Total Pageviews

Friday, July 17, 2026

होश का ज़हर


​होश में रहकर भी, वो ज़हर ही उगलते हैं,

हर शब्द में ताने, अपमान ही पलते हैं।

रात भर जागकर, मोबाइल की नीली रोशनी में,

वो दुनिया अपनी, किसी और की दुनिया में ढालते हैं।

​माँ की रसोई से आता है, उनके हिस्से का निवाला,

पर रसोई में मेरी, वो खाली ही है प्याला।

बिना कहे सब समझ लूँ— ये अपेक्षा उनकी जिद है,

पर न समझूँ तो, उनकी जुबान पर ताने की हद है।

​नशा तो बस एक बहाना है, जो उन्हें सुकून देता है,

होश में रहकर तो, वो मेरी हर छोटी भूल को गिनता है।

क्या मैं एक रोबोट हूँ? जो बिना कहे सब जान लूँ?

या उनकी खामोशी के पीछे, अपना स्वाभिमान छोड़ दूँ?

​मेरे शौकों को, वो मेरी कमज़ोरी मान बैठे हैं,

पिता और भाई के प्यार को, वो मेरा अहंकार मानते हैं।

हाथ जब उठता है, तो ज़हन में एक ही सवाल आता है—

क्या यही वो रिश्ता है, जो बरसों तक निभाना है?

​मैं उलझी हूँ अपनी ही आदतों की इन जंजीरों में,

सुविधाओं की चमक और अपमान की इन लकीरों में।

वो तो होश में रहकर, मेरी हस्ती को मिटा रहे हैं,

और मैं खुद को, खुद ही इस पिंजरे में सजा रही हूँ।

वो खुद को 'पीड़ित' बताकर मुझे दोषी ठहराते हैं,

अपनी ही कुंठाओं का इल्जाम मुझ पर मढ़ जाते हैं।

Saturday, June 27, 2026

संगति की कीमत


मुस्कान और सोनाली का बचपन बिल्कुल साथ-साथ बीता था। दोनों एक ही गली में रहती थीं और दोनों के घर के बीच महज़ तीन मकानों का फासला था। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि गली का हर कोई जानता था—जहाँ सोनाली होगी, वहाँ मुस्कान ज़रूर मिलेगी। सोनाली के माता-पिता भी इस बात को अच्छे से जानते थे, इसलिए उन्होंने शुरुआत में मुस्कान पर अपनी बेटी की तरह ही पूरा भरोसा किया था। दोनों सहेलियों ने बचपन में एक मासूम सा सपना भी देखा था कि जब वे बड़ी होंगी, तो शादी भी एक ही दिन और एक ही मंडप में करेंगी।

समय गुज़रता गया और दोनों जवान हुईं। सोनाली आधुनिक ख्यालों की लड़की ज़रूर थी, थोड़ी नादान और बेवकूफ़ भी थी, लेकिन वह अपने परिवार की मर्यादा को अच्छी तरह समझती थी। वहीं दूसरी तरफ, मुस्कान के मन में कुछ और ही चल रहा था, जिसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। उसका रहन-सहन और चाल-चलन सोनाली से बिलकुल अलग था। उसे अपने सिवा कोई और दिखाई न देता था। पर कहते हैं न कि दो अलग किस्म के लोग ही एक-दूसरे के पक्के दोस्त बनते हैं; शायद इसीलिए सोनाली और मुस्कान की दोस्ती इतनी अटूट थी।

एक दिन सोनाली के पिता गली से गुज़र रहे थे, तभी उन्होंने नुक्कड़ पर पंक्चर बनाने वाले ज़ाकिर के साथ मुस्कान को बेहद करीब और घुलमुल होते देख लिया। मुस्कान की इस हरकत को देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर आकर उन्होंने बहुत भारी मन से यह बात सोनाली की माँ को बताई। अपनी पत्नी से बात करते हुए उनके दिल में एक गहरा पछतावा जाग रहा था। वह खुद को कोस रहे थे कि आखिर उन्होंने क्यों सोनाली को मुस्कान के इतना करीब आने दिया, जबकि उसी गली में दो-तीन और भी अच्छी लड़कियाँ थीं, जिनके साथ सोनाली की दोस्ती कराई जा सकती थी।

उन्होंने सोनाली को बुलाकर बहुत समझाया और मुस्कान से दूरी बनाने को कहा। सोनाली थोड़ी नादान थी; उसने माता-पिता की बात मानकर मुस्कान से थोड़ी दूरी तो बना ली, लेकिन बचपन की वफ़ादारी के कारण वह अपनी सहेली को दिल से पूरी तरह दूर नहीं कर पाई। इसलिए, कभी-कभी जब वह घर से बाहर किसी काम से जाती और रास्ते में मुस्कान मिल जाती, तो दोनों के बीच अभी भी उतनी ही आत्मीयता से बातचीत होती थी। सोनाली को लगता था कि मुस्कान प्रगतिशील विचारों वाली लड़की है, इसीलिए वह ज़ाकिर से प्यार करती है; जबकि उसे अपने पिता पुराने ख्यालों के नज़र आते थे। यही वजह थी कि वह मुस्कान से मिलने या बातचीत करने की बात घर में किसी से नहीं कहती थी। पर गली के लोगों को सब पता था, हालाँकि शुरुआत में उन्हें इस मामले की गहराई का अंदाज़ा नहीं था और न ही कोई लेना-देना था।

इसी बीच दोनों के परिवारों ने अपनी-अपनी बिरादरी में लड़के ढूंढे। सोनाली के लिए देवेंद्र का और मुस्कान के लिए अरुण का रिश्ता पक्का हो गया। किस्मत से दोनों की शादियाँ एक ही दिन तय हुईं, जिससे लगा कि उनका बचपन का सपना पूरा होने जा रहा है। सोनाली अपने नए जीवन को लेकर बेहद खुश थी और माता-पिता के फैसले का सम्मान कर रही थी। लेकिन मुस्कान के दिमाग में तो एक खौफनाक साज़िश चल रही थी। वह अरुण से शादी नहीं करना चाहती थी, क्योंकि वह उस पंक्चर वाले के प्यार में अंधी हो चुकी थी। अपनी राह के इस कांटे को हटाने के लिए उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अरुण की हत्या की एक बेहद क्रूर योजना बना डाली।

