शम्पा ने अभी-अभी घर के बाहर झाड़ू लगाया था। कूड़ा-कचरा एक डिब्बे में भरकर, वह उसे गेट के बाहर रखकर घर में मुड़ी ही थी कि एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति तेज़ी से आया और कूड़े के पास रुक गया। वह डिब्बे को टटोलने लगा और उसमें से कोई आधी रोटी का सूखा टुकड़ा निकालकर खाने लगा।
आज एकादशी थी, इसलिए शम्पा ने घर की साफ़-सफ़ाई कर कूड़ा बाहर रखा था। आज रसोई में कुछ नहीं पकना था। वह केवल नारियल पानी पीकर दिन भर काम चलाएगी, और शाम को थोड़े से मीठे आलू उबालकर सेंधा नमक के साथ खाएगी।
शम्पा विधवा थी, और अकेली भी। शादी के बाद घर सास-ससुर और पति से भरा-पूरा था। शम्पा का एक बेटा भी हुआ था, मगर वह सात साल का होते-न-होते ही दुनिया छोड़कर चला गया। उसी सदमे में ससुर जी भी गुज़र गए। लोगों ने कहा कि यह सब लड़के की मृत्यु में त्रिपाद दोष के कारण हुआ है। परिवार आधुनिक विचारों वाला था, इसलिए इस दोष का कोई निवारण नहीं किया गया। फिर क्या हुआ, सास, ससुर और फिर पति—तीनों की मृत्यु हो गई। पड़ोसियों के बार-बार कहने पर शम्पा ने पुरोहित को बुलाकर सभी का अंतिम संस्कार पूरा करवाया तथा दोष का भी निवारण करवाया और तब से विधवाओं के सारे नियमों का पालन करने लगी।
शम्पा की नज़र जब गेट पर पड़ी, तो वह 'हट! हट!' कहकर आगे बढ़ी। उसने देखा कि वह व्यक्ति, जो कचरा उठाकर खा रहा था, उसे देखकर दाँत निकालकर हँस रहा था। शम्पा को बहुत बुरा लगा। उसने उसे डाँटकर भगा दिया। बेचारा दुःखी और उदास चेहरा लिए, धीरे-धीरे चला गया। उसके जाने के बाद शम्पा ने कूड़े के डिब्बे को अच्छी तरह बंद किया, माथे पर शिकन लाते हुए घर के अंदर चली गई।
नहा-धोकर उसने पूजा घर में बैठकर ध्यान और पूजा की। फिर घर के दूसरे कामों में लग गई। आज उसे श्यामानंद आश्रम भी जाना था, जहाँ कीर्तन होने वाला था। घर की इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद, उसका मन भगवान की भक्ति में लगना लाज़मी था। साथ ही, मायके वालों का भी दबाव था। वे सभी ठाकुर भक्त थे, इसलिए शम्पा को उनकी बात माननी ही थी, वरना वे उससे किनारा कर लेते।
शाम को जब शम्पा आश्रम जाने लगी, तो रास्ते में वही पागल दिखा। वह उसके घर से दो घर आगे, एक नाले के किनारे, बिजली के खंभे से सटकर बैठा था और ठंड से काँप रहा था। शाम के अँधेरे में शम्पा को पता नहीं चला कि उसे अभी-अभी किसी ने गुस्से में पानी से भिगोकर सज़ा दी है। शम्पा उसे देखकर थोड़ी देर रुकी, फिर वहाँ से आश्रम की ओर चली गई।
आश्रम में भजन चल रहा था, लेकिन शम्पा का मन आज नहीं लग रहा था। उसे बार-बार वह पागल याद आ रहा था। सुबह उसे देखकर जो बातें उसने महसूस की थीं, वे सब तस्वीर की तरह उसके मन में उतर गई थीं। बेचारा अधेड़ उम्र का था, लेकिन गरीबी, भूख और तकलीफ़ों ने उसके शरीर का सारा तेज छीन लिया था। न जाने वह कब से घर से बिछड़ा होगा। उसके कपड़ों में इतनी धूल और गंदगी थी कि पास जाने पर बदबू से उल्टी आ जाए। सिर के बाल उलझे हुए थे और मैल से आधे सफ़ेद हो चुके थे। लेकिन चेहरा देखने पर एक मासूमियत झलकती थी। दाढ़ी के बीच भी जैसे कोई छोटा बच्चा झाँक रहा हो, ऐसा लगता। शम्पा को समझते देर नहीं लगी कि बेचारा मानसिक रूप से बीमार होगा, और घर वालों ने ही उसे छोड़ दिया होगा।
शम्पा से ज़्यादा देर कीर्तन में बैठा नहीं गया। वह घर के लिए निकल पड़ी। गली में जब पहुँची, तो देखा कि वह पागल वहीं बैठा था और ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। उसे देखकर शम्पा की भी आँखों में आँसू आ गए। हिम्मत करके वह उसके पास गई और पूछा कि वह कौन है और क्यों रो रहा है। वह दुःख से हकलाने लगा और बस इतना बोला:
“ऊऊऊ... मुझे मारा! आंटी ने मारा! खाना भी नहीं दिया... मैं... मैं...”
