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Saturday, June 27, 2026

संगति की कीमत


मुस्कान और सोनाली का बचपन बिल्कुल साथ-साथ बीता था। दोनों एक ही गली में रहती थीं और दोनों के घर के बीच महज़ तीन मकानों का फासला था। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि गली का हर कोई जानता था—जहाँ सोनाली होगी, वहाँ मुस्कान ज़रूर मिलेगी। सोनाली के माता-पिता भी इस बात को अच्छे से जानते थे, इसलिए उन्होंने शुरुआत में मुस्कान पर अपनी बेटी की तरह ही पूरा भरोसा किया था। दोनों सहेलियों ने बचपन में एक मासूम सा सपना भी देखा था कि जब वे बड़ी होंगी, तो शादी भी एक ही दिन और एक ही मंडप में करेंगी।

समय गुज़रता गया और दोनों जवान हुईं। सोनाली आधुनिक ख्यालों की लड़की ज़रूर थी, थोड़ी नादान और बेवकूफ़ भी थी, लेकिन वह अपने परिवार की मर्यादा को अच्छी तरह समझती थी। वहीं दूसरी तरफ, मुस्कान के मन में कुछ और ही चल रहा था, जिसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। उसका रहन-सहन और चाल-चलन सोनाली से बिलकुल अलग था। उसे अपने सिवा कोई और दिखाई न देता था। पर कहते हैं न कि दो अलग किस्म के लोग ही एक-दूसरे के पक्के दोस्त बनते हैं; शायद इसीलिए सोनाली और मुस्कान की दोस्ती इतनी अटूट थी।

एक दिन सोनाली के पिता गली से गुज़र रहे थे, तभी उन्होंने नुक्कड़ पर पंक्चर बनाने वाले ज़ाकिर के साथ मुस्कान को बेहद करीब और घुलमुल होते देख लिया। मुस्कान की इस हरकत को देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर आकर उन्होंने बहुत भारी मन से यह बात सोनाली की माँ को बताई। अपनी पत्नी से बात करते हुए उनके दिल में एक गहरा पछतावा जाग रहा था। वह खुद को कोस रहे थे कि आखिर उन्होंने क्यों सोनाली को मुस्कान के इतना करीब आने दिया, जबकि उसी गली में दो-तीन और भी अच्छी लड़कियाँ थीं, जिनके साथ सोनाली की दोस्ती कराई जा सकती थी।

उन्होंने सोनाली को बुलाकर बहुत समझाया और मुस्कान से दूरी बनाने को कहा। सोनाली थोड़ी नादान थी; उसने माता-पिता की बात मानकर मुस्कान से थोड़ी दूरी तो बना ली, लेकिन बचपन की वफ़ादारी के कारण वह अपनी सहेली को दिल से पूरी तरह दूर नहीं कर पाई। इसलिए, कभी-कभी जब वह घर से बाहर किसी काम से जाती और रास्ते में मुस्कान मिल जाती, तो दोनों के बीच अभी भी उतनी ही आत्मीयता से बातचीत होती थी। सोनाली को लगता था कि मुस्कान प्रगतिशील विचारों वाली लड़की है, इसीलिए वह ज़ाकिर से प्यार करती है; जबकि उसे अपने पिता पुराने ख्यालों के नज़र आते थे। यही वजह थी कि वह मुस्कान से मिलने या बातचीत करने की बात घर में किसी से नहीं कहती थी। पर गली के लोगों को सब पता था, हालाँकि शुरुआत में उन्हें इस मामले की गहराई का अंदाज़ा नहीं था और न ही कोई लेना-देना था।

इसी बीच दोनों के परिवारों ने अपनी-अपनी बिरादरी में लड़के ढूंढे। सोनाली के लिए देवेंद्र का और मुस्कान के लिए अरुण का रिश्ता पक्का हो गया। किस्मत से दोनों की शादियाँ एक ही दिन तय हुईं, जिससे लगा कि उनका बचपन का सपना पूरा होने जा रहा है। सोनाली अपने नए जीवन को लेकर बेहद खुश थी और माता-पिता के फैसले का सम्मान कर रही थी। लेकिन मुस्कान के दिमाग में तो एक खौफनाक साज़िश चल रही थी। वह अरुण से शादी नहीं करना चाहती थी, क्योंकि वह उस पंक्चर वाले के प्यार में अंधी हो चुकी थी। अपनी राह के इस कांटे को हटाने के लिए उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अरुण की हत्या की एक बेहद क्रूर योजना बना डाली।