शादी से ठीक दो दिन पहले, मुस्कान ने कुछ समय साथ बिताने के बहाने रात के वक्त अरुण को शहर के बाहर एक सुनसान सड़क के किनारे बने ढाबे पर बुलाया। अरुण को लगा कि शादी से पहले के ये लम्हें खास होते हैं, सो वह मुस्कान के बुलावे पर चला गया। वहाँ उसका प्रेमी ज़ाकिर पहले से ही हथियार लेकर ढाबे के पास झाड़ियों में छिपा हुआ था। कुछ देर मुस्कान और अरुण ने साथ वक्त बिताया और चाय-पराठे खाए। फिर मुस्कान ने कुछ देर टहलने की बात कही और चुपके से ज़ाकिर को इशारा कर दिया।

ज़ाकिर ने रास्ते पर चल रहे अरुण पर अचानक हमला कर दिया। अरुण अपनी जान बचाने के लिए चीखता रहा, लेकिन ढाबे से दूर होने के कारण वहाँ मौजूद लोगों को उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। परंतु संयोग से, अरुण का पुराना दोस्त सनोज उसी रास्ते से अपनी दुकान बढ़ाकर लौट रहा था। दूर हो रही हाथापाई को तो वह देख पा रहा था, लेकिन अंधेरे के कारण यह नहीं देख सका कि वहाँ कौन है। तभी एक गाड़ी को नज़दीक आते देख मुस्कान और ज़ाकिर घबरा गए। ज़ाकिर तुरंत वहाँ से भाग निकला और मुस्कान वहीं पर नाटकीय अंदाज़ में चिल्लाने लगी कि पैसे और चैन की छीना-झपटी में एक गुंडे ने अरुण पर हमला कर दिया है। घायल अरुण को सनोज तुरंत अस्पताल लेकर भागा।

अगली सुबह जब पुलिस की तफ्तीश शुरू हुई, तो दो दिन बाद ज़ाकिर पकड़ा गया। पुलिस की कड़ाई से पूछताछ करने पर उसने मुस्कान का नाम उगल दिया। मुस्कान का यह घिनौना और क्रूर चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया। समाज उसकी इस दरिंदगी को देखकर थू-थू कर रहा था। लेकिन इस बात का सबसे बड़ा और घातक झटका सोनाली के परिवार को लगा।

देवेंद्र के माता-पिता ने जैसे ही यह खबर सुनी, उन्होंने तुरंत सोनाली से रिश्ता तोड़ दिया। उनका कहना था कि जो लड़की दिन-रात मुस्कान जैसी चरित्रहीन के साथ उठती-बैठती थी, वह इतनी पाक-साफ़ कैसे हो सकती है? संगति का असर तो आता ही है। सोनाली के माता-पिता ने लाख समझाया कि सोनाली की मुस्कान से दोस्ती तो कब की खत्म हो चुकी थी, पर देवेंद्र का परिवार नहीं माना। उनका कहना था कि सोनाली उनकी आँखों में धूल झोंक रही थी और वह अब भी छिप-छिपकर मुस्कान से मिलती थी। सोनाली के पिता ने रोते हुए देवेंद्र के परिवार के सामने अपनी पगड़ी तक रख दी, खुद सोनाली ने अपनी बेगुनाही की कसमें खाईं कि वह इस साज़िश के बारे में कुछ नहीं जानती थी, लेकिन समाज के तानों के डर से देवेंद्र के परिवार ने उनकी एक न सुनी और शादी टूट गई।

अब कई महीने बीत चुके हैं। अरुण कुछ दिनों तक ज़िंदगी और मौत के बीच जूझता रहा और आखिरकार अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मुस्कान और ज़ाकिर जेल में अपने कर्मों की सज़ा काट रहे हैं, लेकिन बिना किसी कसूर के सोनाली की ज़िंदगी भी पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। गली के लोग आज भी जब सोनाली को देखते हैं, तो उनकी आँखों में वही शक और बदनामी के भाव होते हैं।

सोनाली रोज़ अपने घर की खिड़की पर बैठती है और उसके दिल में एक भयानक कसक उठती है। वह सोचती है कि गलती मुस्कान की थी, क्रूरता उसने दिखाई, फिर उसकी सज़ा का यह बोझ समाज आज भी सोनाली के कंधों पर क्यों लाद रहा है? क्या सिर्फ एक गलत सहेली को चुनने की कीमत एक सीधी-सादी लड़की को अपनी पूरी ज़िंदगी की बर्बादी से चुकानी पड़ती है? यही सवाल और एक अजीब सी छटपटाहट आज भी उसके ज़हन में ज़िंदा है।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

Monday, June 22, 2026

अम्बुबाची मेला: आस्था, लोक-लोकाचार और प्रकृति का महापर्व

 


पौराणिक पृष्ठभूमि और शक्तिपीठ की उत्पत्ति--

अम्बुबाची पर्व का सीधा संबंध सती के पावन चरित्र, उनके आत्मदाह और शक्तिपीठों की स्थापना से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित भव्य यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का घोर अपमान देखकर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए थे। वियोग और क्रोध में व्याकुल भगवान शिव दक्ष यज्ञ का विनाश कर जब सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहां-जहां गिरे, वहां-वहां पावन शक्तिपीठ स्थापित हुए। इसी क्रम में असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर माता सती का 'योनि भाग' गिरा, जो आज जगत प्रसिद्ध और तंत्र साधना का मुख्य केंद्र 'मां कामाख्या मंदिर' कहलाता है।


अम्बुबाची का अर्थ और मां कामाख्या का रजस्वला होना

'अम्बुबाची' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'पानी का प्रस्फुटन' या 'जल का बोलना' माना जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में वर्षा ऋतु के आगमन के साथ मनाया जाता है। इस समय माता कामाख्या को साक्षात प्रकृति के रूप में रजस्वला माना जाता है; ऐसी मान्यता है कि इन तीन से चार दिन वे मासिक धर्म के चक्र से गुजरती हैं। कामाख्या शक्तिपीठ को स्त्री शक्ति, जनन क्षमता और मातृत्व के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में नारी के प्राकृतिक स्वरूप को कितना पूजनीय माना गया है। इन तीन से चार दिनों में मंदिर के गर्भगृह से बहने वाली प्राकृतिक जलधारा पूरी तरह लाल हो जाती है, जिसे बाद में अत्यंत पवित्र 'अम्बुबाची वस्त्र' (रक्त वस्त्र) भक्तों में प्रसाद रूप में बांटा जाता है। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों की संख्या में अघोरी, तांत्रिक, साधु और भक्त नीलांचल पर्वत पर जुटते हैं, जिससे यह पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक समागम बन जाता है।


