सुहागिन) महिलाओं के लिए भी इस दौरान कई विशेष लोक-नियम थे, जिसके तहत वे इन तीन दिनों में अपने बाल धोना और नाखून काटना पूरी तरह वर्जित मानती थीं और किसी भी प्रकार के मांगलिक या शृंगार के कार्यों की शुरुआत इन दिनों में नहीं की जाती थी।


खान-पान के नियम और सांस्कृतिक प्रासंगिकता--

इन तीन दिनों के दौरान सधवा महिलाएं निरामिष भोजन नहीं करती थी। चौथे दिन जब 'निवृत्ति' होती है, तब घर के कोने-कोने, बिस्तरों, कपड़ों और बर्तनों की धुलाई कर गंगाजल छिड़क कर शुद्धिकरण किया जाता है, जिसके बाद ही मंदिर के पट खुलते हैं, मंदिर की सफ़ाई होती, माता के घट की सफ़ाई होती, फिर तस्वीर या मूर्ति आदि की स्नान कराकर नए वस्त्र पहना कर और सभी अन्य देवी देवताओं को  सुंगधित फूलों से सजाकर भव्य पूजा होती। कई अन्य घरों में महिलाओं को उपवास करने का भी नियम रहा करता था इसलिए निवृत्ति के बाद महिलाएं अपना उपवास भी खोलती थी। संक्षेप में कहें तो, अम्बुबाची केवल एक अंधविश्वास या रूढ़ि नहीं, बल्कि प्रकृति, स्त्रीत्व और जीवन के सम्मान का एक ऐसा उत्सव है जो आधुनिक दौर में भी हमें पर्यावरण संरक्षण और अपनी जड़ों की याद दिलाता है।


डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती

1 comment:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति मेरे नंबर 6377580803

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