शादी से ठीक दो दिन पहले, मुस्कान ने कुछ समय साथ बिताने के बहाने रात के वक्त अरुण को शहर के बाहर एक सुनसान सड़क के किनारे बने ढाबे पर बुलाया। अरुण को लगा कि शादी से पहले के ये लम्हें खास होते हैं, सो वह मुस्कान के बुलावे पर चला गया। वहाँ उसका प्रेमी ज़ाकिर पहले से ही हथियार लेकर ढाबे के पास झाड़ियों में छिपा हुआ था। कुछ देर मुस्कान और अरुण ने साथ वक्त बिताया और चाय-पराठे खाए। फिर मुस्कान ने कुछ देर टहलने की बात कही और चुपके से ज़ाकिर को इशारा कर दिया।

ज़ाकिर ने रास्ते पर चल रहे अरुण पर अचानक हमला कर दिया। अरुण अपनी जान बचाने के लिए चीखता रहा, लेकिन ढाबे से दूर होने के कारण वहाँ मौजूद लोगों को उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। परंतु संयोग से, अरुण का पुराना दोस्त सनोज उसी रास्ते से अपनी दुकान बढ़ाकर लौट रहा था। दूर हो रही हाथापाई को तो वह देख पा रहा था, लेकिन अंधेरे के कारण यह नहीं देख सका कि वहाँ कौन है। तभी एक गाड़ी को नज़दीक आते देख मुस्कान और ज़ाकिर घबरा गए। ज़ाकिर तुरंत वहाँ से भाग निकला और मुस्कान वहीं पर नाटकीय अंदाज़ में चिल्लाने लगी कि पैसे और चैन की छीना-झपटी में एक गुंडे ने अरुण पर हमला कर दिया है। घायल अरुण को सनोज तुरंत अस्पताल लेकर भागा।

अगली सुबह जब पुलिस की तफ्तीश शुरू हुई, तो दो दिन बाद ज़ाकिर पकड़ा गया। पुलिस की कड़ाई से पूछताछ करने पर उसने मुस्कान का नाम उगल दिया। मुस्कान का यह घिनौना और क्रूर चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया। समाज उसकी इस दरिंदगी को देखकर थू-थू कर रहा था। लेकिन इस बात का सबसे बड़ा और घातक झटका सोनाली के परिवार को लगा।

देवेंद्र के माता-पिता ने जैसे ही यह खबर सुनी, उन्होंने तुरंत सोनाली से रिश्ता तोड़ दिया। उनका कहना था कि जो लड़की दिन-रात मुस्कान जैसी चरित्रहीन के साथ उठती-बैठती थी, वह इतनी पाक-साफ़ कैसे हो सकती है? संगति का असर तो आता ही है। सोनाली के माता-पिता ने लाख समझाया कि सोनाली की मुस्कान से दोस्ती तो कब की खत्म हो चुकी थी, पर देवेंद्र का परिवार नहीं माना। उनका कहना था कि सोनाली उनकी आँखों में धूल झोंक रही थी और वह अब भी छिप-छिपकर मुस्कान से मिलती थी। सोनाली के पिता ने रोते हुए देवेंद्र के परिवार के सामने अपनी पगड़ी तक रख दी, खुद सोनाली ने अपनी बेगुनाही की कसमें खाईं कि वह इस साज़िश के बारे में कुछ नहीं जानती थी, लेकिन समाज के तानों के डर से देवेंद्र के परिवार ने उनकी एक न सुनी और शादी टूट गई।

अब कई महीने बीत चुके हैं। अरुण कुछ दिनों तक ज़िंदगी और मौत के बीच जूझता रहा और आखिरकार अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मुस्कान और ज़ाकिर जेल में अपने कर्मों की सज़ा काट रहे हैं, लेकिन बिना किसी कसूर के सोनाली की ज़िंदगी भी पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। गली के लोग आज भी जब सोनाली को देखते हैं, तो उनकी आँखों में वही शक और बदनामी के भाव होते हैं।