बंगाली पंचांग और शास्त्रीय तिथि का महत्व--

बंगाली संस्कृति और समाज में अम्बुबाची पर्व का एक अत्यंत विशेष, अनिवार्य और व्यावहारिक स्थान है। बंगाली पंचांग (पांजी) में अम्बुबाची की शुरुआत और अंत का समय बेहद सूक्ष्मता से दिया होता है, जिसमें 'अम्बुबाची प्रवृत्ति' (शुरुआत) और तीन या चार दिनों के बाद 'अम्बुबाची निवृत्ति' (समाप्ति) की सटीक तिथि और समय का स्पष्ट उल्लेख रहता है। बंगाली पंचांग में प्रत्येक आषाढ़ महीने के सात तारीख को ही अंबुबाची शुरू होती है। बंगाली परिवारों में पंचांग की इन तिथियों का बड़ी कड़ाई और श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है, जहाँ प्रवृत्ति के शुरू होते ही घरों के नियम बदल जाते हैं और निवृत्ति के बाद ही गृहशुद्धि और भगवान के मंदिर की शुद्धि कर सामान्य जीवन शुरू होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस काल में पृथ्वी पर सूर्य की किरणें और वर्षा मिलकर एक नया जीवन चक्र शुरू करती हैं, जिससे इसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा के शुद्धिकरण का समय भी माना जाता है।


घरेलू लोकाचार और मंदिर के कपाट बंद रखने की परंपरा--

अम्बुबाची के इन तीन-चार दिनों में केवल कामाख्या मंदिर ही नहीं, बल्कि आम हिंदू घरों के मंदिरों के कपाट भी पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और भगवान के आसन को लाल कपड़े से ढक दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माता के रजस्वला होने के समय पूरी प्रकृति विश्राम की अवस्था में होती है, इसलिए इन दिनों में मूर्तियों या तस्वीरों को छूना, उन्हें स्नान कराना या तिलक लगाना पूरी तरह वर्जित होता है। विशेषतः जिन तस्वीरों में देवी के साथ कोई देवता रहते हैं उनकी भी पूजा नहीं होती। केवल नारायण पूजा और शालिग्राम की पूजा ब्राह्मण करते हैं।घर की महिलाएं इन तीन - चार दिनों में किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रिया या पूजा  नहीं करती हैं। इस दौरान केवल कुल पुरोहित या ब्राह्मण ही बिना मूर्तियों को छुए अत्यंत सात्विक विधि से पूजा करते हैं। इस काल में बिना आग पर पकाए गए भोजन का नियम होने के कारण ब्राह्मण केवल भोग के रूप में माता और देवताओं को दूध और खीरा (ककड़ी) अर्पित करते हैं, और यही दूध-खीरा बाद में परिवार के सदस्यों द्वारा अत्यंत श्रद्धापूर्वक प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।


धरती माता का विश्राम और कृषि निषेध--

माता कामाख्या के साथ-साथ इन दिनों पूरी पृथ्वी यानी धरती माता को भी रजस्वला माना जाता है, जिसके कारण उन्हें जीवनदायिनी और अन्नपूर्णा मानकर पूर्ण विश्राम दिया जाता है। यही कारण है कि अम्बुबाची के दौरान किसी भी प्रकार की खेती या कृषि कार्य पूरी तरह ठप रहता है और खेतों में हल चलाना, कुदाल मारना या मिट्टी खोदना वर्जित माना गया है। यहां तक कि घरों में लगे पौधों की मिट्टी को भी नहीं छुआ जाता और न ही नए पौधे रोपे जाते हैं, क्योंकि इस लोकाचार के पीछे प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और उसे पुनर्जीवित होने का अवसर देने की गहरी समझ छिपी है। तीन - चार दिनों के इस विश्राम के बाद जब धरती की 'निवृत्ति' होती है, तब उसे अधिक उपजाऊ माना जाता है और किसान नए उत्साह के साथ सावन की फसलों की बुआई शुरू करते हैं, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मिक संबंध को दर्शाता है। वही एक और विशेष ध्यान रखा जाता है कि इन दिनों लोग नंगे पैरों चलते हैं ताकि धरती को कोई कष्ट ना हो। पहले के दिनों में लोग खड़ाऊ भी नहीं पहना करते थे क्योंकि इससे धरती माता को कष्ट होगा। इस प्रकार धरती माता का पूरा ध्यान रखा जाता था।


महिलाओं के विशेष नियम: विधवा और सधवा लोकाचार--

पुराने समय से ही बंगाली हिंदू समाज में महिलाओं के लिए अम्बुबाची के दौरान बेहद कड़े और विशिष्ट नियम निर्धारित रहे हैं। विशेष रूप से बंगाली हिंदू विधवा महिलाएं इन तीन दिनों में कठोर तपस्वी जैसा जीवन जीती थीं। वे कुएं, तालाब या नदी का साधारण पानी पीना छोड़कर केवल प्राकृतिक नारियल पानी का सेवन करती थीं और भोजन में पका हुआ अन्न, नमक या मसालों का त्याग कर केवल कंद-मूल, फल और भीगे चने खाती थीं। वे नंगे पैरों चलती और नौका में जाकर रहा करती थी।दूसरी ओर, सधवा (सुहागिन) महिलाओं के लिए भी इस दौरान कई विशेष लोक-नियम थे, जिसके तहत वे इन तीन दिनों में अपने बाल धोना और नाखून काटना पूरी तरह वर्जित मानती थीं और किसी भी प्रकार के मांगलिक या शृंगार के कार्यों की शुरुआत इन दिनों में नहीं की जाती थी।


