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Sunday, May 17, 2026

अंधी ममता और कांच के रिश्ते

 


कोलकाता के बेहाला इलाके के एक पुराने पुश्तैनी मकान में उस दोपहर अजीब सी खामोशी छाई थी। रूपक और रानी अपना सामान समेट कर सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे। रूपक, जो एक मामूली सरकारी क्लर्क था, उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं; लेकिन उसकी माँ ऊषा देवी ने बेरुखी से मुँह फेर लिया। उनकी ममता तो अपने छोटे बेटे दीपक पर बरस रही थी, जो स्कूल में एक ऊंचे पद पर शिक्षक था और अच्छी तनख्वाह लाता था। दीपक की पत्नी टुशी दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी और उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। उसे पता था कि घर के असली मालिक अब वही और उसका बेटा हैं।

उनके जाते ही टुशी ने दरवाज़ा बंद कर दिया और 'हूँह' करती हुई अपने ऊपर वाले कमरे में चली गई। उधर रानी अपनी दोनों बेटियों को ऑटो में बिठाते समय मुड़कर उस घर की तरफ देख रही थी। उसकी आँखों में वे दिन किसी चलचित्र की तरह तैरने लगे जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। सास ऊषा देवी ने उसका वरण किया था, घी के दीये से उसका मुख देखा था और बाएं हाथ में सोने से मढ़ा नोवा (लोहे का कंगन) पहनाया था। आज वही घर उसके लिए पराया हो गया। वर्षों तक उसने इस घर की निस्वार्थ सेवा की थी, पर आज उसकी कोई कदर नहीं थी।

जब तक देवर जी की शादी नहीं हुई थी, तब तक तो ऊषा देवी सास की मर्यादा में रहीं। पर छोटे बेटे की अच्छी नौकरी क्या लगी, उन्होंने न सिर्फ बहू से, बल्कि अपने बड़े बेटे तक से मुँह मोड़ लिया। अपनी बेटियों और पति को भी इस घर में घुटता देख आखिरकार रानी के सब्र का बांध टूट गया था।


रानी की बड़ी बेटी स्कूल में पढ़ती थी। छोटी बेटी के जन्म के बाद नियम के मुताबिक एक माह तक जच्चा घर (कमरे) से बाहर नहीं आ सकती थी। बड़ी बेटी जब स्कूल से थककर आती, तो उसे आधा-पौन घंटा इंतजार करना पड़ता, तब कहीं जाकर खाना मिलता। "चाची फोन पर हैं", "चाची मुन्ने को सुला रही हैं"—बस यही बहाने मिलते थे। घर में मछली पकती, लेकिन बेचारी बच्ची के हिस्से अक्सर दाल-भात और भुजिया ही आती थी। रूपक कभी छुट्टी पर होता और उसकी नजर इन बातों पर जाती, तो वह पूछ लेता। तब जेठ के सामने टुशी की हिम्मत न होती कि कोई बहाना बनाए, इसलिए उन दिनों समय पर ठीक से खाना मिल जाता था। रानी बेचारी अपने कमरे में बंद यह सब देखती और अंदर ही अंदर  कुढ़ती रहती।


लेकिन बात तब और बिगड़ गई जब दोनों भाइयों में ही तकरार हो गई। बात केवल इतनी थी कि घर में अब सदस्यों की संख्या बढ़ गई थी, इसलिए एक-दो कमरे और बनवाने थे। दीपक ने अपनी पत्नी के उकसाने पर इसका पूरा खर्च बड़े भाई पर ही छोड़ दिया और अपने पैसों से वह अलग जमीन लेने की सोच रहा था। जब रूपक ने इसका विरोध किया कि उसके पास अकेले दो कमरे बनवाने का सामर्थ्य नहीं है और दीपक को भी इसमें मदद करनी होगी, तो दोनों भाइयों में फूट पड़ गई। वैसे भी दीपक शुरू से ही आत्मकेंद्रित था, इसलिए सारा दोष अकेले टुशी पर मढ़ा नहीं जा सकता था। धीरे-धीरे यह दरार इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों ने अलग होने का फैसला कर लिया। फिर क्या था, वह दिन और आज का दिन—रानी की आँखों में सब कुछ साफ हो चुका था कि टुशी की चालों की वजह से ही आज यह नौबत आई थी।


