नवंबर की वह ढलती हुई शाम थी। खिड़की के पल्लों से टकराकर आती ठंडी हवा मीरा के चेहरे को छूकर गुजर गई, पर उसके भीतर की तपन को कम न कर सकी। दीवार पर टंगे कैलेंडर की तारीख जैसे चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी कि उनकी शादी को चौदह साल हो चुके हैं। चौदह साल का यह लंबा अरसा मीरा के लिए हर रोज एक नए कुरुक्षेत्र में निहत्थे उतरने जैसा था। रसोई में चाय का उबलता हुआ पानी उसकी अपनी जिंदगी जैसा ही था—जो धीमी आंच पर लगातार सुलग रहा था और बाहर आने का रास्ता ढूंढ रहा था।
तभी हॉल से बाबन की भारी और तीखी आवाज गूंजी, "मीरा! मेरी वो नीली वाली फाइल कहाँ है?"
मीरा ने अभी जवाब देने के लिए मुंह खोला ही था कि हमेशा की तरह बाबन का ताना हवा में तैर गया, "एक पागल औरत को कोई काम सौंपने का यही नतीजा होता है। खुद भुगतो अब!"
मीरा चाय की केतली बंद कर झटपट हॉल में आई और शांत स्वर में बोली, "रुको बाबन, मैं लाकर देती हूँ। तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हें यह वाली फाइल भी चाहिए? मैं पहले ही निकाल कर रख देती।"
बाबन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने सोफे पर पड़े कुशन को झटके से हटाते हुए कहा, "तुम रखकर खुद भूल गई होगी! तुम्हारा दिमाग ठिकाने रहता है कभी? मेंटल कहीं की!"
यह शब्द अब मीरा के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह नहीं चुभता था। बाबन ने सालों से इस शब्द को इतनी बार, इतने अलग-अलग तरीकों से दोहराया था कि मीरा के आत्मसम्मान की मजबूत दीवारें अब चटक चुकी थीं। वह स्वभाव से थोड़ी भुलक्कड़ जरूर थी, पर इसका मतलब यह कतई नहीं था कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ थी। वह तो वह मीरा थी जिसने अपनी कड़ी मेहनत से यूनिवर्सिटी में पीएचडी की उपाधि हासिल की थी। शादी के समय उसने खुद बाबन को ईमानदारी से बताया था, "देखो बाबन, मैं गुस्से में कभी-कभी थोड़ा उल्टा-पुल्टा बोल देती हूँ, लेकिन मैं दिमागी रूप से बिल्कुल ठीक हूँ।" तब बाबन ने हंसकर इन बातों को बहुत सामान्य माना था, पर शादी के बाद पासा पलट गया।
बाबन खुद एक बड़ी कंपनी में कॉर्पोरेट मैनेजर था। वह लोगों के दिमाग से खेलना अच्छे से जानता था। हकीकत तो यह थी कि बाबन अंदर से बेहद डरपोक और असुरक्षित इंसान था। वह मीरा की कुशाग्र बुद्धि, उसकी डिग्रियों और उसकी काबिलियत से मन ही मन बुरी तरह जलता था। उसे डर था कि अगर मीरा अपनी पहचान बना लेगी, तो उसका खुद का वजूद छोटा पड़ जाएगा। इसलिए उसने कॉर्पोरेट की 'माइंड गेम्स' और 'गैसलाइटिंग' की तकनीकें घर पर इस्तेमाल करनी शुरू कर दीं। वह मीरा के काम में इस तरह कमियां निकालता कि धीरे-धीरे मीरा को खुद की बुद्धिमत्ता पर ही शक होने लगा। उसने मीरा को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि वह कमजोर है और बाबन के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
मीरा इस समय एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ा रही थी। वहां का वेतन बहुत कम था और काम का दबाव इतना ज्यादा कि उसकी असली प्रतिभा फाइलों और अतिरिक्त कामों के नीचे दबकर दम तोड़ रही थी। बाबन अक्सर इस बात का मजाक उड़ाता, "इस कबाड़ कॉलेज में बारह घंटे खटने के बाद भी लाती क्या हो? चंद हजार रुपये? इससे बेहतर है कि घर बैठो। तुम्हारी मानसिक स्थिति वैसे भी ऐसी नहीं है कि तुम कोई बड़ा काम संभाल सको।"
घर के इस माहौल में उसकी पीएचडी की डिग्री बाबन के तानों के आगे रद्दी के टुकड़े जैसी बन कर रह गई थी। बाबन हर छोटी-बड़ी बात पर बहस करता और उसे इतना उकसा देता कि मीरा का धैर्य जवाब दे जाता। और जैसे ही मीरा अपने बचाव में चिल्लाती, बाबन एक कुटिल मुस्कान के साथ कहता, "देखो, तुम्हारी बीमारी फिर से बाहर आ गई। मेरी शादी एक मेंटल से करवा दी गई है। मैं तेरे उन बूढ़े मां-बाप के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज कराऊंगा। अदालत में साबित कर दूँगा कि उन्होंने सच छुपाया। उनसे भारी हर्जाना वसूलूँगा।"