सोनाली रोज़ अपने घर की खिड़की पर बैठती है और उसके दिल में एक भयानक कसक उठती है। वह सोचती है कि गलती मुस्कान की थी, क्रूरता उसने दिखाई, फिर उसकी सज़ा का यह बोझ समाज आज भी सोनाली के कंधों पर क्यों लाद रहा है? क्या सिर्फ एक गलत सहेली को चुनने की कीमत एक सीधी-सादी लड़की को अपनी पूरी ज़िंदगी की बर्बादी से चुकानी पड़ती है? यही सवाल और एक अजीब सी छटपटाहट आज भी उसके ज़हन में ज़िंदा है।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

Monday, June 22, 2026

अम्बुबाची मेला: आस्था, लोक-लोकाचार और प्रकृति का महापर्व

 


पौराणिक पृष्ठभूमि और शक्तिपीठ की उत्पत्ति--

अम्बुबाची पर्व का सीधा संबंध सती के पावन चरित्र, उनके आत्मदाह और शक्तिपीठों की स्थापना से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित भव्य यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का घोर अपमान देखकर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए थे। वियोग और क्रोध में व्याकुल भगवान शिव दक्ष यज्ञ का विनाश कर जब सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहां-जहां गिरे, वहां-वहां पावन शक्तिपीठ स्थापित हुए। इसी क्रम में असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर माता सती का 'योनि भाग' गिरा, जो आज जगत प्रसिद्ध और तंत्र साधना का मुख्य केंद्र 'मां कामाख्या मंदिर' कहलाता है।


अम्बुबाची का अर्थ और मां कामाख्या का रजस्वला होना

'अम्बुबाची' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'पानी का प्रस्फुटन' या 'जल का बोलना' माना जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में वर्षा ऋतु के आगमन के साथ मनाया जाता है। इस समय माता कामाख्या को साक्षात प्रकृति के रूप में रजस्वला माना जाता है; ऐसी मान्यता है कि इन तीन से चार दिन वे मासिक धर्म के चक्र से गुजरती हैं। कामाख्या शक्तिपीठ को स्त्री शक्ति, जनन क्षमता और मातृत्व के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में नारी के प्राकृतिक स्वरूप को कितना पूजनीय माना गया है। इन तीन से चार दिनों में मंदिर के गर्भगृह से बहने वाली प्राकृतिक जलधारा पूरी तरह लाल हो जाती है, जिसे बाद में अत्यंत पवित्र 'अम्बुबाची वस्त्र' (रक्त वस्त्र) भक्तों में प्रसाद रूप में बांटा जाता है। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों की संख्या में अघोरी, तांत्रिक, साधु और भक्त नीलांचल पर्वत पर जुटते हैं, जिससे यह पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक समागम बन जाता है।


बंगाली पंचांग और शास्त्रीय तिथि का महत्व--

बंगाली संस्कृति और समाज में अम्बुबाची पर्व का एक अत्यंत विशेष, अनिवार्य और व्यावहारिक स्थान है। बंगाली पंचांग (पांजी) में अम्बुबाची की शुरुआत और अंत का समय बेहद सूक्ष्मता से दिया होता है, जिसमें 'अम्बुबाची प्रवृत्ति' (शुरुआत) और तीन या चार दिनों के बाद 'अम्बुबाची निवृत्ति' (समाप्ति) की सटीक तिथि और समय का स्पष्ट उल्लेख रहता है। बंगाली पंचांग में प्रत्येक आषाढ़ महीने के सात तारीख को ही अंबुबाची शुरू होती है। बंगाली परिवारों में पंचांग की इन तिथियों का बड़ी कड़ाई और श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है, जहाँ प्रवृत्ति के शुरू होते ही घरों के नियम बदल जाते हैं और निवृत्ति के बाद ही गृहशुद्धि और भगवान के मंदिर की शुद्धि कर सामान्य जीवन शुरू होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस काल में पृथ्वी पर सूर्य की किरणें और वर्षा मिलकर एक नया जीवन चक्र शुरू करती हैं, जिससे इसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा के शुद्धिकरण का समय भी माना जाता है।