शम्पा उसकी पूरी बात नहीं समझ पाई। तब शम्पा ने उसे खाना देने की बात कही। यह सुनकर वह पागल ऐसे देखता है, जैसे कोई मासूम बच्चा हो। शम्पा ने उसे अपने पीछे आने को कहा। वह डरा-सहमा-सा उसके पीछे आया। शम्पा ने उसे घर के गेट के अंदर एक कोने में बैठने का इशारा किया और भीतर चली गई।
एकादशी का व्रत होने के बावजूद, शम्पा ने आज दाल-चावल की खिचड़ी बना दी और कुछ आलू की सब्ज़ी भी तल दी। एक पुरानी थाली में खाना परोसकर, वह उसके सामने ले गई। खाना देखते ही वह पागल इतना बेताब हो गया कि झपटकर शम्पा के हाथ से थाली ले ली और खाने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, गरम खिचड़ी से उसका हाथ जल गया। गुस्से में आकर वह थाली फेंकने वाला था कि शम्पा ने डाँटकर उसे रोक दिया। पागल सहम गया। शम्पा ने उसे थाली ज़मीन पर रखकर, किनारे से खाने को कहा। इस पर वह दोबारा न समझते हुए, किनारे से बड़ा निवाला लेता है। इस बार उसके मुँह में गरम खिचड़ी गई, जिससे उसकी जीभ जल गई और वह रोने लगा।
शम्पा का धैर्य टूट गया। वह न चाहते हुए भी, अब अपने हाथों से उस बेचारे को खाना खिलाना शुरू करती है। इस बार वह पागल शम्पा के हाथों से खाना खाकर, एक मासूम बच्चे की तरह शांत हो जाता है।
पास वाले घर के पाल बाबू तब तक यह तमाशा देख रहे थे। जल्द ही यह बात आग की तरह कॉलोनी में फैल गई। लोग एक-एक कर शम्पा के घर के सामने जमा हो गए।
पाल बाबू ने शम्पा की तरफ़ ताने मारते हुए कहा,
“ऐसे तो बड़े धार्मिक बनते हो, आचार-विचार का बड़ा दिखावा करते हो, लेकिन यह ग़लत काम कब से शुरू कर दिया?”
शम्पा को उनकी बात साफ़ समझ नहीं आई। उसने पूछा,
“किसने ग़लत काम किया है काका? और क्या किया है? क्या आप मुझे सुना रहे हैं?”
पाल बाबू गुस्से में बोले,
“अरे अपशगुनी! पूरे परिवार को खा गई! अब यह क्या नया ड्रामा है? इस पागल को घर में क्यों घुसा लाई?”
शम्पा को बात समझते देर न लगी। उसने पलटकर कहा,
“आप कौन होते हैं यह तय करने वाले कि मेरे घर में क्या चल रहा है? क्या मैं जो भी करूँ, उसकी सफ़ाई आपको दूँगी? क्या आँखों से नहीं दिखता कि यह यहाँ खाना खा रहा है? बेचारा भूखा था और ठंड से काँप रहा था, तो मैंने उसे खाना दिया! क्या मैंने पाप किया?”
इस पर पाल बाबू और भड़क गए और बोले,
“तेरी हिम्मत कैसे हुई! मैं तुझे इस कॉलोनी में रहने नहीं दूँगा! अभी तुझे बाहर करवाता हूँ!”
पाल बाबू की यह सब बातें कॉलोनी के दूसरे लोग भी सुन रहे थे। उन्हें पाल बाबू पर गुस्सा आया। कुछ लोग शम्पा की तरफ़ से, तो कुछ पाल बाबू की तरफ़ से बहस करने लगे। इस लड़ाई-झगड़े के कारण वह बेचारा पागल ठीक से खाना भी नहीं खा पाया। पाल बाबू उसे लात मारने की कोशिश करते हैं कि तभी शम्पा सामने आकर उन्हें रोकते हुए कहती है,
“बहुत हो गया! यह मेरा घर है, मेरे पति का। इस घर की मालकिन मैं हूँ। मैं न तो आप लोगों का दिया खाती हूँ, न पहनती हूँ। एक इंसान होने के नाते मैंने इस बेचारे को खाना खिलाया, उस पर आप लोगों को इसलिए आपत्ति है, क्योंकि मैं विधवा हूँ और जवान हूँ? याद रखिए, मैं एक बच्चे की माँ भी थी। यह बेचारा भी मानसिक रूप से कमज़ोर, एक छोटे बच्चे जैसा ही है। मुझे लगा कि इसे भोजन और सहारा चाहिए, सो मैंने दिया। कोई पाप नहीं किया। आगे भी इसकी ऐसे ही मदद करूँगी।”
शम्पा की बात सुनकर बाकी लोगों को भी उसमें सच्चाई दिखी, सो उन्होंने भी उसका समर्थन किया। पाल बाबू लड़ाई में हार गए और शम्पा को बदनाम करने की धमकी देकर वहाँ से चले गए।
लेकिन शम्पा अपनी बात पर अडिग रही। शायद उसे अब अपने अकेले जीवन में एक मक़सद मिल चुका था। उसने उस पागल की सेवा करके ही, आगे ऐसे लाचार लोगों के जीवन में कुछ अच्छा करने के विचार को ही अपना लक्ष्य बनाने की ठान ली थी।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
के आर पूरा बंगलुरू 36
8217797037

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