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Wednesday, October 28, 2026

रटंती काली का आह्वान

बराक घाटी के श्रीगौरी ग्राम में माघ की ठिठुरती रात थी। कुशियारा नदी से उठते कोहरे ने विश्वंभर के पुश्तैनी घर को चारों ओर से घेर रखा था। आँगन में रखे तुलसी के चबूतरे के पास खड़े होकर विश्वंभर ने आकाश की ओर देखा। उनके मन में बस एक ही प्रार्थना चल रही थी— "हे माँ विमुख कोरियो ना" (हे माँ, इस बार खाली हाथ न लौटाना)।

पिछले कई सालों से विश्वंभर रटंती काली की पूजा करने का मन बना रहे थे। उनके बड़े भाई विश्वजीत जी की भी यही इच्छा थी, मगर वे इसे पूरा नहीं कर सके। शायद किस्मत भी परीक्षा ले रही थी। कभी विश्वंभर के बेटे नीलांजन की बेटी के जन्म के कारण सूतक लग गया, तो कभी किसी सगे-संबंधी के निधन की खबर आ गई। उनकी पत्नी सृजा अक्सर अपनी आँखों को पोंछते हुए कहतीं, "ठाकुर, आमार कपाले की माँ-र पूजा देखा नाई नी?" (क्या मेरे भाग्य में माँ की पूजा देखना नहीं लिखा है?)

इस बार मौका और भी बड़ा था। स्वर्गीय बड़े भाई विश्वजीत की बेटी की शादी तय हुई थी। भाई की मृत्यु के करीब एक साल बाद जाकर यह रिश्ता पक्का हो पाया था। लेकिन कुछ-न-कुछ अड़चन आती ही रहती थी—कभी गहने खो जाते, तो कभी पंडित जी की तबीयत बिगड़ जाती। पूरा परिवार एक अनजाने डर में रहता था।

एक शाम, जब बौ माँ (सुमना) रसोई में चाय बना रही थीं और सृजा और नयनिका संध्या बाती दे रही थी, तभी विश्वंभर को एक पुराने संदूक में कुछ जरूरी कागज़ ढूंढते समय अपने बड़े भाई की एक पुरानी डायरी मिली। उसमें लिखा था— "रटंती काली की रात ही वह शक्ति है, जो हमारे खानदान की बेटियों का रास्ता साफ करती है।" अपने भाई के इन विचारों को पढ़कर वे भावुक हो उठते हैं। उन्होंने तभी  पक्का इरादा कर लिया कि चाहे जो हो जाए, वे इस बार पूजा करके ही रहेंगे। उन्होंने तुरंत घर के सभी सदस्यों को इक्ट्ठा किया और अपने रिश्तेदारों को भी बुलाया और बड़े ही विश्वास के साथ कहा, "एई बार रटंती पूजा होईबो! माँ ना आइले मेये विदाय ओइतो नाय।" (इस बार रटंती पूजा होकर ही रहेगी! माँ के आए बिना बेटी विदा नहीं होगी।) सभी ने उनकी बात सुनकर आश्चर्य प्रकट किया फिर आपसी परामर्श कर वे तैयारियों में जुट गए। मकर संक्रांति के बाद माघ चतुर्दशी की तिथि आने वाली थी, जिसके बाद भतीजी के विवाह का शुभ मुहूर्त निकलना था। इसी माघ चतुर्दशी में रटंती काली पूजा होती है जो कि पूरे बराक घाटी तथा श्रीभूमि समेत अन्य स्थानों में रहने वाले कई बंगाली समुदायों में लोग श्रद्धा से करते हैं।

आखिरकार माघ की चतुर्दशी आई। पूरे श्रीगौरी गाँव में ढोल और ढाक की आवाजें गूँजने लगीं। नीलांजन और नयनिका ने मिलकर पूजा की वेदी तैयार की। बौ माँ ने आँगन को चावल के घोल (पिठुलि) की सुंदर अल्पनाओं से सजा दिया।

रात के दूसरे पहर में जब पूजा शुरू हुई, तो पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। विश्वंभर ने जब 'रटंती काली' का आह्वान किया, तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके बड़े भाई विश्वजीत उनके बगल में ही बैठे हों।

सृजा ने कांपते हाथों से माँ को लाल चुनरी ओढ़ाई।

बौ माँ और नयनिका ने मिलकर 'उलु-ध्वनि' दी। फिर शंख बजाया गया।

नीलांजन ने जब ढाक बजाना शुरू किया, तो लगा जैसे सालों से रुकी हुई सारी मुश्किलें उस आवाज के साथ दूर हो रही हैं।

घर का कोना-कोना माता की भक्ति से भर गया। विश्वंभर समझ गए कि माँ ने उनकी पुकार सुन ली है और अब शादी की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। वे बस ऐसा सोच ही रहे थे कि तभी कोहरे को चीरती हुई लालटेन की एक रोशनी आँगन में दाखिल हुई। वह गाँव के पुराने डाकिया 'हरी काका' थे। वे हांफते हुए आये और विश्वंभर के हाथ में एक पुराना कागज़ थमाया।

"विश्वंभर बाबू! यह आपकी भाभी (स्वर्गीय भाई की पत्नी) ने बरसों पहले बैंक के लॉकर में गहने सुरक्षित रखे थे, जिसके कागज खो गए थे। आज लॉकर के कागजात मुझे  पुराने हेड ऑफिस के कचरे से मिला है। न जाने ये कैसे हुआ? शायद इसके कागज़ वे आपके पास भिजवाना चाहते थे लेकिन डाक की गलती से ये यही रह गया। आपको दिया नहीं गया।" 

विश्वंभर ने कांपते हाथों से कागज़ का पैकेट खोला तो उसमें बैंक के लॉकर में रखे गहनों के काग़ज़ात थे। जो न मिलने पर गहने बैंक से निकाले नहीं जा सकते थे। वही गहनों के खोए जाने की बात भी अफवाह साबित हुई। 

सृजा ने आँखों में आंसू भरकर शंख बजाया और बौ माँ ने 'उलु-ध्वनि' दी। नीलांजन ने जब ढाक पर आखिरी चोट की, तो लगा जैसे सालों से रुका हुआ कोई भारी बोझ घर से उतर गया है। कोई चमत्कार नहीं हुआ था, बस सही समय पर पुरखों की अमानत का मिलना और विपरीत परिस्थितियों में अपनों का साथ आ जाना ही विश्वंभर के लिए 'रटंती काली' का साक्षात् आशीर्वाद था।