खान-पान के नियम और सांस्कृतिक प्रासंगिकता--

इन तीन दिनों के दौरान सधवा महिलाएं निरामिष भोजन नहीं करती थी। चौथे दिन जब 'निवृत्ति' होती है, तब घर के कोने-कोने, बिस्तरों, कपड़ों और बर्तनों की धुलाई कर गंगाजल छिड़क कर शुद्धिकरण किया जाता है, जिसके बाद ही मंदिर के पट खुलते हैं, मंदिर की सफ़ाई होती, माता के घट की सफ़ाई होती, फिर तस्वीर या मूर्ति आदि की स्नान कराकर नए वस्त्र पहना कर और सभी अन्य देवी देवताओं को  सुंगधित फूलों से सजाकर भव्य पूजा होती। कई अन्य घरों में महिलाओं को उपवास करने का भी नियम रहा करता था इसलिए निवृत्ति के बाद महिलाएं अपना उपवास भी खोलती थी। संक्षेप में कहें तो, अम्बुबाची केवल एक अंधविश्वास या रूढ़ि नहीं, बल्कि प्रकृति, स्त्रीत्व और जीवन के सम्मान का एक ऐसा उत्सव है जो आधुनिक दौर में भी हमें पर्यावरण संरक्षण और अपनी जड़ों की याद दिलाता है।


डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती

Thursday, June 18, 2026

मेरे प्यारे पापा

 



उंगली पकड़कर मुझे चलना सिखाया,
हर मुश्किल से हमेशा मुझे बचाया।
खुद धूप में रहकर भी जो,
हम पर ठंडी छांव करते हैं,
वो और कोई नहीं, मेरे पापा हैं,
जो हमसे बेइंतहा प्यार करते हैं।
मांगने से पहले ही जो सब कुछ दिला देते हैं,
मेरी एक छोटी सी मुस्कान पर,
वो अपनी सारी थकान भूल जाते हैं।
चट्टान की तरह मजबूत हैं वो,
पर दिल से उतने ही कोमल हैं,
मेरे पापा मेरी दुनिया, मेरा सबसे बड़ा संबल हैं।
सत्यवीर वैष्णव बारां राजस्थान 💞✒️💞


सत्यवीर वैष्णव

Monday, June 15, 2026

एक लड़ाई आत्मसम्मान की


नवंबर की वह ढलती हुई शाम थी। खिड़की के पल्लों से टकराकर आती ठंडी हवा मीरा के चेहरे को छूकर गुजर गई, पर उसके भीतर की तपन को कम न कर सकी। दीवार पर टंगे कैलेंडर की तारीख जैसे चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी कि उनकी शादी को चौदह साल हो चुके हैं। चौदह साल का यह लंबा अरसा मीरा के लिए हर रोज एक नए कुरुक्षेत्र में निहत्थे उतरने जैसा था। रसोई में चाय का उबलता हुआ पानी उसकी अपनी जिंदगी जैसा ही था—जो धीमी आंच पर लगातार सुलग रहा था और बाहर आने का रास्ता ढूंढ रहा था।

तभी हॉल से बाबन की भारी और तीखी आवाज गूंजी, "मीरा! मेरी वो नीली वाली फाइल कहाँ है?"

मीरा ने अभी जवाब देने के लिए मुंह खोला ही था कि हमेशा की तरह बाबन का ताना हवा में तैर गया, "एक पागल औरत को कोई काम सौंपने का यही नतीजा होता है। खुद भुगतो अब!"

मीरा चाय की केतली बंद कर झटपट हॉल में आई और शांत स्वर में बोली, "रुको बाबन, मैं लाकर देती हूँ। तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हें यह वाली फाइल भी चाहिए? मैं पहले ही निकाल कर रख देती।"

बाबन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने सोफे पर पड़े कुशन को झटके से हटाते हुए कहा, "तुम रखकर खुद भूल गई होगी! तुम्हारा दिमाग ठिकाने रहता है कभी? मेंटल कहीं की!"

यह शब्द अब मीरा के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह नहीं चुभता था। बाबन ने सालों से इस शब्द को इतनी बार, इतने अलग-अलग तरीकों से दोहराया था कि मीरा के आत्मसम्मान की मजबूत दीवारें अब चटक चुकी थीं। वह स्वभाव से थोड़ी भुलक्कड़ जरूर थी, पर इसका मतलब यह कतई नहीं था कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ थी। वह तो वह मीरा थी जिसने अपनी कड़ी मेहनत से यूनिवर्सिटी में पीएचडी की उपाधि हासिल की थी। शादी के समय उसने खुद बाबन को ईमानदारी से बताया था, "देखो बाबन, मैं गुस्से में कभी-कभी थोड़ा उल्टा-पुल्टा बोल देती हूँ, लेकिन मैं दिमागी रूप से बिल्कुल ठीक हूँ।" तब बाबन ने हंसकर इन बातों को बहुत सामान्य माना था, पर शादी के बाद पासा पलट गया।

बाबन खुद एक बड़ी कंपनी में कॉर्पोरेट मैनेजर था। वह लोगों के दिमाग से खेलना अच्छे से जानता था। हकीकत तो यह थी कि बाबन अंदर से बेहद डरपोक और असुरक्षित इंसान था। वह मीरा की कुशाग्र बुद्धि, उसकी डिग्रियों और उसकी काबिलियत से मन ही मन बुरी तरह जलता था। उसे डर था कि अगर मीरा अपनी पहचान बना लेगी, तो उसका खुद का वजूद छोटा पड़ जाएगा। इसलिए उसने कॉर्पोरेट की 'माइंड गेम्स' और 'गैसलाइटिंग' की तकनीकें घर पर इस्तेमाल करनी शुरू कर दीं। वह मीरा के काम में इस तरह कमियां निकालता कि धीरे-धीरे मीरा को खुद की बुद्धिमत्ता पर ही शक होने लगा। उसने मीरा को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि वह कमजोर है और बाबन के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

मीरा इस समय एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ा रही थी। वहां का वेतन बहुत कम था और काम का दबाव इतना ज्यादा कि उसकी असली प्रतिभा फाइलों और अतिरिक्त कामों के नीचे दबकर दम तोड़ रही थी। बाबन अक्सर इस बात का मजाक उड़ाता, "इस कबाड़ कॉलेज में बारह घंटे खटने के बाद भी लाती क्या हो? चंद हजार रुपये? इससे बेहतर है कि घर बैठो। तुम्हारी मानसिक स्थिति वैसे भी ऐसी नहीं है कि तुम कोई बड़ा काम संभाल सको।"