जब रूपक और रानी घर से चले गए, तो ऊषा देवी को धीरे-धीरे अकेलेपन का अहसास होने लगा। कुछ दिन बाद वे अपनी बेटी मंजू के घर रहने चली गईं। उनकी बेटी को दोनों भाइयों के अलग होने की सारी बातें पता थीं। जब ऊषा देवी वहाँ रहने आईं, तो बेटी ने माँ को समझाया कि उन्हें अपने बड़े बेटे से भी रिश्ता बनाए रखना चाहिए, ताकि समाज में घर टूटने की भनक किसी को न लगे। ऊषा देवी भी इस बात पर विचार करने लगीं। वे कुछ दिन और अपनी बेटी के यहाँ रुकने वाली थीं। जब से उनके पति का देहावसान हुआ था, वे अक्सर अपनी बेटी के घर चली जाया करती थीं। उनकी बेटी के घर के बगल में एक बड़ा सा काली माता का मंदिर था, जहाँ उनके पति ही उन्हें पहली बार लेकर गए थे। वे उस मंदिर में जातीं और अपने पति की याद में घंटों माता के दर्शन करते हुए परलोक में उनसे दोबारा मिलने की प्रार्थना करती रहती थीं।


इधर, जब सूने घर में टुशी को एकांत मिला, तो उसका असली खेल शुरू हो गया। वह इस कदर अंधी हो गई कि अपने बेटे तक को भूल गई।


दरअसल, विवाह से पहले भी टुशी के कई अनैतिक संबंध थे, जिन्हें छिपाकर उसके माता-पिता ने उसकी शादी दीपक से कर दी थी। शादी के बाद भी वह उन संबंधों में लिप्त रही, लेकिन जब उसे लगा कि दीपक को शक हो सकता है, तो उसने चालाकी से एक बेटे को जन्म दिया ताकि दीपक का भरोसा जीता जा सके। दीपक, जो अपनी पत्नी के मोह में अंधा था, उसकी हर जायज-नाजायज मांग पूरी करता रहा। घर का सारा काम बड़ी भाभी रानी संभालती थीं, जबकि टुशी अक्सर बीमारी का बहाना बनाकर या मायके जाने की जिद करके काम से बच जाती थी। जब रानी भाभी को दूसरी बेटी हुई, तो ऊषा देवी का भेदभाव और बढ़ गया क्योंकि दीपक के पास बेटा था और एक अच्छी नौकरी भी। अंततः इसी अपमान और पक्षपात से थककर रूपक अपनी पत्नी और बेटियों को लेकर अलग रहने चला गया था।


अब टुशी दिनभर बेटे को पढ़ाने के नाम पर कमरे में बंद रहने लगी और अपने प्रेमियों से फोन पर बातें करने लगी। यहाँ तक कि दीपक की गैर-मौजूदगी में एक अनजान आदमी उससे मिलने भी आने लगा था। पति और बेटा स्कूल चले जाते, सास पहले से ही घर में नहीं थी; इसी बात का फायदा वह उठा रही थी।