सुबह की पहली किरण के साथ जब कोहरा छँटा, तो विश्वंभर के चेहरे पर एक गहरी शांति थी। उन्हें यकीन हो गया कि माँ ने न केवल उनकी पुकार सुनी, बल्कि उनके बड़े भाई का अधूरा वचन भी पूरा कर दिया।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

A13, B Block Jana Jeeva Orchid apartment Hallehalli Survey no 54 Kithagnur Post K R Pura Bangalore-36 

8217797037

Saturday, October 17, 2026

ये कैसा पानी

बिनोता अभी अभी सिलचर शहर जाने के लिए बस अड्डे पर पहुंची ही थी कि उसे पता चला कि बारिश से रास्ता खराब हो चुका है इसलिए शहर जाने वाला रास्ता अभी बंद है।उसका दिल बैठ गया। बड़ी मुश्किल से उसे एक जगह काम मिला था। सिलचर में एक बुजुर्ग दंपति को पूरे दिन की चिरौरी के लिए कोई चाहिए था। काम उस दंपति के बेटे ने लगवाया था जो कि नौकरी के कारण बाहर रहता है। बुजुर्ग दंपति को घर का काम और हाथ बटाने और बूढ़ी महिला को बात चित करके वाला कोई चाहिए था। बिनोता के घर में उसकी तीन बेटियां थी। तीनों सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। पति भी मिस्त्री का काम करते हैं। लेकिन आमदनी अच्छी नहीं थी। घर का किराया बच्चियों की पढ़ाई के खर्चें सभी में ही सारा रुपया खत्म हो जाता था। बिनोता पहले गांव में ही कभी कभी किसी के यहां शादी ब्याह में खाना पकाने और दूसरे काम करने चली जाती थी जिससे थोड़ी आमदनी होने लगी थी। लेकिन अभी बिनोता की बड़ी बेटी को मैट्रिक की परीक्षा देनी थी। ट्यूशन मास्टर बहुत फीस मांगते थे इसलिए पैसों की कमी के चलते उसको ट्यूशन नहीं भेज सकी। परन्तु घर पर रहकर भी अच्छी पढ़ाई के लिए जरूरी चीजें तो चाहिए ही। सो उसी ने अपनी पति से बात की थी कि कही किसी घर में बात कर ले। बिनोता का पति माधव सिलचर में ही जगाई मिस्त्री के साथ उसी दंपति के घर पर ही कुछ काम पर लगा था। उनके घर के दोमंजिले के काम में। दंपति सारा दिन घर के काम खुद को घसीटते हुए करते। उनके खाने पीने का भी समय होता तब भी देर होती। कभी पत्नी बीमार तो कभी पति बीमार। बुजुर्ग दंपति सारा दिन ही किसी प्रकार कराहते हुए काम करते। बेटा और बहु जब जब छुट्टियों में आते तो अच्छी सेवा होती लेकिन नौकरी के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता। एक बेटी थी वो भी कभी कभी मैके आती तो माता पिता की खूब देखभाल करती। लेकिन अब अकेले अकेले उनसे कोई काम नहीं होता। तो बच्चों की सलाह पर ही दूसरी मंजिल बनवाने की सोची कि कही एक किराएदार मिल जाए तो मकान बुजुर्ग दंपति को भी को अकेला न रहना पड़े। बिनोता के पति ने ही उनके बेटे से बात चलाई और बेटे को अपने माता पिता के लिए यह उचित लगा कि कोई साथ होगा तो उन्हें भी चिंता न होगी। बिनोता का काम भी बहुत साधारण सा था। सुबह आकर वो घर के काम के साथ साथ वो बुजुर्गों की दवाई का खयाल रखेगी। जो जो काम उससे कहा जाएगा वो कर देगी। बदले में सुबह की चाय और दोपहर का खाना मिलेगा और तनखा अलग। बिनोता को भी यह काम सही लगा। बुजुर्ग दंपति की सेवा का पुण्य भी मिलेगा और घर में चार पैसे आयेंगे।


लेकिन हाय री किस्मत। जिस दिन काम पर जाने की बात पक्की कर माधव घर लौटा उसी दिन शाम से आंधी पानी ऐसा बरसने लगा कि जैसे वो भगवान अपने क्रोध दिखा रहे हो। वैसे भी बिनोता के गांव सागरपानी में बरसात के दिन नौका चलने का पुराना इतिहास रहा है। इसीलिए इस गांव का नाम सागरपल्ली से बदल कर सागरपानी रख दिया गया था। पर तीन साल पहले ही सरकार ने इसके जैसे सभी अन्य गांव को सिलचर और अन्य सभी राष्ट्रीय सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए रास्ता बनवा दिया था। लेकिन सरकारी तंत्र के काम तो सभी को पता है। ढंग का काम न था। सो बारिश में पहले ही दो गांव के सड़क पहले ही धरती में समा गए। इस बार उनकी बारी थी। उनके गांव से जो सड़क मुख्य राजमार्ग से जुड़ती थी उस रास्ते कई खेत वाले जगह है। हर बार बारिश में पानी सड़क के ऊपर ही बहता है। लेकिन गांव वालों ने सड़क के दोनों और बांस के बाड़े लगा रखे हैं ताकि सड़क और खेत के बीच अंतर रहे लेकिन कुछ बदमाशाें को यह रास न आया और बांस का बेड़ा कई जगहों से उखाड़ डाला। वही सड़क पर बार बार पानी आते रहने से सड़क भी कमज़ोर होने लगा। 


जिस दिन से आंधी पानी बरसने लगा उस दिन से ही सागरपानी वालों के दिल जोर से धड़कने लगे। खेत पहले हो पानी में डूब चुके थे। सड़क भी चली गई तो गांव वालों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। जरूरत का सामान तो पास के बाज़ार से लाया जा सकता है लेकिन बाज़ार तक जाने का यही एक रास्ता है। बरसों से गांव वाले इसी का ही इस्तेमाल करते रहे हैं। सड़क नहीं थी तब भी। लेकिन तब की बात अलग थी क्योंकि तब खेत डूबने पर भी नाँव चलाकर भी काम निकलता था। लेकिन सड़क बनने के बाद अब नाँव नहीं चल सकती। क्योंकि बीच में सड़क आ जाती है। बिनोता इसी सड़क के किनारे अब खड़ी थी। साथ में माधव भी खड़ा था। दोनों अब इसी उलझन में खड़े थे कि अब सिलचर शहर जाय तो जाय कैसे और यदि आज नहीं गए तो कही काम न छूट जाय। दोनों के आंखों में पानी आ रहा था। वही बादल भी अब धीरे धीरे पानी बरसा रहा था। सड़क तो पहले से ही पानी लेकर उनके सामने उपस्थित था।