घर के इस माहौल में उसकी पीएचडी की डिग्री बाबन के तानों के आगे रद्दी के टुकड़े जैसी बन कर रह गई थी। बाबन हर छोटी-बड़ी बात पर बहस करता और उसे इतना उकसा देता कि मीरा का धैर्य जवाब दे जाता। और जैसे ही मीरा अपने बचाव में चिल्लाती, बाबन एक कुटिल मुस्कान के साथ कहता, "देखो, तुम्हारी बीमारी फिर से बाहर आ गई। मेरी शादी एक मेंटल से करवा दी गई है। मैं तेरे उन बूढ़े मां-बाप के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज कराऊंगा। अदालत में साबित कर दूँगा कि उन्होंने सच छुपाया। उनसे भारी हर्जाना वसूलूँगा।"

यह सुनते ही मीरा अंदर तक कांप जाती। उसके माता-पिता आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और वयोवृद्ध हो चुके थे। वे यह सदमा और कानूनी पचड़ा कभी नहीं झेल पाते। इसी डर का फायदा उठाकर बाबन उसे मानसिक और कभी-कभी शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता रहा। मीरा का मन करता कि वह अपना सिर पीट ले, या चुपचाप कहीं अकेली चली जाए।

मीरा के जीवन का सबसे बड़ा दर्द सिर्फ यह प्रताड़ना नहीं थी, बल्कि उसके करियर को खत्म करने की एक सोची-समझी साजिश भी थी। जब भी मीरा ने हिम्मत जुटाकर सरकारी नौकरी के लिए कोशिश की और कठिन परीक्षाएं पास कीं, तब बाबन और उसके ससुर ने मिलकर एक भयानक चाल चली।

एक दिन जब मीरा का सरकारी कॉलेज में चयन हुआ, तो उसके ससुर घर आए और चाय की चुस्की लेते हुए ठंडे स्वर में बोले, "देखो बहू, अगर तुम्हें नौकरी का इतना ही शौक है तो शौक से जाओ। लेकिन हमारी खानदान की रीत है, अपनी पांच साल की नन्ही बेटी को यहीं छोड़ना होगा। तुम अपनी बेटी से दूर रहकर अकेले दूसरे शहर में ऐश करो, हमें कोई ऐतराज नहीं।"

बाबन ने भी सुर में सुर मिलाया, "हाँ मीरा, कोर्ट भी एक मेंटल मां को बच्ची की कस्टडी नहीं देगा। जाना है तो बेटी को भूल जाओ।"

वे दोनों अच्छे से जानते थे कि मीरा की जान उसकी पांच साल की नन्ही बेटी में बसती है। बेटी से दूर हो जाने के इसी खौफ के कारण मीरा कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकी। उसने रोते हुए, अपनी ममता के आगे अपने सारे सपनों और डिग्रियों को एक सूटकेस में बंद कर दिया और ताले की चाबी कहीं छुपा दी। सालों से इस घुटते हुए माहौल को सहते-सहते मीरा अब भीतर से रीती हो चुकी थी। लेकिन पानी अब सिर से ऊपर जा चुका था।

एक सुबह, आईने के सामने खड़े होकर मीरा ने अपने बिखरे बाल और सूजी हुई आंखें देखीं। अचानक उसके कानों में अपनी बेटी की खिलखिलाहट गूंजी। मीरा को अहसास हुआ कि अगर वह आज इस अन्याय के खिलाफ नहीं संभली, तो उसकी बेटी भी इसी घुटन को औरत की नियति मानकर सहना सीख जाएगी। वह एक पढ़ी-लिखी और समझदार महिला थी, उसने तय किया कि अब वह बाबन के खेल में मोहरा नहीं बनेगी।

उसने अपनी रणनीति बदली। अब जब बाबन चिल्लाता या उकसाता, तो मीरा पलटकर जवाब नहीं देती, बल्कि शांत रहती। बाबन को लगता कि वह जीत रहा है, लेकिन असल में मीरा शांत रहकर बाबन की हर धमकी, ताने और गाली-गलौज की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग अपने फोन में चुपचाप दर्ज कर रही थी।

उसने छुपकर अपने माता-पिता से फोन पर बात की। पिता ने कांपती मगर दृढ़ आवाज में कहा, "बेटी, तुम हमारे पास वापस आ जाओ। तुम बोझ नहीं, हमारा गौरव हो। हमारे पास सूखी रोटी होगी, तो आधी तुम्हारी होगी।" इस बात ने मीरा के भीतर सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया।

अगले इतवार, जब बाबन ने फिर किसी बात पर चिढ़कर कहा, "ज्यादा मत बोलो, वरना कोर्ट में घसीटूंगा तुम्हारे परिवार को। भारी मुआवजा देना पड़ेगा तुम्हारे बाप को।"

इस बार मीरा डरी नहीं। वह अंदर गई, अपना सूटकेस खोला। उसमें से अपनी पीएचडी की डिग्री निकाली और फोन की सारी रिकॉर्डिंग्स बाबन के सामने मेज पर रख दीं। मीरा की आंखों में एक अजीब सी चमक और शांति थी। उसने बेहद शांत मगर ठोस आवाज में कहा, "अदालत तुम नहीं बाबन, अब मैं जाऊंगी। यह सारे सबूत और तुम्हारी ये कॉर्पोरेट धमकियां कोर्ट में यह साबित करने के लिए काफी हैं कि असली मेंटल कौन है और डरपोक कौन। कानून और ममता के बीच कोई नहीं आ सकता, मेरी बेटी मेरे साथ जाएगी।"

बाबन के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी कॉर्पोरेट की सारी चालाकियां मीरा के इस नए रूप के आगे ढह गईं। वह कुछ बोलने के लिए हकलाया, "मीरा... तुम... मेरा वो मतलब..."