एक दिन दीपक को उसके बेटे के स्कूल से फोन आया कि वह आकर बच्चे को ले जाए क्योंकि उसकी माँ उसे लेने नहीं आई है। वास्तव में, स्कूल प्रशासन ने टुशी को कई बार फोन किया था, लेकिन उसका फोन लगातार व्यस्त आ रहा था। जब दीपक बेटे को लेने स्कूल पहुँचा, तो वहाँ जो कुछ उसने सुना, उससे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। स्कूल के कर्मचारियों ने बताया कि टुशी अक्सर बच्चे को स्कूल छोड़कर किसी आदमी के साथ उसकी बाइक पर चली जाती थी। कई बार वही अनजान व्यक्ति उसके बेटे को स्कूल से लेने भी आता था, जिसका परिचय टुशी ने स्कूल वालों से 'मामा' के रूप में करवाया था।


जब दीपक ने रास्ते में बेटे से पूछा, तो बच्चे ने मासूमियत से बताया कि माँ ने ही उसे उस आदमी को 'मामा' कहकर बुलाना सिखाया है। दीपक ने पहले सोचा कि शायद वह उसका साला 'तपन' होगा, जो आजकल उनके घर के नजदीक ही एक कपड़े की दुकान में काम करता है। लेकिन जब बेटे ने बताया कि वह उसके सगे मामाओं में से कोई नहीं है, तो दीपक सन्न रह गया। वह बेटे को लेकर जल्दी-जल्दी घर लौटा। लौटते समय उसके मन में कई अनुत्तरित सवाल और एक गहरा डर समा गया था, लेकिन वह बेटे के सामने खुद को शांत बनाए रहा।


जैसे ही उसने घर में कदम रखा, सीढ़ियों के पास से ही उसे टुशी के हंस-हंसकर बात करने और आपत्तिजनक आवाजें सुनाई देने लगीं। वह तेजी से ऊपर पहुँचा और उसने टुशी को रंगे हाथों फोन पर अश्लील बातें करते पकड़ लिया।

जब दीपक ने गुस्से में उस पर हाथ उठाया, तो टुशी ने पहले तो रोना-धोना मचाया, लेकिन फिर तुरंत ही खुद को संभाल लिया। दीपक गहरे आक्रोश और घृणा में अपने बेटे को लेकर तुरंत घर से निकल गया और अपनी बहन मंजू के घर जा पहुँचा। उसने वहाँ बेटे को खाना खिलाया और अपनी माँ और बहन से बच्चे का ध्यान रखने को कहकर, दोबारा अपने घर की तरफ निकल पड़ा। इधर ऊषा देवी और मंजू को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हुआ है।


उधर, टुशी ने तुरंत अपने प्रेमी को फोन कर सब कुछ बता दिया। प्रेमी के समझाने पर उसने एक भयानक साजिश रची। उसने खुद को चोट पहुँचाई और दीपक पर घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न का झूठा केस दर्ज कराने की ठान ली। दीपक जब घर पहुँचा और उसे टुशी की इस खौफनाक मंशा का पता चला, तो वह अपनी सामाजिक साख और सरकारी नौकरी बचाने के लिए घुटनों पर आ गया और उससे हाथ जोड़कर माफी मांगने लगा।


टुशी ने सोफे पर बैठकर बेहद ठंडे और क्रूर स्वर में अपनी शर्तें रखीं। उसने कहा, "दीपक, अगर जेल नहीं जाना चाहते तो मेरी बात कान खोलकर सुन लो। तुम्हारी यह विधवा माँ अब से इस घर में नहीं रहेगी। मुझे अपने जीवन में किसी की रोक-टोक पसंद नहीं। न तुम्हारा भाई कभी यहाँ आएगा और न ही कोई और रिश्तेदार। मैं अपनी मर्जी से जिऊंगी; किससे मिलूंगी, यह मेरा फैसला होगा। मैं अपने प्रेमी से मिलूँ या उसे घर पर बुलाऊँ, तुम चूँ तक नहीं करोगे। अगर तुमने दोबारा मुझ पर हाथ उठाया या मेरे निजी जीवन में दखल दिया, तो घरेलू हिंसा के केस में तुम्हें सलाखों के पीछे सड़वा दूंगी।"