एक किरण और एक अंतहीन रात



मोहल्ले की तंग गलियों में सुबह का सूरज उतरने से पहले ही विष्णु शंकर राय के घर में चूल्हा जलने की सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी। उस पूरी बस्ती में कायस्थ परिवारों का बाहुल्य था। ऐसे में एकमात्र ब्राह्मण परिवार होने के नाते विष्णु जी और उनकी पत्नी आशा को सामाजिक आदर तो पूरा मिलता, लोग उन्हें इज्जत से 'पंडित जी' कहकर बुलाते, लेकिन इस मुखौटे के पीछे दबी हुई फुसफुसाहटें थीं। कोई उनकी आर्थिक लाचारी पर हंसता, तो कोई उनकी निःसंतानता को लेकर दबी जुबान से तंज कसता।

विष्णु जी सुबह-सवेरे दो-चार घरों में पूजा-पाठ और थोड़ा-बहुत कर्मकांड कराकर बमुश्किल दो पैसे कमा पाते थे। दिन ढलते वे कुछ स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते, जिससे महीने के अंत में घर का किराया और राशन का जुगाड़ हो पाता था। उनकी पत्नी आशा पास के ही एक निजी कॉन्वेंट स्कूल में अध्यापिका थीं। दोनों की शादी को आठ साल बीत चुके थे, लेकिन घर सूना था। आर्थिक तंगी, कर्ज के दबाव और हर पल की अनिश्चितता ने दोनों के भीतर गहरे मानसिक तनाव को जन्म दे दिया था।

एक रविवार की सर्द सुबह में जब विष्णु जी गली के नुक्कड़ पर दूध लेने जा रहे थे, तो उनकी नजर सामने पड़े कूड़े के ढेर पर पड़ी। वहां से किसी नवजात शिशु के रोने की बहुत ही धीमी और क्षीण आवाज आ रही थी। विष्णु जी का दिल दहल उठा। उन्होंने आगे बढ़कर जब गंदे कपड़ों की पोटली हटाई, तो ठंड से ठिठुरती एक नन्ही सी नवजात बच्ची सांसें ले रही थी।

"ईश्वर! यह तुमने क्या परीक्षा ली है?" विष्णु जी की आंखें भर आईं।

जो गोद इतने सालों से सूनी थी, उसमें आज अचानक सृष्टि के उपहार की तरह वह बच्ची आ गिरी थी। वे बिना एक पल गंवाए बच्ची को अपनी छाती से लगाकर भागे-भागे घर आए। आशा ने जब उस फूल सी बच्ची को देखा, तो उसके आंसुओं का बांध टूट गया। दोनों ने मिलकर उस बेसहारा जान को साफ किया, गर्म कपड़े पहनाए और तुरंत प्राथमिक चिकित्सा के लिए नजदीकी अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने राहत की सांस लेते हुए बताया कि समय पर लाने से बच्ची की जान बच गई है।

अभी वे अस्पताल से लौटे ही थे कि उनके घर के बाहर भीड़ जमा हो गई। पास की ही एक झुग्गी बस्ती से एक अनजान महिला रोते-बिलखते हुए वहां पहुंची और विष्णु जी पर चीखते हुए सनसनीखेज आरोप लगाने लगी— "यही हैं वो पंडित! इन्होंने ही मेरा बच्चा चुराया है! ये लोग बांझ हैं, इसलिए इन्होंने मेरी औलाद पर हाथ साफ कर दिया!"

देखते ही देखते बात आग की तरह फैल गई। मोहल्ले के लोग जो पहले पीठ पीछे हंसते थे, वे अब तमाशबीन बन गए। किसी ने तुरंत पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस आई और बिना किसी तहकीकात के विष्णु जी को थाने उठा ले गई।

पुलिस ने जब मामले की तह तक जाने की ठानी, तो असली जाल खुलना शुरू हुआ। पुलिस वास्तविक अपराधी उस युवती को ढूंढने में जुट गई जिसने डर और कलंक के मारे रात के अंधेरे में बच्ची को कूड़े में फेंका था, साथ ही उस झूठा आरोप लगाने वाली महिला की नीयत की भी जांच शुरू हुई। लेकिन इस कानूनी और दस्तावेजी प्रक्रिया, डीएनए मिलान और गवाहों के बयानों में पूरे छः महीने का वक्त बीत गया। इन छः महीनों में विष्णु जी ने बिना किसी दोष के हवालात और जेल की काल कोठरी की हवा खाई।

बाहर आशा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए फर्जी वीडियो और आधे-अधूरे सच के आधार पर स्कूल प्रबंधन ने उस पर लगातार दबाव बनाया, जिससे तंग आकर आशा को खुद अपनी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। वह एक तरफ अपनी गृहस्थी संभालती, तो दूसरी तरफ अपने निर्दोष पति को बेदाग बाहर निकालने के लिए कचहरी और पुलिस थानों के चक्कर काटती रही। समाज ने बिना कुछ जाने उन्हें अपराधी मान लिया था।

छः महीने बाद सच्चाई की जीत हुई। सीसीटीवी फुटेज, डीएनए रिपोर्ट और उस लावारिस बच्ची को फेंकने वाली असली मां के पकड़े जाने से यह साबित हो गया कि विष्णु जी पूरी तरह निर्दोष थे। कोर्ट के डालने पुलिस ने सारे तथ्य रखे और कानून ने विष्णु जी को सम्मान के साथ रिहा कर दिया और झूठा आरोप लगाने वाली महिला को गिरफ्तार करने और मुकदमा चलाने के आदेश दे दिए। 

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समाज और मोहल्ले के ताने इस हद तक बढ़ चुके थे कि उस मध्यवर्गीय परिवार के लिए वहां एक दिन भी बिताना मुश्किल था। अंततः, वे मोहल्ला और वह शहर हमेशा के लिए छोड़कर जाने को मजबूर हो गए।

