"ओ रे श्यामा! कहाँ है रे तू?" बेटी को पुकारते हुए मालती घर में प्रवेश करती है। बैठक में जाकर चारपाई पर बैठती है और सुपारी से भरी टोकरी रखती है। फिर एक सरौता लेकर सुपारी के छिलके उतारने लगती है।
माँ की पुकार सुनकर सात-आठ वर्ष की एक बालिका कमरे में प्रवेश करती है। उसके मुखमंडल को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो विधाता ने कांस्य की मूर्ति में प्राण फूंक दिए हों। देखने में सुंदर, मीन-सी आँखें—जिनमें समूचा समुद्र समा गया हो—पतली, लम्बी नाक, कोमल ग्रीवा, और कमर तक लहराते हुए लंबे बाल। परंतु इन सभी सौंदर्य-गुणों के बावजूद विधाता ने उसे वर्ण नहीं दिया था। इसी कारण मोहल्ले के बच्चे उसे 'काली' कहकर चिढ़ाया करते थे।
श्यामा की माँ को भी यह बात ज्ञात थी। वह कई बार मन मसोस कर रह जाती—"मेरी कोख से जन्मी इस बच्ची का भविष्य न जाने क्या होगा?" अब तो वह बच्ची है, लेकिन जब बड़ी होगी, तो क्या उसके रंग की वजह से उसका विवाह कठिन हो जाएगा?
मालती सुपारी काटने में व्यस्त थी। ठंडी दोपहर थी। उसने श्यामा से एक चादर लाने को कहा। फिर वह सूख चुकी सुपारी के छिलके सरौते से निकालने लगी। उधर श्यामा बाहर आँगन में धूप में रखे वस्त्रों में से एक गरम चादर उठाकर ले आई और अपनी माँ को ओढ़ा दी। फिर वह पुनः बाहर गई और बाकी वस्त्र, रजाइयाँ, तकिए, और चादरें भी ले आई।
यह एक सिलेटी ग्रामीण परिवार था। घर के आँगन के चारों ओर सुपारी और नारियल के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष लगे थे। कहीं कहीं गुड़हल, टगर, घंटा फूल और नीले अपराजिता की झाड़ियाँ भी थीं। ईशान कोण की दिशा से एक आम की पतली सी टहनी आँगन में झाँक रही थी। आँगन के मध्य में तुलसी का चौबारा बना था। उसके चारों ओर चटाइयों पर धूप में कुछ कपड़े, रजाइयाँ, तकिए और चादरें सूखने के लिए रखे थे।
यह मालती के घर की रोज़ की दिनचर्या थी। सुबह से दोपहर तक इन वस्त्रों को धूप में सुखाने पर ही वे रात की ठंड में गरमाहट दे पाते थे।
श्यामा के पिता, देवराज भट्ट, जाति से ब्राह्मण थे और जजमानी प्रथा से जुड़े हुए थे। अग्रहायण मास में वे अत्यंत व्यस्त हो जाते थे—चारों ओर होने वाले विवाहों में उन्हें पुरोहिताई का कार्य मिल जाता था। उसी से उनकी सालभर की आजीविका चलती थी। दुर्गा पूजा से लेकर जगद्धात्री पूजा तक की कमाई से ही तीन सदस्यीय यह परिवार अपना गुज़ारा करता था।
कार्तिक मास चल रहा था और अग्रहायण आने में अब केवल चार-पाँच दिन शेष थे। इस बार विवाहों में पुरोहिताई का कार्य बहुत कम मिला था, जिससे विशेष आमदनी की संभावना नहीं थी। दो जजमान परिवार तो इतने गरीब थे कि उनसे दक्षिणा माँगना भी संकोचजनक था। उधर जगद्धात्री पूजा के लिए भी अब तक कोई आमंत्रण नहीं आया था। जबकि हर वर्ष भट्टाचार्य बाबू के घर से बुलावा अवश्य आ जाता था।
इसका भी एक कारण था—भट्टाचार्य जी हर वर्ष जगद्धात्री पूजा के अवसर पर अपनी नातिन या किसी रिश्तेदार की कन्या को माता के रूप में सजवाते और पूजा कराते थे। परंतु इस वर्ष उनकी सभी नातिनें बड़ी हो चुकी थीं, अतः कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं था।
श्यामा के पिता को चिंता हुई, सो वे एक दिन भट्टाचार्य जी के घर जगद्धात्री पूजा के विषय में चर्चा करने पहुँचे। न जाने क्या सोचकर वे अपनी बेटी श्यामा को भी साथ ले गए। श्यामा अभी छोटी थी, इसलिए अक्सर वह अपने पिता के साथ पूजा-पाठ और यजमानों के घर जाया करती थी।
सिलेटी परंपरा के अनुसार, जो पूजा एक बार प्रारंभ हो जाए, उसे प्रत्येक वर्ष करना अनिवार्य होता है। यदि कोई विशेष कारण न हो, तो उसे स्थगित करना अमंगल का संकेत माना जाता है।
देवराज महाशय जब भट्टाचार्य महाशय जी के घर पहुँचे और पूजा के बारे में बात चलायी, तो भट्टाचार्य जी गहन सोच में पड़ गए। तभी उनकी दृष्टि श्यामा पर पड़ी। उन्होंने तत्काल प्रस्ताव रखा—"क्यों न इस बार श्यामा को ही देवी के रूप में पूजा हेतु चुना जाए?"
पहले तो देवराज भट्ट थोड़ा संकोच में पड़े, किंतु जब भट्टाचार्य बाबू ने कहा, "इसमें कोई आपत्ति नहीं है। गाँव की प्रत्येक बेटी हमारे लिए माँ जगद्धात्री के समान ही है," तो वे प्रसन्न हो उठे और उनकी उदार भावना से गद्गद हो गए।
घर आकर उन्होंने यह बात पत्नी मालती को बताई। मालती यह सुनकर खुशी से भर उठी। उसकी आँखों से आँसू छलक आए।
निर्धारित तिथि को जगद्धात्री पूजा का आयोजन हुआ। मालती अपनी बेटी श्यामा को लेकर पहुँची। भट्टाचार्य जी की पत्नी ने श्यामा का स्वयं श्रृंगार किया और पूजा स्थल तक ले गईं। वहाँ देवराज अपनी बेटी को देख मंत्रमुग्ध हो गए। आज श्यामा सचमुच माँ जगद्धात्री जैसी प्रतीत हो रही थी। उन्होंने अपनी बेटी में देवी का रूप देख उसका आह्वान किया और उसके चरणों में आलता लगाकर पूजा की विधि आरंभ की। कुमारी पूजा प्रारंभ होने के पहले से ही मालती देवी भी पूजा मंडप में उपस्थित थी। कुमारी रूपी श्यामा को देख कर उनकी आँखें छलक उठी, श्यामा के विवाह की दुष्चिन्ता उनके मन से दूर हो गयी और एक परम तृप्ति से उनका मन भर गया।

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