दीपक बेबसी और लाचारी से दीवार पर टंगी अपने दिवंगत पिता की तस्वीर की ओर देखने लगा। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह सुन्न कदमों से घर से निकला और वापस अपनी बहन के घर आया। उसने जब माँ और बहन को यह सब बताया, तो दोनों के होश उड़ गए। ऊषा देवी, जिन्होंने अपनी ममता का गलत चुनाव किया था, उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि जिस छोटी बहू पर वे इतना नाज़ करती थीं, वह इतनी शातिर और चरित्रहीन निकलेगी।


अब ऊषा देवी को इस बात का डर सताने लगा कि अगर उनके कुल का यह बिखराव और बदनामी लोगों के सामने आई, तो समाज में उनका क्या मुंह रहेगा। लोक-लाज के डर से उन्होंने दीपक को समझा-बुझाकर नाती के साथ वापस घर भेज दिया और टुशी से जैसे-तैसे सुलह करने की अपील की।

दीपक माँ के कहने पर उस चौखट के भीतर लौट तो आया, लेकिन अब वह मकान उसके लिए 'घर' नहीं रह गया था। उस पुश्तैनी मकान में रिश्तों की गरिमा और पवित्रता हमेशा के लिए दम तोड़ चुकी थी। दीपक अपने ही घर में एक मूक कैदी बनकर रह गया था, जहाँ हुकूमत केवल टुशी और उसके अनैतिक फैसलों की थी।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

बैंगलोर

Monday, May 4, 2026

ममता का पालना

 


​रामपुर गाँव की सुबह अमूमन शांत होती थी, लेकिन उस दिन सन्नाटे को चीरती एक मासूम की रुलाई ने सबको झकझोर दिया। गाँव की सीमा पर, कचरे के ढेर के पास एक नन्ही सी जान पड़ी थी, जिसे चींटियाँ काट रही थीं। सरपंच कमलावती सुबह की सैर पर थीं, तभी रुलाई उनके कानों में पड़ी। कूड़े के बीच उस मासूम को देख उनका कलेजा मुँह को आ गया। उन्होंने तुरंत बच्चे को उठाया, आस-पास आवाज़ लगाई, पर वहाँ सन्नाटे के सिवाय कुछ न था। अपने सेवक बजरंगी की मदद से उन्होंने तुरंत गाड़ी मंगवाई और बच्चे को लेकर अस्पताल भागीं।

​अस्पताल में डॉक्टरों ने जब पुलिस केस की बात की, तो कमलावती तल्खी से बोलीं, "मैं गाँव की सरपंच हूँ, कागजी कार्रवाई होती रहेगी, पहले इस जान को बचाइए।"

​अगली शाम पंचायत बैठी। कमलावती के चेहरे पर दृढ़ता और आँखों में आक्रोश था। गाँव के रसूखदार तेजेंदर सेठ और मुनीम लखन सिंह भी अग्रिम पंक्ति में बैठे थे। कमलावती ने गरजकर कहा, "यह उस बच्चे की हार नहीं, हमारी इंसानियत की हार है। किसका खून है यह? कोई तो सामने आओ। यदि कोई मजबूरी है, तो बंद कमरे में बताओ, हम नाम गुप्त रखेंगे।"

​पर मजमा खामोश रहा। गाँव की चुप्पी कमलावती को कचोटने लगी। उन्हें अहसास हुआ कि लोकलाज का डर ममता से कहीं बड़ा हो चुका है।

​अगले कुछ दिनों में कमलावती ने सरकारी 'ममता का पालना' योजना के बारे में जानकारी जुटाई। उन्होंने पंचायत घर के बाहर एक पालना लगवा दिया, ताकि मजबूरी में कोई अपने कलेजे के टुकड़े को कचरे में न फेंके। गाँव के भीमा भाई जैसे कुछ लोगों ने विरोध किया कि इससे अनैतिकता बढ़ेगी, पर कमलावती ने स्पष्ट कहा, "सजा से सोच नहीं बदलती भीमा भाई, कम से कम यहाँ बच्चा सुरक्षित तो रहेगा।"