उधर, प्रशासनिक नियमों के तहत वह नवजात बच्ची बाल कल्याण समिति के संरक्षण गृह में एक पालने में सुरक्षित पल रही थी। वह अनजान और मासूम बच्ची शायद यह नहीं समझ पा रही थी कि उसके रक्षक कौन थे, लेकिन पालने में लेटे-लेटे उसकी नन्ही आंखें लगातार चारों तरफ ऐसे टकटकी लगाकर देख रही थीं, मानो वह अपने उन नए माता-पिता—विष्णु और आशा—को ही खोज रही हो, जिन्होंने उसे एक नई जिंदगी दी थी।

अंधेरी रात के साये भले ही गहरे थे, पर उस मासूम की टकटकी में भविष्य की किसी अनजानी सुबह की हल्की सी उम्मीद अब भी बाकी थी।

ममता की डोर

गुवाहाटी के एक छोटे से मोहल्ले लाल गानों बस्ती में अरुणाभ का परिवार रहता था। अरुणाभ एक साधारण प्राइवेट नौकरी करने वाला सीधा-साधा इंसान था, जो दिनभर मेहनत करके शाम को घर लौटता था। उसके घर में उसकी बूढ़ी माँ कमला देवी, पत्नी अनन्या और दो छोटे बच्चे—पाँच साल का अनुज और चार साल की अनुष्का थे।


अनन्या का स्वभाव शुरू से ही बहुत जिद्दी और लड़ने-झगड़ने वाला था। शादी से पहले ही उसके मायके वालों ने भी सबको बता दिया था कि वह बात-बात पर कलेश करती है और इसी वजह से उसकी शादी में बहुत अड़चनें आई थीं। सबको लगा कि शादी के बाद ससुराल में रहेगी तो वह भी ठीक हो जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।


घर की सबसे बड़ी समस्या यह थी अनन्या का अपनी सास के साथ नहीं बनना।  अनन्या को अक्सर इस बात से चिढ़ थी कि सास कमला देवी अपने पोते-पोतियों से बहुत प्यार करती थीं। जब भी वे उन बच्चों को अपने पास बिठाकर कहानियां सुनातीं, या उनके लिए कुछ अच्छा बनाकर खिलातीं, तो अनन्या गुस्सा होकर बच्चों की छोटी मोटी गलतियां निकालने लगती और उन्हें बिना बात के बेरहम होकर  पीटती। वे चार-पाँच साल के मासूम बच्चे अपनी ही माँ की मार से सहम जाते और एक कोने में दुबक कर रोने लगते।

जब अरुणाभ या कमला देवी उसे ऐसा करने से रोकते, तो वह दोनों को बहुत अपमानित करती और कड़वे ताने मारती। बदनामी के डर से दोनों चुपचाप अपना दर्द सहते रहते। अरुणाभ ने कई बार अनन्या के मायके फोन करके शिकायत की, तो उधर से यही जवाब मिलता— "जमाई जी, वह बचपन से ऐसी ही है, हमने भी उससे परेशान होकर ही जल्दी विदा किया था।"

दिन बीतते गए और अत्याचार बढ़ता गया। एक दिन घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ कि क्यों सास कमला देवी ने उससे पूछे बगैर ही बच्चों को अपने साथ पड़ोस में हो रही मनसा पूजा में लेकर गई। अनन्या ने दहेज और घरेलू हिंसा के झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर अरुणाभ को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह अपनी बूढ़ी माँ को घर से निकाल दे और किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आए।

अंदर से पूरी तरह टूट चुका अरुणाभ दुखी होकर अपनी माँ कमला देवी को शहर के बाहर बने 'सत्संग आश्रम' छोड़ने गया। वो मन ही मन रो रहा था। कमला देवी भी आँखों में आँसू लिए बैठी थी। आश्रम वालों के पूछने पर उन्होंने सब कुछ बताया । तो आश्रम वालों ने उसे कानूनी मदद लेने को कहा, लेकिन डिजिटल दुनिया में बदनामी के डर, नौकरी का तनाव, बच्चों की जिम्मेदारी और मानसिक थकान के कारण उसमें लड़ने की हिम्मत नहीं बची थी।

माँ को आश्रम छोड़ने के बाद अरुणाभ का बुरा हाल हो गया। न उसे रात को नींद आती थी और न ही खाने में कुछ अच्छा लगता था। घर में बच्चे भी अपनी दादी को बहुत याद करते थे, पर माँ के डर से कुछ बोल नहीं पाते थे। आखिर एक दिन अरुणाभ से रहा नहीं गया और वह चुपचाप अपनी माँ से मिलने सत्संग आश्रम पहुँच गया।

वहाँ उसने देखा कि बेटा और पोते-पोतियों से दूर रहकर उसकी माँ बहुत कमजोर और दुबली हो गई हैं। अरुणाभ वहीं बैठकर खूब रोया। उस दिन के बाद से उसने एक रास्ता निकाला। वह ऑफिस के काम के बहाने छुप-छुपकर अपनी माँ से मिलने जाता, उनके लिए दवा और खाने का इंतजाम करता, आश्रम में थोड़ी सेवा (श्रमदान) करता और शहर में बाहर थोड़ा बहुत एक्स्ट्रा काम करके जो पैसे मिलते, वे चुपके से अपनी माँ को दे आता। साथ ही, उसने किसी तरह बच्चों को भी बहाने से दादी से मिलवाने का प्लान बना लिया था। 

लेकिन एक दिन अनन्या को इस बात की भनक लग गई। उसने घर में भयंकर तमाशा किया और खुद को ही पीटने लगी ताकि वह पति पर कोई नया इल्जाम लगा सके। पर इस बार किस्मत ने साथ दिया। पड़ोसियों को इस घर के हालात पहले से पता थे, इसलिए वे बीच में आ गए। अरुणाभ ने भी इस बार हिम्मत जुटाई और सबके सामने अपनी पत्नी की सारी सच्चाई बता दी। कुछ पड़ोसियों ने उस झगड़े का वीडियो भी बना लिया।