घरेलू लोकाचार और मंदिर के कपाट बंद रखने की परंपरा--

अम्बुबाची के इन तीन-चार दिनों में केवल कामाख्या मंदिर ही नहीं, बल्कि आम हिंदू घरों के मंदिरों के कपाट भी पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और भगवान के आसन को लाल कपड़े से ढक दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माता के रजस्वला होने के समय पूरी प्रकृति विश्राम की अवस्था में होती है, इसलिए इन दिनों में मूर्तियों या तस्वीरों को छूना, उन्हें स्नान कराना या तिलक लगाना पूरी तरह वर्जित होता है। विशेषतः जिन तस्वीरों में देवी के साथ कोई देवता रहते हैं उनकी भी पूजा नहीं होती। केवल नारायण पूजा और शालिग्राम की पूजा ब्राह्मण करते हैं।घर की महिलाएं इन तीन - चार दिनों में किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रिया या पूजा  नहीं करती हैं। इस दौरान केवल कुल पुरोहित या ब्राह्मण ही बिना मूर्तियों को छुए अत्यंत सात्विक विधि से पूजा करते हैं। इस काल में बिना आग पर पकाए गए भोजन का नियम होने के कारण ब्राह्मण केवल भोग के रूप में माता और देवताओं को दूध और खीरा (ककड़ी) अर्पित करते हैं, और यही दूध-खीरा बाद में परिवार के सदस्यों द्वारा अत्यंत श्रद्धापूर्वक प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।


धरती माता का विश्राम और कृषि निषेध--

माता कामाख्या के साथ-साथ इन दिनों पूरी पृथ्वी यानी धरती माता को भी रजस्वला माना जाता है, जिसके कारण उन्हें जीवनदायिनी और अन्नपूर्णा मानकर पूर्ण विश्राम दिया जाता है। यही कारण है कि अम्बुबाची के दौरान किसी भी प्रकार की खेती या कृषि कार्य पूरी तरह ठप रहता है और खेतों में हल चलाना, कुदाल मारना या मिट्टी खोदना वर्जित माना गया है। यहां तक कि घरों में लगे पौधों की मिट्टी को भी नहीं छुआ जाता और न ही नए पौधे रोपे जाते हैं, क्योंकि इस लोकाचार के पीछे प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और उसे पुनर्जीवित होने का अवसर देने की गहरी समझ छिपी है। तीन - चार दिनों के इस विश्राम के बाद जब धरती की 'निवृत्ति' होती है, तब उसे अधिक उपजाऊ माना जाता है और किसान नए उत्साह के साथ सावन की फसलों की बुआई शुरू करते हैं, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मिक संबंध को दर्शाता है। वही एक और विशेष ध्यान रखा जाता है कि इन दिनों लोग नंगे पैरों चलते हैं ताकि धरती को कोई कष्ट ना हो। पहले के दिनों में लोग खड़ाऊ भी नहीं पहना करते थे क्योंकि इससे धरती माता को कष्ट होगा। इस प्रकार धरती माता का पूरा ध्यान रखा जाता था।


महिलाओं के विशेष नियम: विधवा और सधवा लोकाचार--

पुराने समय से ही बंगाली हिंदू समाज में महिलाओं के लिए अम्बुबाची के दौरान बेहद कड़े और विशिष्ट नियम निर्धारित रहे हैं। विशेष रूप से बंगाली हिंदू विधवा महिलाएं इन तीन दिनों में कठोर तपस्वी जैसा जीवन जीती थीं। वे कुएं, तालाब या नदी का साधारण पानी पीना छोड़कर केवल प्राकृतिक नारियल पानी का सेवन करती थीं और भोजन में पका हुआ अन्न, नमक या मसालों का त्याग कर केवल कंद-मूल, फल और भीगे चने खाती थीं। वे नंगे पैरों चलती और नौका में जाकर रहा करती थी।दूसरी ओर, सधवा (सुहागिन) महिलाओं के लिए भी इस दौरान कई विशेष लोक-नियम थे, जिसके तहत वे इन तीन दिनों में अपने बाल धोना और नाखून काटना पूरी तरह वर्जित मानती थीं और किसी भी प्रकार के मांगलिक या शृंगार के कार्यों की शुरुआत इन दिनों में नहीं की जाती थी।


खान-पान के नियम और सांस्कृतिक प्रासंगिकता--

इन तीन दिनों के दौरान सधवा महिलाएं निरामिष भोजन नहीं करती थी। चौथे दिन जब 'निवृत्ति' होती है, तब घर के कोने-कोने, बिस्तरों, कपड़ों और बर्तनों की धुलाई कर गंगाजल छिड़क कर शुद्धिकरण किया जाता है, जिसके बाद ही मंदिर के पट खुलते हैं, मंदिर की सफ़ाई होती, माता के घट की सफ़ाई होती, फिर तस्वीर या मूर्ति आदि की स्नान कराकर नए वस्त्र पहना कर और सभी अन्य देवी देवताओं को  सुंगधित फूलों से सजाकर भव्य पूजा होती। कई अन्य घरों में महिलाओं को उपवास करने का भी नियम रहा करता था इसलिए निवृत्ति के बाद महिलाएं अपना उपवास भी खोलती थी। संक्षेप में कहें तो, अम्बुबाची केवल एक अंधविश्वास या रूढ़ि नहीं, बल्कि प्रकृति, स्त्रीत्व और जीवन के सम्मान का एक ऐसा उत्सव है जो आधुनिक दौर में भी हमें पर्यावरण संरक्षण और अपनी जड़ों की याद दिलाता है।


डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती

Thursday, June 18, 2026

मेरे प्यारे पापा

 



उंगली पकड़कर मुझे चलना सिखाया,
हर मुश्किल से हमेशा मुझे बचाया।
खुद धूप में रहकर भी जो,
हम पर ठंडी छांव करते हैं,
वो और कोई नहीं, मेरे पापा हैं,
जो हमसे बेइंतहा प्यार करते हैं।
मांगने से पहले ही जो सब कुछ दिला देते हैं,
मेरी एक छोटी सी मुस्कान पर,
वो अपनी सारी थकान भूल जाते हैं।
चट्टान की तरह मजबूत हैं वो,
पर दिल से उतने ही कोमल हैं,
मेरे पापा मेरी दुनिया, मेरा सबसे बड़ा संबल हैं।
सत्यवीर वैष्णव बारां राजस्थान 💞✒️💞


सत्यवीर वैष्णव

Monday, June 15, 2026

एक लड़ाई आत्मसम्मान की


नवंबर की वह ढलती हुई शाम थी। खिड़की के पल्लों से टकराकर आती ठंडी हवा मीरा के चेहरे को छूकर गुजर गई, पर उसके भीतर की तपन को कम न कर सकी। दीवार पर टंगे कैलेंडर की तारीख जैसे चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी कि उनकी शादी को चौदह साल हो चुके हैं। चौदह साल का यह लंबा अरसा मीरा के लिए हर रोज एक नए कुरुक्षेत्र में निहत्थे उतरने जैसा था। रसोई में चाय का उबलता हुआ पानी उसकी अपनी जिंदगी जैसा ही था—जो धीमी आंच पर लगातार सुलग रहा था और बाहर आने का रास्ता ढूंढ रहा था।

तभी हॉल से बाबन की भारी और तीखी आवाज गूंजी, "मीरा! मेरी वो नीली वाली फाइल कहाँ है?"

मीरा ने अभी जवाब देने के लिए मुंह खोला ही था कि हमेशा की तरह बाबन का ताना हवा में तैर गया, "एक पागल औरत को कोई काम सौंपने का यही नतीजा होता है। खुद भुगतो अब!"

मीरा चाय की केतली बंद कर झटपट हॉल में आई और शांत स्वर में बोली, "रुको बाबन, मैं लाकर देती हूँ। तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हें यह वाली फाइल भी चाहिए? मैं पहले ही निकाल कर रख देती।"

बाबन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने सोफे पर पड़े कुशन को झटके से हटाते हुए कहा, "तुम रखकर खुद भूल गई होगी! तुम्हारा दिमाग ठिकाने रहता है कभी? मेंटल कहीं की!"

यह शब्द अब मीरा के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह नहीं चुभता था। बाबन ने सालों से इस शब्द को इतनी बार, इतने अलग-अलग तरीकों से दोहराया था कि मीरा के आत्मसम्मान की मजबूत दीवारें अब चटक चुकी थीं। वह स्वभाव से थोड़ी भुलक्कड़ जरूर थी, पर इसका मतलब यह कतई नहीं था कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ थी। वह तो वह मीरा थी जिसने अपनी कड़ी मेहनत से यूनिवर्सिटी में पीएचडी की उपाधि हासिल की थी। शादी के समय उसने खुद बाबन को ईमानदारी से बताया था, "देखो बाबन, मैं गुस्से में कभी-कभी थोड़ा उल्टा-पुल्टा बोल देती हूँ, लेकिन मैं दिमागी रूप से बिल्कुल ठीक हूँ।" तब बाबन ने हंसकर इन बातों को बहुत सामान्य माना था, पर शादी के बाद पासा पलट गया।

बाबन खुद एक बड़ी कंपनी में कॉर्पोरेट मैनेजर था। वह लोगों के दिमाग से खेलना अच्छे से जानता था। हकीकत तो यह थी कि बाबन अंदर से बेहद डरपोक और असुरक्षित इंसान था। वह मीरा की कुशाग्र बुद्धि, उसकी डिग्रियों और उसकी काबिलियत से मन ही मन बुरी तरह जलता था। उसे डर था कि अगर मीरा अपनी पहचान बना लेगी, तो उसका खुद का वजूद छोटा पड़ जाएगा। इसलिए उसने कॉर्पोरेट की 'माइंड गेम्स' और 'गैसलाइटिंग' की तकनीकें घर पर इस्तेमाल करनी शुरू कर दीं। वह मीरा के काम में इस तरह कमियां निकालता कि धीरे-धीरे मीरा को खुद की बुद्धिमत्ता पर ही शक होने लगा। उसने मीरा को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि वह कमजोर है और बाबन के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

मीरा इस समय एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ा रही थी। वहां का वेतन बहुत कम था और काम का दबाव इतना ज्यादा कि उसकी असली प्रतिभा फाइलों और अतिरिक्त कामों के नीचे दबकर दम तोड़ रही थी। बाबन अक्सर इस बात का मजाक उड़ाता, "इस कबाड़ कॉलेज में बारह घंटे खटने के बाद भी लाती क्या हो? चंद हजार रुपये? इससे बेहतर है कि घर बैठो। तुम्हारी मानसिक स्थिति वैसे भी ऐसी नहीं है कि तुम कोई बड़ा काम संभाल सको।"

घर के इस माहौल में उसकी पीएचडी की डिग्री बाबन के तानों के आगे रद्दी के टुकड़े जैसी बन कर रह गई थी। बाबन हर छोटी-बड़ी बात पर बहस करता और उसे इतना उकसा देता कि मीरा का धैर्य जवाब दे जाता। और जैसे ही मीरा अपने बचाव में चिल्लाती, बाबन एक कुटिल मुस्कान के साथ कहता, "देखो, तुम्हारी बीमारी फिर से बाहर आ गई। मेरी शादी एक मेंटल से करवा दी गई है। मैं तेरे उन बूढ़े मां-बाप के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज कराऊंगा। अदालत में साबित कर दूँगा कि उन्होंने सच छुपाया। उनसे भारी हर्जाना वसूलूँगा।"

यह सुनते ही मीरा अंदर तक कांप जाती। उसके माता-पिता आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और वयोवृद्ध हो चुके थे। वे यह सदमा और कानूनी पचड़ा कभी नहीं झेल पाते। इसी डर का फायदा उठाकर बाबन उसे मानसिक और कभी-कभी शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता रहा। मीरा का मन करता कि वह अपना सिर पीट ले, या चुपचाप कहीं अकेली चली जाए।

मीरा के जीवन का सबसे बड़ा दर्द सिर्फ यह प्रताड़ना नहीं थी, बल्कि उसके करियर को खत्म करने की एक सोची-समझी साजिश भी थी। जब भी मीरा ने हिम्मत जुटाकर सरकारी नौकरी के लिए कोशिश की और कठिन परीक्षाएं पास कीं, तब बाबन और उसके ससुर ने मिलकर एक भयानक चाल चली।

एक दिन जब मीरा का सरकारी कॉलेज में चयन हुआ, तो उसके ससुर घर आए और चाय की चुस्की लेते हुए ठंडे स्वर में बोले, "देखो बहू, अगर तुम्हें नौकरी का इतना ही शौक है तो शौक से जाओ। लेकिन हमारी खानदान की रीत है, अपनी पांच साल की नन्ही बेटी को यहीं छोड़ना होगा। तुम अपनी बेटी से दूर रहकर अकेले दूसरे शहर में ऐश करो, हमें कोई ऐतराज नहीं।"