यह सुनते ही मीरा अंदर तक कांप जाती। उसके माता-पिता आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और वयोवृद्ध हो चुके थे। वे यह सदमा और कानूनी पचड़ा कभी नहीं झेल पाते। इसी डर का फायदा उठाकर बाबन उसे मानसिक और कभी-कभी शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता रहा। मीरा का मन करता कि वह अपना सिर पीट ले, या चुपचाप कहीं अकेली चली जाए।
मीरा के जीवन का सबसे बड़ा दर्द सिर्फ यह प्रताड़ना नहीं थी, बल्कि उसके करियर को खत्म करने की एक सोची-समझी साजिश भी थी। जब भी मीरा ने हिम्मत जुटाकर सरकारी नौकरी के लिए कोशिश की और कठिन परीक्षाएं पास कीं, तब बाबन और उसके ससुर ने मिलकर एक भयानक चाल चली।
एक दिन जब मीरा का सरकारी कॉलेज में चयन हुआ, तो उसके ससुर घर आए और चाय की चुस्की लेते हुए ठंडे स्वर में बोले, "देखो बहू, अगर तुम्हें नौकरी का इतना ही शौक है तो शौक से जाओ। लेकिन हमारी खानदान की रीत है, अपनी पांच साल की नन्ही बेटी को यहीं छोड़ना होगा। तुम अपनी बेटी से दूर रहकर अकेले दूसरे शहर में ऐश करो, हमें कोई ऐतराज नहीं।"
बाबन ने भी सुर में सुर मिलाया, "हाँ मीरा, कोर्ट भी एक मेंटल मां को बच्ची की कस्टडी नहीं देगा। जाना है तो बेटी को भूल जाओ।"
वे दोनों अच्छे से जानते थे कि मीरा की जान उसकी पांच साल की नन्ही बेटी में बसती है। बेटी से दूर हो जाने के इसी खौफ के कारण मीरा कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकी। उसने रोते हुए, अपनी ममता के आगे अपने सारे सपनों और डिग्रियों को एक सूटकेस में बंद कर दिया और ताले की चाबी कहीं छुपा दी। सालों से इस घुटते हुए माहौल को सहते-सहते मीरा अब भीतर से रीती हो चुकी थी। लेकिन पानी अब सिर से ऊपर जा चुका था।
एक सुबह, आईने के सामने खड़े होकर मीरा ने अपने बिखरे बाल और सूजी हुई आंखें देखीं। अचानक उसके कानों में अपनी बेटी की खिलखिलाहट गूंजी। मीरा को अहसास हुआ कि अगर वह आज इस अन्याय के खिलाफ नहीं संभली, तो उसकी बेटी भी इसी घुटन को औरत की नियति मानकर सहना सीख जाएगी। वह एक पढ़ी-लिखी और समझदार महिला थी, उसने तय किया कि अब वह बाबन के खेल में मोहरा नहीं बनेगी।
उसने अपनी रणनीति बदली। अब जब बाबन चिल्लाता या उकसाता, तो मीरा पलटकर जवाब नहीं देती, बल्कि शांत रहती। बाबन को लगता कि वह जीत रहा है, लेकिन असल में मीरा शांत रहकर बाबन की हर धमकी, ताने और गाली-गलौज की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग अपने फोन में चुपचाप दर्ज कर रही थी।
उसने छुपकर अपने माता-पिता से फोन पर बात की। पिता ने कांपती मगर दृढ़ आवाज में कहा, "बेटी, तुम हमारे पास वापस आ जाओ। तुम बोझ नहीं, हमारा गौरव हो। हमारे पास सूखी रोटी होगी, तो आधी तुम्हारी होगी।" इस बात ने मीरा के भीतर सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया।
अगले इतवार, जब बाबन ने फिर किसी बात पर चिढ़कर कहा, "ज्यादा मत बोलो, वरना कोर्ट में घसीटूंगा तुम्हारे परिवार को। भारी मुआवजा देना पड़ेगा तुम्हारे बाप को।"
इस बार मीरा डरी नहीं। वह अंदर गई, अपना सूटकेस खोला। उसमें से अपनी पीएचडी की डिग्री निकाली और फोन की सारी रिकॉर्डिंग्स बाबन के सामने मेज पर रख दीं। मीरा की आंखों में एक अजीब सी चमक और शांति थी। उसने बेहद शांत मगर ठोस आवाज में कहा, "अदालत तुम नहीं बाबन, अब मैं जाऊंगी। यह सारे सबूत और तुम्हारी ये कॉर्पोरेट धमकियां कोर्ट में यह साबित करने के लिए काफी हैं कि असली मेंटल कौन है और डरपोक कौन। कानून और ममता के बीच कोई नहीं आ सकता, मेरी बेटी मेरे साथ जाएगी।"
बाबन के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी कॉर्पोरेट की सारी चालाकियां मीरा के इस नए रूप के आगे ढह गईं। वह कुछ बोलने के लिए हकलाया, "मीरा... तुम... मेरा वो मतलब..."
पर मीरा अब सुनने के लिए नहीं रुकी। उसने पूरी दृढ़ता से अपनी बेटी का छोटा सा हाथ थामा, पीठ पर अपना बैग टांगा और उस घर की चौखट को पार कर गई। हवा अब भी ठंडी थी, पर आज वह मीरा के चेहरे को सुखा नहीं रही थी, बल्कि उसके आजाद और सम्मानजनक जीवन का स्वागत कर रही थी।

बहुत सुंदर प्रस्तुति बेहतरीन लाजवाब वाह क्या बात है
ReplyDeleteमें भी यहाँ पर लिखना चाहता हु
ReplyDeleteआप अपनी रचना मुझे भेज दीजिए। मैं उसे प्रकाशित कर दूंगी। परंतु न्यूनतम शुल्क लगेगा।
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