इसके बाद अरुणाभ ने बिना डरे पहली बार पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज कराई कि कैसे उसकी पत्नी उन सबको मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रही है। अनन्या ने भी थाने जाकर विमेन सेल में पति और सास पर झूठे आरोप लगाए, पर अब अरुणाभ के मन में कोई डर नहीं था। वह अपनी माँ कमला देवी को सम्मान के साथ  घर वापस ले आता है। इस बात पर  अनन्या बहुत झगड़ा करती है लेकिन अरुणाभ नहीं सुनता है। वो भी उस पर चिल्ला कर कहता है -- मेरी मां है, ये घर मेरे मां-बाप का है, तेरा नहीं है। जा जो करना है कर ले लेकिन मैं मेरी मां को घर पर ही रखूंगा। कमला देवी अपने बेटे-बहू के झगड़े से डर जाती है। वे रोने लगती है और बेटे और बहू के बीच बचाव करने की कोशिश करती है। लेकिन कमला अपनी सास को ही गालिया देना शुरू कर देती है। पड़ोसी तमाशबीन होकर ये सब कुछ फोन पर रिकॉर्ड कर लेते हैं। 


वही अनन्या अपने घर से निकल जाती है और मायके जाती है । लेकिन वे लोग उसे घर में घुसने नहीं देते हैं क्योंकि वहां यदि ये रही थी बेकार के झगड़े में उन्हें फंसा देगी। वे उसके इसी झगड़ालू स्वभाव के कारण उसे उसी समय ही घर से निकाल देते हैं। तब वो मायके में जगह न पाने की वजह से वीमेन सेल जाकर संरक्षण मांगती है और उनके संरक्षण गृह  में रहने लगती है।  वहाँ उसका पाला ऐसी महिलाओं से पड़ा जिनकी जिंदगी के संघर्ष बहुत दर्दनाक थे। वहाँ कुछ बुजुर्ग औरतें भी थीं जिन्हें उनके बच्चों ने छोड़ दिया था। क्योंकि उन्होंने भी अपने घर से कलह किया था और अब उनके ही कर्मों का फल है कि वे अब निराश्रित हैं। कानूनी लड़ाई चल रही है और जब तक कोई नतीजा नहीं निकलता है तब तक वे इसी प्रकार बेसहारा रहेंगी। 

दिन बीतने के साथ जब अनन्या ने उन सबकी कहानियाँ सुनीं, तो उसे समझ आया कि उसने अपने ही हाथों अपना हँसता-खेलता घर उजाड़ दिया है। हालांकि अभी भी उसके अंदर थोड़ी अकड़ बची हुई थी।

इधर अरुणाभ अनन्या को तलाक देने का मन बना लेता है। घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना आदि का मुकदमा चलाने की तैयारी होने लगती है। दोनों पक्षों को वकील भी मिलते हैं। लेकिन कानूनी प्रक्रिया में देर होने की संभावना के कारण इसे कोर्ट के बाहर सुलझाने का सुझाव वकील पक्ष देता है। आखिरी  में वीमेन सेल और सत्संग आश्रम के लोगों ने एक मीटिंग रखी, जहाँ अरुणाभ, कमला देवी और अनन्या आमने-सामने थे। वहाँ दोनों पक्षों के वकील भी थे। वही अरुणाभ ने अनन्या के खिलाफ कुछ साक्ष्य भी जुटा लिए थे जिसने वह मोबाइल रिकॉर्डिंग भी थी जो कि लड़ाई वाले दिन एक पड़ोसी ने की थी। सभी सबूत सामने थे परन्तु अनन्या अभी भी अपनी जिद पर अड़ी थी और कह रही थी, "मैंने कुछ गलत नहीं किया, सब मुझे दबाना चाहते थे।"


तभी वहाँ शेल्टर होम की एक बुजुर्ग महिला आगे आती , जिसके खुद के बच्चों ने उसे ठुकरा दिया था। उसने प्यार से अनन्या के सिर पर हाथ रखकर कहा:

"बेटी, जिद और अहंकार इंसान को अकेला कर देता है। मैंने भी यही किया था। झगड़ा करके अपनी सास को भी निकाल दिया था। आज मेरे बेटे ने खुद मुझे निकाल दिया है।ये तेरा पति और तेरी सास हैं, इन्होंने तुझे जेल भेजने के बजाय सुधरने का मौका दिया है। जिस दिन तेरे बच्चे तुझसे नफरत करने लगेंगे, उस दिन तुझे समझ आएगा कि तूने क्या खोया है।"

उन बुजुर्ग महिला की बात सीधे अनन्या के दिल पर लगी। उसे अपने वे छोटे बच्चे याद आ गए जिन्हें वह बेकसूर मारती थी। उसकी आँखें पहली बार सचमुच भर आईं और वह अपनी सास कमला देवी के पैरों में गिरकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसने मान लिया कि उसकी गलत आदतों की वजह से सब कुछ बर्बाद हुआ था।


इसके बाद यह तय हुआ कि अनन्या को सीधे घर नहीं ले जाया जाएगा। उसे कुछ महीने सत्संग आश्रम में रहकर बुजुर्गों की सेवा करनी होगी और अपनी काउंसलिंग करवाएगी और घर की सभी छोटी बड़ी समस्याओं का बिना कलह के समाधान पर जोर दिया जाएगा। अनन्या को अपने क्रोध और अहंकार पर काबू पाना होगा। उसने जो अपने पति, बच्चों और सास पर बिना वजह जुल्म किये है उसके लिए आश्रम में छह महीने श्रमदान करना होगा। उसके बाद ही उसकी रिहाई हो सकती है । वही अरुणाभ ने एक जिम्मेदार पति का फर्ज निभाते हुए अनन्या को एक और मौका देने का फैसला किया और अपने परिवार को संभाला और बच्चों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा।

वही अनन्या अब सत्संग आश्रम में महिला कैदी की सादी वर्दी वाली साड़ी पहनकर श्रमदान कर रही थी। बुजुर्गों के कपड़े धोते हुए वो सोच रही थी कि काश " मैं अपने आप पर थोड़ा सा अंकुश लगा लेती।"

Friday, July 17, 2026

होश का ज़हर


​होश में रहकर भी, वो ज़हर ही उगलते हैं,

हर शब्द में ताने, अपमान ही पलते हैं।

रात भर जागकर, मोबाइल की नीली रोशनी में,

वो दुनिया अपनी, किसी और की दुनिया में ढालते हैं।

​माँ की रसोई से आता है, उनके हिस्से का निवाला,

पर रसोई में मेरी, वो खाली ही है प्याला।

बिना कहे सब समझ लूँ— ये अपेक्षा उनकी जिद है,

पर न समझूँ तो, उनकी जुबान पर ताने की हद है।

​नशा तो बस एक बहाना है, जो उन्हें सुकून देता है,

होश में रहकर तो, वो मेरी हर छोटी भूल को गिनता है।

क्या मैं एक रोबोट हूँ? जो बिना कहे सब जान लूँ?

