1
करीमगंज बाजार की उस तंग 'बाबन गली' में वक्त जैसे ठहर गया था। गली के मुहाने पर अपनी छोटी सी दुकान के फट्टे पर कृष्णकांत मणि, जिन्हें सब 'मणि दादू' कहते थे, पत्थर की मूरत बने बैठे रहते। उनकी आँखों में 1971 की उस भयानक रात का सन्नाटा आज भी पसरा था। वह अपनी बेटी के घर उसका जन्मदिन मनाने सरहद पार गए थे, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। दंगों की आग ने उनका सब कुछ छीन लिया, बस छोड़ गया तो एक साल का मासूम— अजय।
उस समय दुख की अधिकता में दादू ने अजय को देखकर भारी मन से कहा था— "ई अभागा रे लोइया आमी किता करमु? इगु ए तो आमार शोरबोनाश कोरी दिलो!" (इस अभागे को लेकर मैं क्या करूँगा? इसने तो मेरा सब कुछ खत्म कर दिया!)। पर उस अबोध बालक की मुस्कान ने दादू के भीतर की ममता को जगा दिया और उन्होंने उसे ही अपना संसार बना लिया।
2
बीस साल बीत गए। अजय अब एक जवान युवक था। एक शाम वह दुकान पर आया और बाहर की चकाचौंध को देख कर उसका मन भर आया। वह दादू से बोला:
अजय: "दादू, आपनी इखानो बईया आछइन? देखइन चाईन, बाहिरोर दुनिया किता अइसे! अउ जे नया सोसाइटी देखराय, ओगु किता चकमक करैर, आर आमारार ई गली अउ चिपात पड़िया आंधार अइया रइसे। आमारार कफ़ालों किता खाली अउ आंधार नि?"
(दादू, आप अभी भी यहीं बैठे हैं? देखिए तो सही, बाहर की दुनिया क्या हो गई है! वह जो नई सोसायटी देख रहे हैं, वह कैसी चमक रही है, और हमारी यह गली इस कोने में अंधेरे में पड़ी है। क्या हमारे भाग्य में बस यही अंधेरा है?)
मणि दादू ने धीरे से अजय के कंधे पर हाथ रखा और शांत स्वर में कहा:
दादू: "बाबा जी, सबर कर। अत उतला अइले अइत नाय। बाहिरोर अउ चकमकानी दिया किता करबे? इता दिया जिन्दगी चले ना। जेदिन आमारार ई गलीर मानुषोर मोन उज्ज्वल अइबो, देखबे ओदिन आमारार ई गली ओ दुनियार माझे सब ताकि बेसी चकमक करबो।"
(बाबाजी, सब्र कर। इतना उतावला होने से नहीं होगा। बाहर की इस चमक-धमक का क्या करेगा? इससे जिंदगी नहीं चलती। जिस दिन हमारी इस गली के लोगों का मन उज्ज्वल होगा, देखना उस दिन हमारी यह गली भी दुनिया में सबसे ज्यादा चमकेगी।)
3
काल बैसाखी का मौसम था। रिमझिम बारिश होने लगी थी। एक रात मौसम ने करवट ली। मूसलाधार वर्षा होने लगी और देखते–ही– देखते पूरे शहर की बिजली कट गई। नई सोसायटी की बड़ी-बड़ी इमारतें अंधेरे में डूब गईं। बाबन गली में घोर अंधेरा था, तभी मणि दादू ने अपनी पुरानी लालटेन जलाकर बाहर गली में रख दी।
नरेन काकू ने खिड़की से चिल्लाकर कहा, "ओ मणि दा इ तूफानों आफने लेनटोन जलाया किता कोररा?(अरे मणि दा, इस तूफान में लालटेन जलाकर क्या लाभ?)" दादू ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, " नरेन लेनटोन जलायले थुड़ा तो आन्दार कम आईबो। आओ शोबे मिली आगे बड़ाई।(नरेन, एक दीया जलेगा तो अंधेरा थोड़ा तो कम होगा! आओ, सब मिलकर इसे बढ़ाएं।")
तभी अचानक नई सोसायटी की ओर से एक हृदय विदारक चीख सुनाई दी। बारिश की वजह से बिजली का तार टूटकर गिर गया था और एक वृद्ध व्यक्ति उसकी चपेट में आ गए थे। चारों ओर हाहाकार मच गया, पर अंधेरे में कोई आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पा रहा था।
अजय की रगों में जोश दौड़ गया। वह चिल्लाया, "ओ दादू, देखइन! ओइ बयेश्क मानुष टा विपदौ पड़़ि गेसोइन! आमी जाइराम!"
मणि दादू का कलेजा मुँह को आ गया, उन्होंने पीछे से आवाज दी, "अजय रे, बाबाजी! शांमलीया जाइयो, आतो एकटा हुखना लाठी लोईया जा!" (अजय, संभलकर जाना, हाथ में एक सूखी लाठी लेकर जाओ!)
अजय और गली के अन्य लोग अपनी जान जोखिम में डालकर दौड़ पड़े। लालटेन की उस मद्धम रोशनी के पीछे-पीछे पूरी गली एक शक्ति बन गई। अजय ने सूखी लाठी की मदद से उन वृद्ध को सुरक्षित बचा लिया।
4
जब सब वापस लौटे, तो बाबन गली में एक अलग ही उत्सव था। लोग एक-दूसरे को मिठाई और चाय बाँट रहे थे। अगली सुबह जब सूरज की किरणें गली पर पड़ीं, तो वह सफाई और एकता के कारण नई सोसायटी से भी अधिक सुंदर लग रही थी।
मणि दादू ने अजय के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, बाबाजी आइज बुझचो नि मानुष ही आशोल उजाला। तुमि केवल एक्टा पोरान बाचाइसो ना तुमि इ गलिर आ जागाइसो ("बाबाजी, आज समझ गए न— इंसान ही असली उजाला होता है। तुमने आज केवल एक जान नहीं बचाई, बल्कि इस गली की सोई हुई आत्मा को जगा दिया है।")
अजय की वीरता और दादू की उस नन्हीं लालटेन ने बाबन गली का भाग्य सदा के लिए बदल दिया। अब वह केवल एक तंग गली नहीं, बल्कि अटूट एकता का प्रतीक बन चुकी थी।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
बंगलुरू

Bahut sundar Madhu ma'am 💐♥️
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