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Monday, May 4, 2026

ममता का पालना

 


​रामपुर गाँव की सुबह अमूमन शांत होती थी, लेकिन उस दिन सन्नाटे को चीरती एक मासूम की रुलाई ने सबको झकझोर दिया। गाँव की सीमा पर, कचरे के ढेर के पास एक नन्ही सी जान पड़ी थी, जिसे चींटियाँ काट रही थीं। सरपंच कमलावती सुबह की सैर पर थीं, तभी रुलाई उनके कानों में पड़ी। कूड़े के बीच उस मासूम को देख उनका कलेजा मुँह को आ गया। उन्होंने तुरंत बच्चे को उठाया, आस-पास आवाज़ लगाई, पर वहाँ सन्नाटे के सिवाय कुछ न था। अपने सेवक बजरंगी की मदद से उन्होंने तुरंत गाड़ी मंगवाई और बच्चे को लेकर अस्पताल भागीं।

​अस्पताल में डॉक्टरों ने जब पुलिस केस की बात की, तो कमलावती तल्खी से बोलीं, "मैं गाँव की सरपंच हूँ, कागजी कार्रवाई होती रहेगी, पहले इस जान को बचाइए।"

​अगली शाम पंचायत बैठी। कमलावती के चेहरे पर दृढ़ता और आँखों में आक्रोश था। गाँव के रसूखदार तेजेंदर सेठ और मुनीम लखन सिंह भी अग्रिम पंक्ति में बैठे थे। कमलावती ने गरजकर कहा, "यह उस बच्चे की हार नहीं, हमारी इंसानियत की हार है। किसका खून है यह? कोई तो सामने आओ। यदि कोई मजबूरी है, तो बंद कमरे में बताओ, हम नाम गुप्त रखेंगे।"

​पर मजमा खामोश रहा। गाँव की चुप्पी कमलावती को कचोटने लगी। उन्हें अहसास हुआ कि लोकलाज का डर ममता से कहीं बड़ा हो चुका है।

​अगले कुछ दिनों में कमलावती ने सरकारी 'ममता का पालना' योजना के बारे में जानकारी जुटाई। उन्होंने पंचायत घर के बाहर एक पालना लगवा दिया, ताकि मजबूरी में कोई अपने कलेजे के टुकड़े को कचरे में न फेंके। गाँव के भीमा भाई जैसे कुछ लोगों ने विरोध किया कि इससे अनैतिकता बढ़ेगी, पर कमलावती ने स्पष्ट कहा, "सजा से सोच नहीं बदलती भीमा भाई, कम से कम यहाँ बच्चा सुरक्षित तो रहेगा।"

​शिक्षित युवा अखिलेश और महक ने भी जागरूकता अभियान शुरू किया। उन्होंने युवाओं को समझाया कि 'आकर्षण' और 'मर्यादा' के बीच एक महीन रेखा होती है। हालांकि, उन्हें उपहास और संदेह का सामना करना पड़ा, फिर भी वे अपनी बात पर अडिग रहे।

​कहानी ने मोड़ तब लिया जब 'ममता का पालना' योजना के तहत पुलिस जाँच और डीएनए नमूनों की बात गाँव में फैली। इस डर से कि कहीं सच सामने न आ जाए, सालों से दबे राज रिसने लगे।

​तेजेंदर सेठ के घर काम करने वाली रूपा एक रात कमलावती के पैरों में गिरकर फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने कबूला कि सालों पहले बदनामी के डर से उसने अपना बच्चा जंगल में छोड़ दिया था और मुनीम लखन सिंह ने इस पाप को छिपाने में उसकी 'मदद' की थी। उधर, निःसंतान मानी जाने वाली गोमती का सच भी सामने आया, जिसने समाज के डर से अपने अवैध संबंध की निशानी को कहीं दूर ठिकाने लगाया था।


​कमलावती ने एक बड़ी सभा बुलाई, उम्मीद थी कि सच सामने आने के बाद समाज इन महिलाओं को अपनाएगा और पुरुष अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। लेकिन यथार्थ उम्मीद से कहीं अधिक कड़वा था।

​जब रूपा और गोमती का सच उजागर हुआ, तो गाँव के पुरुषों ने उन्हें सहारा देने के बजाय उन पर 'कुलटा' होने का ठप्पा लगा दिया। लखन सिंह जैसे लोग, जो इस पाप में बराबर के हिस्सेदार थे, साफ मुकर गए और पंचायत में ऊँची आवाज़ में नैतिकता की दुहाई देने लगे। समाज ने इन बच्चों को 'भविष्य' मानने के बजाय 'कलंक' की पहचान दे दी।

​कमलावती ने महसूस किया कि उन्होंने पालना तो रखवा दिया, पर लोगों के दिलों के दरवाजे अब भी बंद हैं। उन्होंने उन बच्चों के लिए एक छोटा अनाथालय तो शुरू किया, लेकिन गाँव का कोई भी 'कुलीन' परिवार उन्हें अपनाने को तैयार नहीं हुआ।

​कहानी के अंत में, 'ममता का पालना' अब भी पंचायत घर के बाहर टंगा है। वह अब खाली तो रहता है, पर इसलिए नहीं कि समाज सुधर गया है, बल्कि इसलिए क्योंकि अब बदनामी के डर से लोग बच्चों को छोड़ने के बजाय और भी खौफनाक रास्ते चुनने लगे हैं। कमलावती उसी पालने के पास खड़ी होकर डूबते सूरज को देख रही थीं। उन्हें समझ आ गया था कि सरकारी योजनाएँ जान बचा सकती हैं, पर सदियों से जमी सामाजिक सड़ांध को एक दिन में साफ नहीं किया जा सकता।

​रामपुर का वह मासूम अब स्कूल जाने लगा था, पर गाँव के अन्य बच्चे उसके साथ नहीं खेलते थे। वह बच्चा 'रामपुर का भविष्य' नहीं, बल्कि रामपुर की 'चुप्पी' का जीता-जागता स्मारक बनकर रह गया था।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती

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