या उनकी खामोशी के पीछे, अपना स्वाभिमान छोड़ दूँ?

​मेरे शौकों को, वो मेरी कमज़ोरी मान बैठे हैं,

पिता और भाई के प्यार को, वो मेरा अहंकार मानते हैं।

हाथ जब उठता है, तो ज़हन में एक ही सवाल आता है—

क्या यही वो रिश्ता है, जो बरसों तक निभाना है?

​मैं उलझी हूँ अपनी ही आदतों की इन जंजीरों में,

सुविधाओं की चमक और अपमान की इन लकीरों में।

वो तो होश में रहकर, मेरी हस्ती को मिटा रहे हैं,

और मैं खुद को, खुद ही इस पिंजरे में सजा रही हूँ।

​वो खुद को 'पीड़ित' बताकर मुझे दोषी ठहराते हैं,

अपनी ही कुंठाओं का इल्जाम मुझ पर मढ़ जाते हैं।

Saturday, June 27, 2026

संगति की कीमत


मुस्कान और सोनाली का बचपन बिल्कुल साथ-साथ बीता था। दोनों एक ही गली में रहती थीं और दोनों के घर के बीच महज़ तीन मकानों का फासला था। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि गली का हर कोई जानता था—जहाँ सोनाली होगी, वहाँ मुस्कान ज़रूर मिलेगी। सोनाली के माता-पिता भी इस बात को अच्छे से जानते थे, इसलिए उन्होंने शुरुआत में मुस्कान पर अपनी बेटी की तरह ही पूरा भरोसा किया था। दोनों सहेलियों ने बचपन में एक मासूम सा सपना भी देखा था कि जब वे बड़ी होंगी, तो शादी भी एक ही दिन और एक ही मंडप में करेंगी।

समय गुज़रता गया और दोनों जवान हुईं। सोनाली आधुनिक ख्यालों की लड़की ज़रूर थी, थोड़ी नादान और बेवकूफ़ भी थी, लेकिन वह अपने परिवार की मर्यादा को अच्छी तरह समझती थी। वहीं दूसरी तरफ, मुस्कान के मन में कुछ और ही चल रहा था, जिसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। उसका रहन-सहन और चाल-चलन सोनाली से बिलकुल अलग था। उसे अपने सिवा कोई और दिखाई न देता था। पर कहते हैं न कि दो अलग किस्म के लोग ही एक-दूसरे के पक्के दोस्त बनते हैं; शायद इसीलिए सोनाली और मुस्कान की दोस्ती इतनी अटूट थी।

एक दिन सोनाली के पिता गली से गुज़र रहे थे, तभी उन्होंने नुक्कड़ पर पंक्चर बनाने वाले ज़ाकिर के साथ मुस्कान को बेहद करीब और घुलमुल होते देख लिया। मुस्कान की इस हरकत को देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर आकर उन्होंने बहुत भारी मन से यह बात सोनाली की माँ को बताई। अपनी पत्नी से बात करते हुए उनके दिल में एक गहरा पछतावा जाग रहा था। वह खुद को कोस रहे थे कि आखिर उन्होंने क्यों सोनाली को मुस्कान के इतना करीब आने दिया, जबकि उसी गली में दो-तीन और भी अच्छी लड़कियाँ थीं, जिनके साथ सोनाली की दोस्ती कराई जा सकती थी।

उन्होंने सोनाली को बुलाकर बहुत समझाया और मुस्कान से दूरी बनाने को कहा। सोनाली थोड़ी नादान थी; उसने माता-पिता की बात मानकर मुस्कान से थोड़ी दूरी तो बना ली, लेकिन बचपन की वफ़ादारी के कारण वह अपनी सहेली को दिल से पूरी तरह दूर नहीं कर पाई। इसलिए, कभी-कभी जब वह घर से बाहर किसी काम से जाती और रास्ते में मुस्कान मिल जाती, तो दोनों के बीच अभी भी उतनी ही आत्मीयता से बातचीत होती थी। सोनाली को लगता था कि मुस्कान प्रगतिशील विचारों वाली लड़की है, इसीलिए वह ज़ाकिर से प्यार करती है; जबकि उसे अपने पिता पुराने ख्यालों के नज़र आते थे। यही वजह थी कि वह मुस्कान से मिलने या बातचीत करने की बात घर में किसी से नहीं कहती थी। पर गली के लोगों को सब पता था, हालाँकि शुरुआत में उन्हें इस मामले की गहराई का अंदाज़ा नहीं था और न ही कोई लेना-देना था।

इसी बीच दोनों के परिवारों ने अपनी-अपनी बिरादरी में लड़के ढूंढे। सोनाली के लिए देवेंद्र का और मुस्कान के लिए अरुण का रिश्ता पक्का हो गया। किस्मत से दोनों की शादियाँ एक ही दिन तय हुईं, जिससे लगा कि उनका बचपन का सपना पूरा होने जा रहा है। सोनाली अपने नए जीवन को लेकर बेहद खुश थी और माता-पिता के फैसले का सम्मान कर रही थी। लेकिन मुस्कान के दिमाग में तो एक खौफनाक साज़िश चल रही थी। वह अरुण से शादी नहीं करना चाहती थी, क्योंकि वह उस पंक्चर वाले के प्यार में अंधी हो चुकी थी। अपनी राह के इस कांटे को हटाने के लिए उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अरुण की हत्या की एक बेहद क्रूर योजना बना डाली।

शादी से ठीक दो दिन पहले, मुस्कान ने कुछ समय साथ बिताने के बहाने रात के वक्त अरुण को शहर के बाहर एक सुनसान सड़क के किनारे बने ढाबे पर बुलाया। अरुण को लगा कि शादी से पहले के ये लम्हें खास होते हैं, सो वह मुस्कान के बुलावे पर चला गया। वहाँ उसका प्रेमी ज़ाकिर पहले से ही हथियार लेकर ढाबे के पास झाड़ियों में छिपा हुआ था। कुछ देर मुस्कान और अरुण ने साथ वक्त बिताया और चाय-पराठे खाए। फिर मुस्कान ने कुछ देर टहलने की बात कही और चुपके से ज़ाकिर को इशारा कर दिया।