पर मीरा अब सुनने के लिए नहीं रुकी। उसने पूरी दृढ़ता से अपनी बेटी का छोटा सा हाथ थामा, पीठ पर अपना बैग टांगा और उस घर की चौखट को पार कर गई। हवा अब भी ठंडी थी, पर आज वह मीरा के चेहरे को सुखा नहीं रही थी, बल्कि उसके आजाद और सम्मानजनक जीवन का स्वागत कर रही थी।

Sunday, May 17, 2026

अंधी ममता और कांच के रिश्ते

 


कोलकाता के बेहाला इलाके के एक पुराने पुश्तैनी मकान में उस दोपहर अजीब सी खामोशी छाई थी। रूपक और रानी अपना सामान समेट कर सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे। रूपक, जो एक मामूली सरकारी क्लर्क था, उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं; लेकिन उसकी माँ ऊषा देवी ने बेरुखी से मुँह फेर लिया। उनकी ममता तो अपने छोटे बेटे दीपक पर बरस रही थी, जो स्कूल में एक ऊंचे पद पर शिक्षक था और अच्छी तनख्वाह लाता था। दीपक की पत्नी टुशी दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी और उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। उसे पता था कि घर के असली मालिक अब वही और उसका बेटा हैं।

उनके जाते ही टुशी ने दरवाज़ा बंद कर दिया और 'हूँह' करती हुई अपने ऊपर वाले कमरे में चली गई। उधर रानी अपनी दोनों बेटियों को ऑटो में बिठाते समय मुड़कर उस घर की तरफ देख रही थी। उसकी आँखों में वे दिन किसी चलचित्र की तरह तैरने लगे जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। सास ऊषा देवी ने उसका वरण किया था, घी के दीये से उसका मुख देखा था और बाएं हाथ में सोने से मढ़ा नोवा (लोहे का कंगन) पहनाया था। आज वही घर उसके लिए पराया हो गया। वर्षों तक उसने इस घर की निस्वार्थ सेवा की थी, पर आज उसकी कोई कदर नहीं थी।

जब तक देवर जी की शादी नहीं हुई थी, तब तक तो ऊषा देवी सास की मर्यादा में रहीं। पर छोटे बेटे की अच्छी नौकरी क्या लगी, उन्होंने न सिर्फ बहू से, बल्कि अपने बड़े बेटे तक से मुँह मोड़ लिया। अपनी बेटियों और पति को भी इस घर में घुटता देख आखिरकार रानी के सब्र का बांध टूट गया था।


रानी की बड़ी बेटी स्कूल में पढ़ती थी। छोटी बेटी के जन्म के बाद नियम के मुताबिक एक माह तक जच्चा घर (कमरे) से बाहर नहीं आ सकती थी। बड़ी बेटी जब स्कूल से थककर आती, तो उसे आधा-पौन घंटा इंतजार करना पड़ता, तब कहीं जाकर खाना मिलता। "चाची फोन पर हैं", "चाची मुन्ने को सुला रही हैं"—बस यही बहाने मिलते थे। घर में मछली पकती, लेकिन बेचारी बच्ची के हिस्से अक्सर दाल-भात और भुजिया ही आती थी। रूपक कभी छुट्टी पर होता और उसकी नजर इन बातों पर जाती, तो वह पूछ लेता। तब जेठ के सामने टुशी की हिम्मत न होती कि कोई बहाना बनाए, इसलिए उन दिनों समय पर ठीक से खाना मिल जाता था। रानी बेचारी अपने कमरे में बंद यह सब देखती और अंदर ही अंदर  कुढ़ती रहती।


लेकिन बात तब और बिगड़ गई जब दोनों भाइयों में ही तकरार हो गई। बात केवल इतनी थी कि घर में अब सदस्यों की संख्या बढ़ गई थी, इसलिए एक-दो कमरे और बनवाने थे। दीपक ने अपनी पत्नी के उकसाने पर इसका पूरा खर्च बड़े भाई पर ही छोड़ दिया और अपने पैसों से वह अलग जमीन लेने की सोच रहा था। जब रूपक ने इसका विरोध किया कि उसके पास अकेले दो कमरे बनवाने का सामर्थ्य नहीं है और दीपक को भी इसमें मदद करनी होगी, तो दोनों भाइयों में फूट पड़ गई। वैसे भी दीपक शुरू से ही आत्मकेंद्रित था, इसलिए सारा दोष अकेले टुशी पर मढ़ा नहीं जा सकता था। धीरे-धीरे यह दरार इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों ने अलग होने का फैसला कर लिया। फिर क्या था, वह दिन और आज का दिन—रानी की आँखों में सब कुछ साफ हो चुका था कि टुशी की चालों की वजह से ही आज यह नौबत आई थी।


जब रूपक और रानी घर से चले गए, तो ऊषा देवी को धीरे-धीरे अकेलेपन का अहसास होने लगा। कुछ दिन बाद वे अपनी बेटी मंजू के घर रहने चली गईं। उनकी बेटी को दोनों भाइयों के अलग होने की सारी बातें पता थीं। जब ऊषा देवी वहाँ रहने आईं, तो बेटी ने माँ को समझाया कि उन्हें अपने बड़े बेटे से भी रिश्ता बनाए रखना चाहिए, ताकि समाज में घर टूटने की भनक किसी को न लगे। ऊषा देवी भी इस बात पर विचार करने लगीं। वे कुछ दिन और अपनी बेटी के यहाँ रुकने वाली थीं। जब से उनके पति का देहावसान हुआ था, वे अक्सर अपनी बेटी के घर चली जाया करती थीं। उनकी बेटी के घर के बगल में एक बड़ा सा काली माता का मंदिर था, जहाँ उनके पति ही उन्हें पहली बार लेकर गए थे। वे उस मंदिर में जातीं और अपने पति की याद में घंटों माता के दर्शन करते हुए परलोक में उनसे दोबारा मिलने की प्रार्थना करती रहती थीं।


इधर, जब सूने घर में टुशी को एकांत मिला, तो उसका असली खेल शुरू हो गया। वह इस कदर अंधी हो गई कि अपने बेटे तक को भूल गई।


दरअसल, विवाह से पहले भी टुशी के कई अनैतिक संबंध थे, जिन्हें छिपाकर उसके माता-पिता ने उसकी शादी दीपक से कर दी थी। शादी के बाद भी वह उन संबंधों में लिप्त रही, लेकिन जब उसे लगा कि दीपक को शक हो सकता है, तो उसने चालाकी से एक बेटे को जन्म दिया ताकि दीपक का भरोसा जीता जा सके। दीपक, जो अपनी पत्नी के मोह में अंधा था, उसकी हर जायज-नाजायज मांग पूरी करता रहा। घर का सारा काम बड़ी भाभी रानी संभालती थीं, जबकि टुशी अक्सर बीमारी का बहाना बनाकर या मायके जाने की जिद करके काम से बच जाती थी। जब रानी भाभी को दूसरी बेटी हुई, तो ऊषा देवी का भेदभाव और बढ़ गया क्योंकि दीपक के पास बेटा था और एक अच्छी नौकरी भी। अंततः इसी अपमान और पक्षपात से थककर रूपक अपनी पत्नी और बेटियों को लेकर अलग रहने चला गया था।


