मुस्कान और सोनाली का बचपन बिल्कुल साथ-साथ बीता था। दोनों एक ही गली में रहती थीं और दोनों के घर के बीच महज़ तीन मकानों का फासला था। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि गली का हर कोई जानता था—जहाँ सोनाली होगी, वहाँ मुस्कान ज़रूर मिलेगी। सोनाली के माता-पिता भी इस बात को अच्छे से जानते थे, इसलिए उन्होंने शुरुआत में मुस्कान पर अपनी बेटी की तरह ही पूरा भरोसा किया था। दोनों सहेलियों ने बचपन में एक मासूम सा सपना भी देखा था कि जब वे बड़ी होंगी, तो शादी भी एक ही दिन और एक ही मंडप में करेंगी।
समय गुज़रता गया और दोनों जवान हुईं। सोनाली आधुनिक ख्यालों की लड़की ज़रूर थी, थोड़ी नादान और बेवकूफ़ भी थी, लेकिन वह अपने परिवार की मर्यादा को अच्छी तरह समझती थी। वहीं दूसरी तरफ, मुस्कान के मन में कुछ और ही चल रहा था, जिसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। उसका रहन-सहन और चाल-चलन सोनाली से बिलकुल अलग था। उसे अपने सिवा कोई और दिखाई न देता था। पर कहते हैं न कि दो अलग किस्म के लोग ही एक-दूसरे के पक्के दोस्त बनते हैं; शायद इसीलिए सोनाली और मुस्कान की दोस्ती इतनी अटूट थी।
एक दिन सोनाली के पिता गली से गुज़र रहे थे, तभी उन्होंने नुक्कड़ पर पंक्चर बनाने वाले ज़ाकिर के साथ मुस्कान को बेहद करीब और घुलमुल होते देख लिया। मुस्कान की इस हरकत को देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर आकर उन्होंने बहुत भारी मन से यह बात सोनाली की माँ को बताई। अपनी पत्नी से बात करते हुए उनके दिल में एक गहरा पछतावा जाग रहा था। वह खुद को कोस रहे थे कि आखिर उन्होंने क्यों सोनाली को मुस्कान के इतना करीब आने दिया, जबकि उसी गली में दो-तीन और भी अच्छी लड़कियाँ थीं, जिनके साथ सोनाली की दोस्ती कराई जा सकती थी।
उन्होंने सोनाली को बुलाकर बहुत समझाया और मुस्कान से दूरी बनाने को कहा। सोनाली थोड़ी नादान थी; उसने माता-पिता की बात मानकर मुस्कान से थोड़ी दूरी तो बना ली, लेकिन बचपन की वफ़ादारी के कारण वह अपनी सहेली को दिल से पूरी तरह दूर नहीं कर पाई। इसलिए, कभी-कभी जब वह घर से बाहर किसी काम से जाती और रास्ते में मुस्कान मिल जाती, तो दोनों के बीच अभी भी उतनी ही आत्मीयता से बातचीत होती थी। सोनाली को लगता था कि मुस्कान प्रगतिशील विचारों वाली लड़की है, इसीलिए वह ज़ाकिर से प्यार करती है; जबकि उसे अपने पिता पुराने ख्यालों के नज़र आते थे। यही वजह थी कि वह मुस्कान से मिलने या बातचीत करने की बात घर में किसी से नहीं कहती थी। पर गली के लोगों को सब पता था, हालाँकि शुरुआत में उन्हें इस मामले की गहराई का अंदाज़ा नहीं था और न ही कोई लेना-देना था।
इसी बीच दोनों के परिवारों ने अपनी-अपनी बिरादरी में लड़के ढूंढे। सोनाली के लिए देवेंद्र का और मुस्कान के लिए अरुण का रिश्ता पक्का हो गया। किस्मत से दोनों की शादियाँ एक ही दिन तय हुईं, जिससे लगा कि उनका बचपन का सपना पूरा होने जा रहा है। सोनाली अपने नए जीवन को लेकर बेहद खुश थी और माता-पिता के फैसले का सम्मान कर रही थी। लेकिन मुस्कान के दिमाग में तो एक खौफनाक साज़िश चल रही थी। वह अरुण से शादी नहीं करना चाहती थी, क्योंकि वह उस पंक्चर वाले के प्यार में अंधी हो चुकी थी। अपनी राह के इस कांटे को हटाने के लिए उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अरुण की हत्या की एक बेहद क्रूर योजना बना डाली।