ज़ाकिर ने रास्ते पर चल रहे अरुण पर अचानक हमला कर दिया। अरुण अपनी जान बचाने के लिए चीखता रहा, लेकिन ढाबे से दूर होने के कारण वहाँ मौजूद लोगों को उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। परंतु संयोग से, अरुण का पुराना दोस्त सनोज उसी रास्ते से अपनी दुकान बढ़ाकर लौट रहा था। दूर हो रही हाथापाई को तो वह देख पा रहा था, लेकिन अंधेरे के कारण यह नहीं देख सका कि वहाँ कौन है। तभी एक गाड़ी को नज़दीक आते देख मुस्कान और ज़ाकिर घबरा गए। ज़ाकिर तुरंत वहाँ से भाग निकला और मुस्कान वहीं पर नाटकीय अंदाज़ में चिल्लाने लगी कि पैसे और चैन की छीना-झपटी में एक गुंडे ने अरुण पर हमला कर दिया है। घायल अरुण को सनोज तुरंत अस्पताल लेकर भागा।

अगली सुबह जब पुलिस की तफ्तीश शुरू हुई, तो दो दिन बाद ज़ाकिर पकड़ा गया। पुलिस की कड़ाई से पूछताछ करने पर उसने मुस्कान का नाम उगल दिया। मुस्कान का यह घिनौना और क्रूर चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया। समाज उसकी इस दरिंदगी को देखकर थू-थू कर रहा था। लेकिन इस बात का सबसे बड़ा और घातक झटका सोनाली के परिवार को लगा।

देवेंद्र के माता-पिता ने जैसे ही यह खबर सुनी, उन्होंने तुरंत सोनाली से रिश्ता तोड़ दिया। उनका कहना था कि जो लड़की दिन-रात मुस्कान जैसी चरित्रहीन के साथ उठती-बैठती थी, वह इतनी पाक-साफ़ कैसे हो सकती है? संगति का असर तो आता ही है। सोनाली के माता-पिता ने लाख समझाया कि सोनाली की मुस्कान से दोस्ती तो कब की खत्म हो चुकी थी, पर देवेंद्र का परिवार नहीं माना। उनका कहना था कि सोनाली उनकी आँखों में धूल झोंक रही थी और वह अब भी छिप-छिपकर मुस्कान से मिलती थी। सोनाली के पिता ने रोते हुए देवेंद्र के परिवार के सामने अपनी पगड़ी तक रख दी, खुद सोनाली ने अपनी बेगुनाही की कसमें खाईं कि वह इस साज़िश के बारे में कुछ नहीं जानती थी, लेकिन समाज के तानों के डर से देवेंद्र के परिवार ने उनकी एक न सुनी और शादी टूट गई।

अब कई महीने बीत चुके हैं। अरुण कुछ दिनों तक ज़िंदगी और मौत के बीच जूझता रहा और आखिरकार अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मुस्कान और ज़ाकिर जेल में अपने कर्मों की सज़ा काट रहे हैं, लेकिन बिना किसी कसूर के सोनाली की ज़िंदगी भी पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। गली के लोग आज भी जब सोनाली को देखते हैं, तो उनकी आँखों में वही शक और बदनामी के भाव होते हैं।

सोनाली रोज़ अपने घर की खिड़की पर बैठती है और उसके दिल में एक भयानक कसक उठती है। वह सोचती है कि गलती मुस्कान की थी, क्रूरता उसने दिखाई, फिर उसकी सज़ा का यह बोझ समाज आज भी सोनाली के कंधों पर क्यों लाद रहा है? क्या सिर्फ एक गलत सहेली को चुनने की कीमत एक सीधी-सादी लड़की को अपनी पूरी ज़िंदगी की बर्बादी से चुकानी पड़ती है? यही सवाल और एक अजीब सी छटपटाहट आज भी उसके ज़हन में ज़िंदा है।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

Monday, June 22, 2026

अम्बुबाची मेला: आस्था, लोक-लोकाचार और प्रकृति का महापर्व

 


पौराणिक पृष्ठभूमि और शक्तिपीठ की उत्पत्ति--

अम्बुबाची पर्व का सीधा संबंध सती के पावन चरित्र, उनके आत्मदाह और शक्तिपीठों की स्थापना से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित भव्य यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का घोर अपमान देखकर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए थे। वियोग और क्रोध में व्याकुल भगवान शिव दक्ष यज्ञ का विनाश कर जब सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहां-जहां गिरे, वहां-वहां पावन शक्तिपीठ स्थापित हुए। इसी क्रम में असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर माता सती का 'योनि भाग' गिरा, जो आज जगत प्रसिद्ध और तंत्र साधना का मुख्य केंद्र 'मां कामाख्या मंदिर' कहलाता है।


अम्बुबाची का अर्थ और मां कामाख्या का रजस्वला होना

'अम्बुबाची' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'पानी का प्रस्फुटन' या 'जल का बोलना' माना जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में वर्षा ऋतु के आगमन के साथ मनाया जाता है। इस समय माता कामाख्या को साक्षात प्रकृति के रूप में रजस्वला माना जाता है; ऐसी मान्यता है कि इन तीन से चार दिन वे मासिक धर्म के चक्र से गुजरती हैं। कामाख्या शक्तिपीठ को स्त्री शक्ति, जनन क्षमता और मातृत्व के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में नारी के प्राकृतिक स्वरूप को कितना पूजनीय माना गया है। इन तीन से चार दिनों में मंदिर के गर्भगृह से बहने वाली प्राकृतिक जलधारा पूरी तरह लाल हो जाती है, जिसे बाद में अत्यंत पवित्र 'अम्बुबाची वस्त्र' (रक्त वस्त्र) भक्तों में प्रसाद रूप में बांटा जाता है। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों की संख्या में अघोरी, तांत्रिक, साधु और भक्त नीलांचल पर्वत पर जुटते हैं, जिससे यह पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक समागम बन जाता है।


बंगाली पंचांग और शास्त्रीय तिथि का महत्व--

बंगाली संस्कृति और समाज में अम्बुबाची पर्व का एक अत्यंत विशेष, अनिवार्य और व्यावहारिक स्थान है। बंगाली पंचांग (पांजी) में अम्बुबाची की शुरुआत और अंत का समय बेहद सूक्ष्मता से दिया होता है, जिसमें 'अम्बुबाची प्रवृत्ति' (शुरुआत) और तीन या चार दिनों के बाद 'अम्बुबाची निवृत्ति' (समाप्ति) की सटीक तिथि और समय का स्पष्ट उल्लेख रहता है। बंगाली पंचांग में प्रत्येक आषाढ़ महीने के सात तारीख को ही अंबुबाची शुरू होती है। बंगाली परिवारों में पंचांग की इन तिथियों का बड़ी कड़ाई और श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है, जहाँ प्रवृत्ति के शुरू होते ही घरों के नियम बदल जाते हैं और निवृत्ति के बाद ही गृहशुद्धि और भगवान के मंदिर की शुद्धि कर सामान्य जीवन शुरू होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस काल में पृथ्वी पर सूर्य की किरणें और वर्षा मिलकर एक नया जीवन चक्र शुरू करती हैं, जिससे इसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा के शुद्धिकरण का समय भी माना जाता है।