अब टुशी दिनभर बेटे को पढ़ाने के नाम पर कमरे में बंद रहने लगी और अपने प्रेमियों से फोन पर बातें करने लगी। यहाँ तक कि दीपक की गैर-मौजूदगी में एक अनजान आदमी उससे मिलने भी आने लगा था। पति और बेटा स्कूल चले जाते, सास पहले से ही घर में नहीं थी; इसी बात का फायदा वह उठा रही थी।


एक दिन दीपक को उसके बेटे के स्कूल से फोन आया कि वह आकर बच्चे को ले जाए क्योंकि उसकी माँ उसे लेने नहीं आई है। वास्तव में, स्कूल प्रशासन ने टुशी को कई बार फोन किया था, लेकिन उसका फोन लगातार व्यस्त आ रहा था। जब दीपक बेटे को लेने स्कूल पहुँचा, तो वहाँ जो कुछ उसने सुना, उससे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। स्कूल के कर्मचारियों ने बताया कि टुशी अक्सर बच्चे को स्कूल छोड़कर किसी आदमी के साथ उसकी बाइक पर चली जाती थी। कई बार वही अनजान व्यक्ति उसके बेटे को स्कूल से लेने भी आता था, जिसका परिचय टुशी ने स्कूल वालों से 'मामा' के रूप में करवाया था।


जब दीपक ने रास्ते में बेटे से पूछा, तो बच्चे ने मासूमियत से बताया कि माँ ने ही उसे उस आदमी को 'मामा' कहकर बुलाना सिखाया है। दीपक ने पहले सोचा कि शायद वह उसका साला 'तपन' होगा, जो आजकल उनके घर के नजदीक ही एक कपड़े की दुकान में काम करता है। लेकिन जब बेटे ने बताया कि वह उसके सगे मामाओं में से कोई नहीं है, तो दीपक सन्न रह गया। वह बेटे को लेकर जल्दी-जल्दी घर लौटा। लौटते समय उसके मन में कई अनुत्तरित सवाल और एक गहरा डर समा गया था, लेकिन वह बेटे के सामने खुद को शांत बनाए रहा।


जैसे ही उसने घर में कदम रखा, सीढ़ियों के पास से ही उसे टुशी के हंस-हंसकर बात करने और आपत्तिजनक आवाजें सुनाई देने लगीं। वह तेजी से ऊपर पहुँचा और उसने टुशी को रंगे हाथों फोन पर अश्लील बातें करते पकड़ लिया।

जब दीपक ने गुस्से में उस पर हाथ उठाया, तो टुशी ने पहले तो रोना-धोना मचाया, लेकिन फिर तुरंत ही खुद को संभाल लिया। दीपक गहरे आक्रोश और घृणा में अपने बेटे को लेकर तुरंत घर से निकल गया और अपनी बहन मंजू के घर जा पहुँचा। उसने वहाँ बेटे को खाना खिलाया और अपनी माँ और बहन से बच्चे का ध्यान रखने को कहकर, दोबारा अपने घर की तरफ निकल पड़ा। इधर ऊषा देवी और मंजू को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हुआ है।


उधर, टुशी ने तुरंत अपने प्रेमी को फोन कर सब कुछ बता दिया। प्रेमी के समझाने पर उसने एक भयानक साजिश रची। उसने खुद को चोट पहुँचाई और दीपक पर घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न का झूठा केस दर्ज कराने की ठान ली। दीपक जब घर पहुँचा और उसे टुशी की इस खौफनाक मंशा का पता चला, तो वह अपनी सामाजिक साख और सरकारी नौकरी बचाने के लिए घुटनों पर आ गया और उससे हाथ जोड़कर माफी मांगने लगा।


टुशी ने सोफे पर बैठकर बेहद ठंडे और क्रूर स्वर में अपनी शर्तें रखीं। उसने कहा, "दीपक, अगर जेल नहीं जाना चाहते तो मेरी बात कान खोलकर सुन लो। तुम्हारी यह विधवा माँ अब से इस घर में नहीं रहेगी। मुझे अपने जीवन में किसी की रोक-टोक पसंद नहीं। न तुम्हारा भाई कभी यहाँ आएगा और न ही कोई और रिश्तेदार। मैं अपनी मर्जी से जिऊंगी; किससे मिलूंगी, यह मेरा फैसला होगा। मैं अपने प्रेमी से मिलूँ या उसे घर पर बुलाऊँ, तुम चूँ तक नहीं करोगे। अगर तुमने दोबारा मुझ पर हाथ उठाया या मेरे निजी जीवन में दखल दिया, तो घरेलू हिंसा के केस में तुम्हें सलाखों के पीछे सड़वा दूंगी।"

दीपक बेबसी और लाचारी से दीवार पर टंगी अपने दिवंगत पिता की तस्वीर की ओर देखने लगा। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह सुन्न कदमों से घर से निकला और वापस अपनी बहन के घर आया। उसने जब माँ और बहन को यह सब बताया, तो दोनों के होश उड़ गए। ऊषा देवी, जिन्होंने अपनी ममता का गलत चुनाव किया था, उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि जिस छोटी बहू पर वे इतना नाज़ करती थीं, वह इतनी शातिर और चरित्रहीन निकलेगी।


अब ऊषा देवी को इस बात का डर सताने लगा कि अगर उनके कुल का यह बिखराव और बदनामी लोगों के सामने आई, तो समाज में उनका क्या मुंह रहेगा। लोक-लाज के डर से उन्होंने दीपक को समझा-बुझाकर नाती के साथ वापस घर भेज दिया और टुशी से जैसे-तैसे सुलह करने की अपील की।

दीपक माँ के कहने पर उस चौखट के भीतर लौट तो आया, लेकिन अब वह मकान उसके लिए 'घर' नहीं रह गया था। उस पुश्तैनी मकान में रिश्तों की गरिमा और पवित्रता हमेशा के लिए दम तोड़ चुकी थी। दीपक अपने ही घर में एक मूक कैदी बनकर रह गया था, जहाँ हुकूमत केवल टुशी और उसके अनैतिक फैसलों की थी।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