​शिक्षित युवा अखिलेश और महक ने भी जागरूकता अभियान शुरू किया। उन्होंने युवाओं को समझाया कि 'आकर्षण' और 'मर्यादा' के बीच एक महीन रेखा होती है। हालांकि, उन्हें उपहास और संदेह का सामना करना पड़ा, फिर भी वे अपनी बात पर अडिग रहे।

​कहानी ने मोड़ तब लिया जब 'ममता का पालना' योजना के तहत पुलिस जाँच और डीएनए नमूनों की बात गाँव में फैली। इस डर से कि कहीं सच सामने न आ जाए, सालों से दबे राज रिसने लगे।

​तेजेंदर सेठ के घर काम करने वाली रूपा एक रात कमलावती के पैरों में गिरकर फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने कबूला कि सालों पहले बदनामी के डर से उसने अपना बच्चा जंगल में छोड़ दिया था और मुनीम लखन सिंह ने इस पाप को छिपाने में उसकी 'मदद' की थी। उधर, निःसंतान मानी जाने वाली गोमती का सच भी सामने आया, जिसने समाज के डर से अपने अवैध संबंध की निशानी को कहीं दूर ठिकाने लगाया था।


​कमलावती ने एक बड़ी सभा बुलाई, उम्मीद थी कि सच सामने आने के बाद समाज इन महिलाओं को अपनाएगा और पुरुष अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। लेकिन यथार्थ उम्मीद से कहीं अधिक कड़वा था।

​जब रूपा और गोमती का सच उजागर हुआ, तो गाँव के पुरुषों ने उन्हें सहारा देने के बजाय उन पर 'कुलटा' होने का ठप्पा लगा दिया। लखन सिंह जैसे लोग, जो इस पाप में बराबर के हिस्सेदार थे, साफ मुकर गए और पंचायत में ऊँची आवाज़ में नैतिकता की दुहाई देने लगे। समाज ने इन बच्चों को 'भविष्य' मानने के बजाय 'कलंक' की पहचान दे दी।

​कमलावती ने महसूस किया कि उन्होंने पालना तो रखवा दिया, पर लोगों के दिलों के दरवाजे अब भी बंद हैं। उन्होंने उन बच्चों के लिए एक छोटा अनाथालय तो शुरू किया, लेकिन गाँव का कोई भी 'कुलीन' परिवार उन्हें अपनाने को तैयार नहीं हुआ।

​कहानी के अंत में, 'ममता का पालना' अब भी पंचायत घर के बाहर टंगा है। वह अब खाली तो रहता है, पर इसलिए नहीं कि समाज सुधर गया है, बल्कि इसलिए क्योंकि अब बदनामी के डर से लोग बच्चों को छोड़ने के बजाय और भी खौफनाक रास्ते चुनने लगे हैं। कमलावती उसी पालने के पास खड़ी होकर डूबते सूरज को देख रही थीं। उन्हें समझ आ गया था कि सरकारी योजनाएँ जान बचा सकती हैं, पर सदियों से जमी सामाजिक सड़ांध को एक दिन में साफ नहीं किया जा सकता।

​रामपुर का वह मासूम अब स्कूल जाने लगा था, पर गाँव के अन्य बच्चे उसके साथ नहीं खेलते थे। वह बच्चा 'रामपुर का भविष्य' नहीं, बल्कि रामपुर की 'चुप्पी' का जीता-जागता स्मारक बनकर रह गया था।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती

अंधी ममता और कांच के रिश्ते

  कोलकाता के बेहाला इलाके के एक पुराने पुश्तैनी मकान में उस दोपहर अजीब सी खामोशी छाई थी। रूपक और रानी अपना सामान समेट कर सीढ़ियों से नीचे उत...