घरेलू लोकाचार और मंदिर के कपाट बंद रखने की परंपरा--

अम्बुबाची के इन तीन-चार दिनों में केवल कामाख्या मंदिर ही नहीं, बल्कि आम हिंदू घरों के मंदिरों के कपाट भी पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और भगवान के आसन को लाल कपड़े से ढक दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माता के रजस्वला होने के समय पूरी प्रकृति विश्राम की अवस्था में होती है, इसलिए इन दिनों में मूर्तियों या तस्वीरों को छूना, उन्हें स्नान कराना या तिलक लगाना पूरी तरह वर्जित होता है। विशेषतः जिन तस्वीरों में देवी के साथ कोई देवता रहते हैं उनकी भी पूजा नहीं होती। केवल नारायण पूजा और शालिग्राम की पूजा ब्राह्मण करते हैं।घर की महिलाएं इन तीन - चार दिनों में किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रिया या पूजा  नहीं करती हैं। इस दौरान केवल कुल पुरोहित या ब्राह्मण ही बिना मूर्तियों को छुए अत्यंत सात्विक विधि से पूजा करते हैं। इस काल में बिना आग पर पकाए गए भोजन का नियम होने के कारण ब्राह्मण केवल भोग के रूप में माता और देवताओं को दूध और खीरा (ककड़ी) अर्पित करते हैं, और यही दूध-खीरा बाद में परिवार के सदस्यों द्वारा अत्यंत श्रद्धापूर्वक प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।


धरती माता का विश्राम और कृषि निषेध--

माता कामाख्या के साथ-साथ इन दिनों पूरी पृथ्वी यानी धरती माता को भी रजस्वला माना जाता है, जिसके कारण उन्हें जीवनदायिनी और अन्नपूर्णा मानकर पूर्ण विश्राम दिया जाता है। यही कारण है कि अम्बुबाची के दौरान किसी भी प्रकार की खेती या कृषि कार्य पूरी तरह ठप रहता है और खेतों में हल चलाना, कुदाल मारना या मिट्टी खोदना वर्जित माना गया है। यहां तक कि घरों में लगे पौधों की मिट्टी को भी नहीं छुआ जाता और न ही नए पौधे रोपे जाते हैं, क्योंकि इस लोकाचार के पीछे प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और उसे पुनर्जीवित होने का अवसर देने की गहरी समझ छिपी है। तीन - चार दिनों के इस विश्राम के बाद जब धरती की 'निवृत्ति' होती है, तब उसे अधिक उपजाऊ माना जाता है और किसान नए उत्साह के साथ सावन की फसलों की बुआई शुरू करते हैं, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मिक संबंध को दर्शाता है। वही एक और विशेष ध्यान रखा जाता है कि इन दिनों लोग नंगे पैरों चलते हैं ताकि धरती को कोई कष्ट ना हो। पहले के दिनों में लोग खड़ाऊ भी नहीं पहना करते थे क्योंकि इससे धरती माता को कष्ट होगा। इस प्रकार धरती माता का पूरा ध्यान रखा जाता था।


महिलाओं के विशेष नियम: विधवा और सधवा लोकाचार--

पुराने समय से ही बंगाली हिंदू समाज में महिलाओं के लिए अम्बुबाची के दौरान बेहद कड़े और विशिष्ट नियम निर्धारित रहे हैं। विशेष रूप से बंगाली हिंदू विधवा महिलाएं इन तीन दिनों में कठोर तपस्वी जैसा जीवन जीती थीं। वे कुएं, तालाब या नदी का साधारण पानी पीना छोड़कर केवल प्राकृतिक नारियल पानी का सेवन करती थीं और भोजन में पका हुआ अन्न, नमक या मसालों का त्याग कर केवल कंद-मूल, फल और भीगे चने खाती थीं। वे नंगे पैरों चलती और नौका में जाकर रहा करती थी।दूसरी ओर, सधवा (सुहागिन) महिलाओं के लिए भी इस दौरान कई विशेष लोक-नियम थे, जिसके तहत वे इन तीन दिनों में अपने बाल धोना और नाखून काटना पूरी तरह वर्जित मानती थीं और किसी भी प्रकार के मांगलिक या शृंगार के कार्यों की शुरुआत इन दिनों में नहीं की जाती थी।


खान-पान के नियम और सांस्कृतिक प्रासंगिकता--

इन तीन दिनों के दौरान सधवा महिलाएं निरामिष भोजन नहीं करती थी। चौथे दिन जब 'निवृत्ति' होती है, तब घर के कोने-कोने, बिस्तरों, कपड़ों और बर्तनों की धुलाई कर गंगाजल छिड़क कर शुद्धिकरण किया जाता है, जिसके बाद ही मंदिर के पट खुलते हैं, मंदिर की सफ़ाई होती, माता के घट की सफ़ाई होती, फिर तस्वीर या मूर्ति आदि की स्नान कराकर नए वस्त्र पहना कर और सभी अन्य देवी देवताओं को  सुंगधित फूलों से सजाकर भव्य पूजा होती। कई अन्य घरों में महिलाओं को उपवास करने का भी नियम रहा करता था इसलिए निवृत्ति के बाद महिलाएं अपना उपवास भी खोलती थी। संक्षेप में कहें तो, अम्बुबाची केवल एक अंधविश्वास या रूढ़ि नहीं, बल्कि प्रकृति, स्त्रीत्व और जीवन के सम्मान का एक ऐसा उत्सव है जो आधुनिक दौर में भी हमें पर्यावरण संरक्षण और अपनी जड़ों की याद दिलाता है।


डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती

रटंती काली का आह्वान

बराक घाटी के श्रीगौरी ग्राम में माघ की ठिठुरती रात थी। कुशियारा नदी से उठते कोहरे ने विश्वंभर के पुश्तैनी घर को चारों ओर से घेर रखा था। आँगन...