श्यामली और संजू की शादी को 5 साल बीत चुके थे। बाहर से देखने वालों के लिए यह एक सुखी परिवार था, पर पड़ोसियों को कभी भनक तक न लगी कि जो श्यामली हर सुबह मुस्कुराकर नमस्ते करती है, उसकी रातें किन सिसकियों में गुज़रती हैं।
नन्हीं सृति को अपनी माँ की ख़ामोश पीड़ा का कोई अंदाज़ा नहीं था। उसके लिए तो पिता का इंतज़ार करना एक रोज़ का खेल था। हर रात जब संजू घर लौटता, सृति की नींद उड़ जाती। वह अपने पापा की पीठ पर चढ़ती, उनके साथ खेलती और तभी सोती। सृति कभी-कभी अपनी माँ को परेशान करना भी एक खेल समझ लेती, यह सोचे बिना कि उसकी माँ का दिल पहले से ही कितना लहूलुहान है। श्यामली अपनी बेटी को इतना चाहती थी कि वह अपनी सारी तकलीफें रसोई की दीवारों के पीछे छुपा लेती। वह अकेले में रो लेती, आँखों के घेरे साफ़ कर लेती, लेकिन सृति के सामने आते ही उसके चेहरे पर एक बनावटी मगर प्यारी मुस्कान सज जाती।
हर शुक्रवार की रात संजू का वही संवाद गूँजता जब वो घर बैठे देर रात तक शराब पीता और टीवी पर नेटफ्लिक्स या अमेजन पर हिंसात्मक नाटक देखा करता। फिर श्यामली से जल्दी सृति को लेकर सोने के लिए कह देता। मगर नन्ही बच्ची अपने पिता के इंतज़ार में जागी रहती। श्यामली के सुलाने पर भी नहीं सोती क्योंकि उसे तो उसके पापा चाहिए। फिर वही होता, सृति को जगा हुआ देख संजू श्यामली पर तंज कसता, "सृति बेटा, तेरा बाप अभी ज़िंदा है... तुझे किसी की ज़रूरत नहीं।" इन शब्दों से वह श्यामली के अस्तित्व को हर रोज़ काटता था। जब कभी श्यामली ने हिम्मत जुटाकर संजू को टोकना चाहा या अपनी सफ़ाई देनी चाही, तो संजू का चेहरा भयानक हो जाता। वह अपनी आवाज़ इतनी ऊँची कर लेता कि श्यामली का गला सूख जाता, और कई बार तो अपनी बात कहना उसे भारी पड़ता जब संजू का हाथ उस पर उठ जाता।
थप्पड़ की वह गूँज घर की दीवारों में ही दब जाती। श्यामली ने एक उम्मीद के साथ अपने सास-ससुर से बात करने की कोशिश की थी। उसे लगा था कि शायद वे एक औरत का दर्द समझेंगे। लेकिन उन्होंने भी उसे ही गलत ठहरा दिया। "संजू कमाता है, थका-हारा आता है, तुझे ही थोड़ा चुप रहना चाहिए,"—सास के इन शब्दों ने श्यामली को एहसास दिला दिया कि वह इस घर में बिल्कुल अकेली है। उसके सास-ससुर 'मूक दर्शक' मात्र नहीं थे, बल्कि वे अपनी चुप्पी से संजू के जुल्मों को खाद-पानी दे रहे थे।
लेकिन धैर्य की भी एक सीमा होती है। जब संजू ने सृति के मन में अपनी माँ के प्रति ज़हर घोलना शुरू किया और उसे बेकार माँ साबित करने की कोशिश की, तो श्यामली के भीतर की 'माँ' जाग गई। उसे समझ आ गया कि अगर वह आज नहीं रुकी, तो सृति भी इसी ज़हरीले माहौल को 'नॉर्मल' समझकर बड़ी होगी। इसलिए वह संजू से तलाक लेने का फैसला कर लेती है।
जब तलाक का केस कोर्ट में पहुँचा, तो संजू और उसका परिवार निश्चिंत था। उन्हें लगा कि बंद कमरे की बातें बाहर कैसे आएँगी? लेकिन जब श्यामली ने तारीखों, घटनाओं और उन खामोश ज़ख्मों के सबूत पेश किए, तो सबका भ्रम टूट गया। मोहल्ले वाले भी स्तब्ध रह गए यह जानकर कि 'शांत' दिखने वाले संजू का असली चेहरा क्या है।
कोर्ट में संजू ने बड़ी शेखी बघारी कि सृति उसके बिना नहीं रह सकती, श्यामली उसका पालन पोषण नहीं कर सकेगी, उसने आज तक एक पैसा भी नहीं कमाया है। कोर्ट श्यामली को एलिमनी के तौर पर कुछ रुपया लेने की सलाह देता है तब श्यामली ने चट्टान की तरह खड़े होकर कहा:
"मुझे संजू से एक पैसा भी नहीं चाहिए। न कोई एलिमनी, न कोई जायदाद। मैं अपनी बेटी को उस घुटन से आज़ाद करना चाहती हूँ जहाँ सम्मान की बलि देकर प्यार का ढोंग किया जाता है। मैं इतनी सक्षम हूँ कि अपनी बेटी का भविष्य अपने दम पर बना सकूँ।"
जज ने श्यामली के साहस और संजू के व्यवहार को देखते हुए सृति की कस्टडी श्यामली को दे दी। कोर्ट से बाहर निकलते समय श्यामली का सिर गर्व से ऊँचा था। उसने सृति का हाथ थामकर एक ऐसी दुनिया की ओर कदम बढ़ाया जहाँ अब कोई डर नहीं था।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
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