शादी से ठीक दो दिन पहले, मुस्कान ने कुछ समय साथ बिताने के बहाने रात के वक्त अरुण को शहर के बाहर एक सुनसान सड़क के किनारे बने ढाबे पर बुलाया। अरुण को लगा कि शादी से पहले के ये लम्हें खास होते हैं, सो वह मुस्कान के बुलावे पर चला गया। वहाँ उसका प्रेमी ज़ाकिर पहले से ही हथियार लेकर ढाबे के पास झाड़ियों में छिपा हुआ था। कुछ देर मुस्कान और अरुण ने साथ वक्त बिताया और चाय-पराठे खाए। फिर मुस्कान ने कुछ देर टहलने की बात कही और चुपके से ज़ाकिर को इशारा कर दिया।
ज़ाकिर ने रास्ते पर चल रहे अरुण पर अचानक हमला कर दिया। अरुण अपनी जान बचाने के लिए चीखता रहा, लेकिन ढाबे से दूर होने के कारण वहाँ मौजूद लोगों को उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। परंतु संयोग से, अरुण का पुराना दोस्त सनोज उसी रास्ते से अपनी दुकान बढ़ाकर लौट रहा था। दूर हो रही हाथापाई को तो वह देख पा रहा था, लेकिन अंधेरे के कारण यह नहीं देख सका कि वहाँ कौन है। तभी एक गाड़ी को नज़दीक आते देख मुस्कान और ज़ाकिर घबरा गए। ज़ाकिर तुरंत वहाँ से भाग निकला और मुस्कान वहीं पर नाटकीय अंदाज़ में चिल्लाने लगी कि पैसे और चैन की छीना-झपटी में एक गुंडे ने अरुण पर हमला कर दिया है। घायल अरुण को सनोज तुरंत अस्पताल लेकर भागा।
अगली सुबह जब पुलिस की तफ्तीश शुरू हुई, तो दो दिन बाद ज़ाकिर पकड़ा गया। पुलिस की कड़ाई से पूछताछ करने पर उसने मुस्कान का नाम उगल दिया। मुस्कान का यह घिनौना और क्रूर चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया। समाज उसकी इस दरिंदगी को देखकर थू-थू कर रहा था। लेकिन इस बात का सबसे बड़ा और घातक झटका सोनाली के परिवार को लगा।
देवेंद्र के माता-पिता ने जैसे ही यह खबर सुनी, उन्होंने तुरंत सोनाली से रिश्ता तोड़ दिया। उनका कहना था कि जो लड़की दिन-रात मुस्कान जैसी चरित्रहीन के साथ उठती-बैठती थी, वह इतनी पाक-साफ़ कैसे हो सकती है? संगति का असर तो आता ही है। सोनाली के माता-पिता ने लाख समझाया कि सोनाली की मुस्कान से दोस्ती तो कब की खत्म हो चुकी थी, पर देवेंद्र का परिवार नहीं माना। उनका कहना था कि सोनाली उनकी आँखों में धूल झोंक रही थी और वह अब भी छिप-छिपकर मुस्कान से मिलती थी। सोनाली के पिता ने रोते हुए देवेंद्र के परिवार के सामने अपनी पगड़ी तक रख दी, खुद सोनाली ने अपनी बेगुनाही की कसमें खाईं कि वह इस साज़िश के बारे में कुछ नहीं जानती थी, लेकिन समाज के तानों के डर से देवेंद्र के परिवार ने उनकी एक न सुनी और शादी टूट गई।
अब कई महीने बीत चुके हैं। अरुण कुछ दिनों तक ज़िंदगी और मौत के बीच जूझता रहा और आखिरकार अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मुस्कान और ज़ाकिर जेल में अपने कर्मों की सज़ा काट रहे हैं, लेकिन बिना किसी कसूर के सोनाली की ज़िंदगी भी पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। गली के लोग आज भी जब सोनाली को देखते हैं, तो उनकी आँखों में वही शक और बदनामी के भाव होते हैं।
सोनाली रोज़ अपने घर की खिड़की पर बैठती है और उसके दिल में एक भयानक कसक उठती है। वह सोचती है कि गलती मुस्कान की थी, क्रूरता उसने दिखाई, फिर उसकी सज़ा का यह बोझ समाज आज भी सोनाली के कंधों पर क्यों लाद रहा है? क्या सिर्फ एक गलत सहेली को चुनने की कीमत एक सीधी-सादी लड़की को अपनी पूरी ज़िंदगी की बर्बादी से चुकानी पड़ती है? यही सवाल और एक अजीब सी छटपटाहट आज भी उसके ज़हन में ज़िंदा है।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती



