शरद पूर्णिमा की निर्मल रात थी। स्वर्ग लोक में, शांत और सुगंधित हवा बह रही थी। भगवान नारायण (विष्णु) अपनी प्रिय पत्नी लोक्खीदेवी (लक्ष्मी) के साथ बैठे, सुखद बातचीत में लीन थे।
तभी, वीणा की मधुर ध्वनि के साथ देवर्षि नारद मुनि वहाँ पहुँचे। उन्होंने दोनों को प्रणाम किया और माँ लक्ष्मी की ओर देखकर एक सवाल किया: "हे माँ! आप तो तीनों लोकों की माता हैं, पर आपका स्वभाव इतना चंचल क्यों है? आप हमेशा एक जगह से दूसरी जगह विचरण करती रहती हैं।"
नारद ने दुःख भरे स्वर में कहा, "इसी चंचलता के कारण, धरती के लोग (मृत्युलोकवासी) हमेशा गरीबी और कष्टों से घिरे रहते हैं। उनका भाग्य अस्थिर रहता है। वे अन्न के अभाव में कमज़ोर और दुःखी रहते हैं।"
नारद की बात सुनकर माँ लक्ष्मी ने एक गहरी, शांत साँस ली। उन्होंने कहा, "हे ऋषि! मैं किसी से नाराज़ नहीं हूँ। मनुष्यों के दुःख का कारण उनके अपने कर्मों का दोष है। पर आप चिंता न करें, मैं अवश्य इसका उपाय करूँगी।"
फिर, माँ लक्ष्मी ने नारायण से पूछा कि वह कैसे पृथ्वीवासियों के दुःख दूर करें। भगवान हरि ने मुस्कुराते हुए उन्हें उपाय दिया, "मेरी प्यारी लोक्खी! तुम गुरुवार (बृहस्पतिवार) को होने वाले लक्ष्मी व्रत का प्रचार धरती पर करो। जो लोग श्रद्धा और भक्ति से इस व्रत को करेंगे और कथा सुनेंगे, तुम्हारे आशीर्वाद से उनका ऐश्वर्य बढ़ेगा और सारे दुःख-कष्ट दूर हो जाएँगे।"
नारायण के वचन सुनकर, माँ लक्ष्मी बहुत प्रसन्न हुईं और तुरंत धरती लोक की ओर चल पड़ीं। अवंती नगर में लक्ष्मी का आगमन हुआ।
माँ लक्ष्मी घूमते-घूमते अवंती नगर पहुँची। वहाँ उन्होंने एक बहुत अजीब दृश्य देखा।
कुछ समय पहले, वहाँ धनेश्वर राय नाम का एक महा-धनी व्यक्ति रहता था, जिसका घर धन-धान्य से भरा था और कुबेर के खज़ाने जैसा था। पर धनेश्वर की मृत्यु के बाद, उसके सात बेटों ने अपने धन का घमंड किया और आपस में बंटवारा कर लिया। अहंकार और द्वेष के कारण, माँ लक्ष्मी ने धीरे-धीरे उस परिवार को छोड़ दिया। देखते ही देखते, उनका सोने जैसा संसार उजड़ गया।
धनेश्वर की बूढ़ी पत्नी इस दुःख को सह न पाई और उसने आत्महत्या करने के लिए घने जंगल का रास्ता लिया।
जंगल में, माँ लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का वेश धारण किया और वृद्धा के सामने आईं। उन्होंने वृद्धा को आत्महत्या के महापाप से रोका और उसे गुरुवार का लोक्खी ब्रत करने को कहा। उन्होंने कहा कि हर गुरुवार को सुहागिनें इस व्रत का पालन करे। उन्होंने पूजा की विधि भी बताई। सबसे पहले उस दिन घर की सफाई कर चावल के। आटे से घर में रंगोली बनाए और पूजा के स्थान में रंगोली बनाकर उसमें कलश रखे। कलश पानी से भरा हो और उसमें पांच आम के पत्ते रखे। फिर धान रखे। एक थाली में चावल रखे। उसने सोना चांदी के गहने और थोड़े से पैसे रखें न हो तो केवल चावल और सिक्के भी चलेंगे। फल वाले नैवेद्य में पांच फल रखे तथा भोग में नारियल और चिवड़ा गुड के लड्डू रखे। अन्य मिष्ठान रखे। पूरी विधि के साथ माता लक्ष्मी का आह्वान करे। पूजा समाप्ति पर पांच सुहागिनें मिलकर उलू ध्वनि करें। सभी सुहागिनें एक दूसरे को तेल सिंदूर लगाए। माता लक्ष्मी के कलश में भी तेल सिंदूर लगाए। माता लक्ष्मी ने वादा किया कि यह व्रत करने से उसका दुर्भाग्य दूर हो जाएगा और उसका जीवन पहले जैसा हो जाएगा।
जब वृद्धा ने एक क्षण के लिए माँ लक्ष्मी का असली रूप देखा, तो वह आनंद से भर गई। वह तुरंत घर लौटी और अपनी बहुओं को पूरे विधि-विधान से व्रत करने को कहा। बहुओं ने जब एक मन से व्रत किया, तो उनके मन से ईर्ष्या, द्वेष और स्वार्थ दूर हो गए और घर में पुनः शांति और ऐश्वर्य का वास हो गया।
इस व्रत की महिमा इतनी फैली कि एक गरीब, दुःखी और रोगी पति की पत्नी ने भी यह व्रत किया। माँ की कृपा से उसका पति स्वस्थ हो गया और उनके घर में भी ख़ुशियाँ लौट आईं।
एक दिन, जब अवंती नगर में व्रत हो रहा था, एक घमंडी सौदागर (व्यापारी) का बेटा वहाँ आया। उसने व्रतियों को देखकर हँसते हुए कहा, "यह कैसा व्रत है? जो गरीब और अभावग्रस्त होते हैं, वे ही यह सब करते हैं। मेरे पास तो धन की कोई कमी नहीं है।" उसने घमंड में कहा कि भाग्य में न हो तो पूजा से कुछ नहीं मिलता।
सौदागर के अहंकार भरे शब्दों से माँ लक्ष्मी नाराज़ हो गईं और उन्होंने उसे त्याग दिया। कुछ ही समय में, उस सौदागर के सात जहाज़ समुद्र में डूब गए, और घर का सारा धन नष्ट हो गया। वह भीख माँगने पर मजबूर हो गया।
जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उसने रो-रोकर माँ लक्ष्मी का ध्यान किया और उनसे माफ़ी माँगी। सौदागर के पश्चात्ताप से माँ का हृदय पिघल गया। उसने अपने घर आकर फिर से व्रत किया और उसका उजड़ा संसार पहले जैसा हो गया।
इस प्रकार, माँ लक्ष्मी ने यह संदेश दिया कि उनकी कृपा पाने के लिए केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और विनम्रता भी आवश्यक है। उनका व्रत सबसे श्रेष्ठ है और जो इसे एक मन से करते हैं, उनका घर हमेशा धन, संतान और शांति से भरा रहता है।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
सरकारी प्रथम दर्जा कॉलेज के आर पूरा बंगलुरू 36

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