बाबन ने भी सुर में सुर मिलाया, "हाँ मीरा, कोर्ट भी एक मेंटल मां को बच्ची की कस्टडी नहीं देगा। जाना है तो बेटी को भूल जाओ।"

वे दोनों अच्छे से जानते थे कि मीरा की जान उसकी पांच साल की नन्ही बेटी में बसती है। बेटी से दूर हो जाने के इसी खौफ के कारण मीरा कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकी। उसने रोते हुए, अपनी ममता के आगे अपने सारे सपनों और डिग्रियों को एक सूटकेस में बंद कर दिया और ताले की चाबी कहीं छुपा दी। सालों से इस घुटते हुए माहौल को सहते-सहते मीरा अब भीतर से रीती हो चुकी थी। लेकिन पानी अब सिर से ऊपर जा चुका था।

एक सुबह, आईने के सामने खड़े होकर मीरा ने अपने बिखरे बाल और सूजी हुई आंखें देखीं। अचानक उसके कानों में अपनी बेटी की खिलखिलाहट गूंजी। मीरा को अहसास हुआ कि अगर वह आज इस अन्याय के खिलाफ नहीं संभली, तो उसकी बेटी भी इसी घुटन को औरत की नियति मानकर सहना सीख जाएगी। वह एक पढ़ी-लिखी और समझदार महिला थी, उसने तय किया कि अब वह बाबन के खेल में मोहरा नहीं बनेगी।

उसने अपनी रणनीति बदली। अब जब बाबन चिल्लाता या उकसाता, तो मीरा पलटकर जवाब नहीं देती, बल्कि शांत रहती। बाबन को लगता कि वह जीत रहा है, लेकिन असल में मीरा शांत रहकर बाबन की हर धमकी, ताने और गाली-गलौज की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग अपने फोन में चुपचाप दर्ज कर रही थी।

उसने छुपकर अपने माता-पिता से फोन पर बात की। पिता ने कांपती मगर दृढ़ आवाज में कहा, "बेटी, तुम हमारे पास वापस आ जाओ। तुम बोझ नहीं, हमारा गौरव हो। हमारे पास सूखी रोटी होगी, तो आधी तुम्हारी होगी।" इस बात ने मीरा के भीतर सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया।

अगले इतवार, जब बाबन ने फिर किसी बात पर चिढ़कर कहा, "ज्यादा मत बोलो, वरना कोर्ट में घसीटूंगा तुम्हारे परिवार को। भारी मुआवजा देना पड़ेगा तुम्हारे बाप को।"

इस बार मीरा डरी नहीं। वह अंदर गई, अपना सूटकेस खोला। उसमें से अपनी पीएचडी की डिग्री निकाली और फोन की सारी रिकॉर्डिंग्स बाबन के सामने मेज पर रख दीं। मीरा की आंखों में एक अजीब सी चमक और शांति थी। उसने बेहद शांत मगर ठोस आवाज में कहा, "अदालत तुम नहीं बाबन, अब मैं जाऊंगी। यह सारे सबूत और तुम्हारी ये कॉर्पोरेट धमकियां कोर्ट में यह साबित करने के लिए काफी हैं कि असली मेंटल कौन है और डरपोक कौन। कानून और ममता के बीच कोई नहीं आ सकता, मेरी बेटी मेरे साथ जाएगी।"

बाबन के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी कॉर्पोरेट की सारी चालाकियां मीरा के इस नए रूप के आगे ढह गईं। वह कुछ बोलने के लिए हकलाया, "मीरा... तुम... मेरा वो मतलब..."

पर मीरा अब सुनने के लिए नहीं रुकी। उसने पूरी दृढ़ता से अपनी बेटी का छोटा सा हाथ थामा, पीठ पर अपना बैग टांगा और उस घर की चौखट को पार कर गई। हवा अब भी ठंडी थी, पर आज वह मीरा के चेहरे को सुखा नहीं रही थी, बल्कि उसके आजाद और सम्मानजनक जीवन का स्वागत कर रही थी।

होश का ज़हर

​होश में रहकर भी, वो ज़हर ही उगलते हैं, हर शब्द में ताने, अपमान ही पलते हैं। रात भर जागकर, मोबाइल की नीली रोशनी में, वो दुनिया अपनी, किसी...