बैंगलोर

Monday, May 4, 2026

ममता का पालना

 


​रामपुर गाँव की सुबह अमूमन शांत होती थी, लेकिन उस दिन सन्नाटे को चीरती एक मासूम की रुलाई ने सबको झकझोर दिया। गाँव की सीमा पर, कचरे के ढेर के पास एक नन्ही सी जान पड़ी थी, जिसे चींटियाँ काट रही थीं। सरपंच कमलावती सुबह की सैर पर थीं, तभी रुलाई उनके कानों में पड़ी। कूड़े के बीच उस मासूम को देख उनका कलेजा मुँह को आ गया। उन्होंने तुरंत बच्चे को उठाया, आस-पास आवाज़ लगाई, पर वहाँ सन्नाटे के सिवाय कुछ न था। अपने सेवक बजरंगी की मदद से उन्होंने तुरंत गाड़ी मंगवाई और बच्चे को लेकर अस्पताल भागीं।

​अस्पताल में डॉक्टरों ने जब पुलिस केस की बात की, तो कमलावती तल्खी से बोलीं, "मैं गाँव की सरपंच हूँ, कागजी कार्रवाई होती रहेगी, पहले इस जान को बचाइए।"

​अगली शाम पंचायत बैठी। कमलावती के चेहरे पर दृढ़ता और आँखों में आक्रोश था। गाँव के रसूखदार तेजेंदर सेठ और मुनीम लखन सिंह भी अग्रिम पंक्ति में बैठे थे। कमलावती ने गरजकर कहा, "यह उस बच्चे की हार नहीं, हमारी इंसानियत की हार है। किसका खून है यह? कोई तो सामने आओ। यदि कोई मजबूरी है, तो बंद कमरे में बताओ, हम नाम गुप्त रखेंगे।"

​पर मजमा खामोश रहा। गाँव की चुप्पी कमलावती को कचोटने लगी। उन्हें अहसास हुआ कि लोकलाज का डर ममता से कहीं बड़ा हो चुका है।

​अगले कुछ दिनों में कमलावती ने सरकारी 'ममता का पालना' योजना के बारे में जानकारी जुटाई। उन्होंने पंचायत घर के बाहर एक पालना लगवा दिया, ताकि मजबूरी में कोई अपने कलेजे के टुकड़े को कचरे में न फेंके। गाँव के भीमा भाई जैसे कुछ लोगों ने विरोध किया कि इससे अनैतिकता बढ़ेगी, पर कमलावती ने स्पष्ट कहा, "सजा से सोच नहीं बदलती भीमा भाई, कम से कम यहाँ बच्चा सुरक्षित तो रहेगा।"

​शिक्षित युवा अखिलेश और महक ने भी जागरूकता अभियान शुरू किया। उन्होंने युवाओं को समझाया कि 'आकर्षण' और 'मर्यादा' के बीच एक महीन रेखा होती है। हालांकि, उन्हें उपहास और संदेह का सामना करना पड़ा, फिर भी वे अपनी बात पर अडिग रहे।

​कहानी ने मोड़ तब लिया जब 'ममता का पालना' योजना के तहत पुलिस जाँच और डीएनए नमूनों की बात गाँव में फैली। इस डर से कि कहीं सच सामने न आ जाए, सालों से दबे राज रिसने लगे।

​तेजेंदर सेठ के घर काम करने वाली रूपा एक रात कमलावती के पैरों में गिरकर फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने कबूला कि सालों पहले बदनामी के डर से उसने अपना बच्चा जंगल में छोड़ दिया था और मुनीम लखन सिंह ने इस पाप को छिपाने में उसकी 'मदद' की थी। उधर, निःसंतान मानी जाने वाली गोमती का सच भी सामने आया, जिसने समाज के डर से अपने अवैध संबंध की निशानी को कहीं दूर ठिकाने लगाया था।


​कमलावती ने एक बड़ी सभा बुलाई, उम्मीद थी कि सच सामने आने के बाद समाज इन महिलाओं को अपनाएगा और पुरुष अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। लेकिन यथार्थ उम्मीद से कहीं अधिक कड़वा था।

​जब रूपा और गोमती का सच उजागर हुआ, तो गाँव के पुरुषों ने उन्हें सहारा देने के बजाय उन पर 'कुलटा' होने का ठप्पा लगा दिया। लखन सिंह जैसे लोग, जो इस पाप में बराबर के हिस्सेदार थे, साफ मुकर गए और पंचायत में ऊँची आवाज़ में नैतिकता की दुहाई देने लगे। समाज ने इन बच्चों को 'भविष्य' मानने के बजाय 'कलंक' की पहचान दे दी।

​कमलावती ने महसूस किया कि उन्होंने पालना तो रखवा दिया, पर लोगों के दिलों के दरवाजे अब भी बंद हैं। उन्होंने उन बच्चों के लिए एक छोटा अनाथालय तो शुरू किया, लेकिन गाँव का कोई भी 'कुलीन' परिवार उन्हें अपनाने को तैयार नहीं हुआ।

​कहानी के अंत में, 'ममता का पालना' अब भी पंचायत घर के बाहर टंगा है। वह अब खाली तो रहता है, पर इसलिए नहीं कि समाज सुधर गया है, बल्कि इसलिए क्योंकि अब बदनामी के डर से लोग बच्चों को छोड़ने के बजाय और भी खौफनाक रास्ते चुनने लगे हैं। कमलावती उसी पालने के पास खड़ी होकर डूबते सूरज को देख रही थीं। उन्हें समझ आ गया था कि सरकारी योजनाएँ जान बचा सकती हैं, पर सदियों से जमी सामाजिक सड़ांध को एक दिन में साफ नहीं किया जा सकता।

​रामपुर का वह मासूम अब स्कूल जाने लगा था, पर गाँव के अन्य बच्चे उसके साथ नहीं खेलते थे। वह बच्चा 'रामपुर का भविष्य' नहीं, बल्कि रामपुर की 'चुप्पी' का जीता-जागता स्मारक बनकर रह गया था।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती

होश का ज़हर

​होश में रहकर भी, वो ज़हर ही उगलते हैं, हर शब्द में ताने, अपमान ही पलते हैं। रात भर जागकर, मोबाइल की नीली रोशनी में, वो दुनिया अपनी, किसी...