Total Pageviews

Monday, February 16, 2026

न्याय का आंगन

 


अगरतला कृष्ण नगर की एक पुरानी हवेली की मुंडेर पर बैठी गौरैया भी शायद जानती थी कि रमेशकांति बाबू के घर की चाय में मिठास से ज्यादा कड़वाहट घुली होती है। सुबह की पहली किरण के साथ ही रसोई से बर्तनों की खनक नहीं, बल्कि रमा देवी के तीखे स्वर गूंजने लगते थे। "मंटू! अरे ओ मंटू! अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा? देख, शानटू को दफ्तर जाना है, उसके लिए गरम पानी चढ़ा दिया या नहीं? खुद तो बस सांड की तरह पड़ा रहता है।" मंटू, जिसका स्वभाव शांत जल की तरह गहरा था, बिना कुछ कहे अपनी चादर समेटकर बाहर आया। वह खुद भी एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छी नौकरी करता था और सुबह की शिफ्ट के लिए उसे भी निकलना था, पर घर के अनुशासन का बोझ सिर्फ उसके कंधों पर था। उसने अपनी सौतेली मां की आंखों में झांकने की कोशिश भी नहीं की, क्योंकि वहां उसे बचपन से ही अपने लिए सिवाय एक ठंडी उपेक्षा के कुछ और नहीं मिला था। अपनी सगी मां के गुजर जाने के बाद उसने इसी पत्थर की मूरत को 'मां' पुकारा था, पर रमा देवी के लिए ममता का अर्थ सिर्फ उनका अपना बेटा शानटू था।

रमेशकांति बाबू, जो कभी पूरे कृष्ण नगर के रसूखदार व्यक्ति थे, अब एक व्हीलचेयर तक सिमट कर रह गए थे। विकलांगता ने उनके शरीर को तो जकड़ा ही था, शायद उनकी जुबान पर भी रमा देवी के दबदबे का ताला जड़ दिया था। बरामदे में बैठे वह मंटू को बाल्टी भरकर पानी ले जाते देखते, तो उनकी आंखें नम हो जातीं। तभी रसोई से रमा देवी का स्वर फिर उभरा, "जयश्री बहू, जरा शानटू के लिए बादाम वाला दूध ले जा, बेचारा रात भर फाइलें देखता रहा है। और मनस्री, तू खड़ी क्या देख रही है? जा, आंगन की सफाई कर, मंटू की पगार तो बस घर के राशन और बिजली के बिलों में ही उड़ जाती है, कम–से–कम काम तो ढंग से करे।" मनस्री, जो मंटू की पत्नी थी, अपनी सास के इस भेदभाव को रोज पीती थी। वह जानती थी कि शानटू भी कमाता है, पर उसकी कमाई रमा देवी 'भविष्य' के नाम पर तिजोरी में जमा करवा लेती थीं, जबकि घर का एक-एक ढेला मंटू की जेब से निकलता था।

एक शाम जब मंटू दफ्तर से थका-हारा लौटा, तो शानटू दबे पांव उसके कमरे में आया। "भाई, यह रख लीजिए," शानटू ने धीरे से कुछ नोट मंटू की जेब में डालते हुए कहा। मंटू ने चौंककर उसे देखा, तो शानटू ने नजरें झुका लीं, "मां को पता चला तो फिर क्लेश होगा। वह कहती हैं कि मेरा पैसा मेरा है और आपका पैसा 'हमारा' है। मुझे अच्छा नहीं लगता कि सारा बोझ आप उठाएं, पर घर की शांति के लिए मैं चुप रहता हूँ।" मंटू ने छोटे भाई के सिर पर हाथ फेर दिया। वह जानता था कि शानटू बुरा नहीं है, बस वह मां की जिद और भाई के सम्मान के बीच फंसा हुआ है। लेकिन यह लुका-छिपी का खेल ज्यादा दिन चलने वाला नहीं था। मनस्री यह सब देख रही थी और उसके भीतर एक ज्वालामुखी पक रहा था।

घर में तनाव की एक महीन लकीर तब और खिंच गई जब रात के खाने पर मेज सजी। रमा देवी ने बड़े चाव से शानटू की थाली में घी परोसा, जबकि मंटू की थाली की तरफ देखा तक नहीं। रमा देवी ने बात शुरू की, "मंटू, इस महीने तेरे पिताजी  की फिजियोथेरेपी का खर्च बढ़ गया है, और जयश्री के लिए कुछ गहने भी लेने हैं। तुम्हारी तनख्वाह में से कुछ बचेगा या सब मनस्री के मायके भेजने का प्लान है?" मनस्री का धैर्य जवाब दे गया। उसने एक तीखी नजर अपनी सास पर डाली और अपने कमरे से एक पुरानी लोहे की डिबिया ले आई। उसने उसे मेज पर पटक दिया।

 "यह क्या है मनस्री?" मंटू ने पूछा। मनस्री की आंखों में दृढ़ता थी, "यह आपकी मेहनत की वो ढाल है जो मैंने आपकी पगार के उस छोटे से हिस्से से बचाई थी जिसे आपने कभी मां जी को नहीं बताया था। और मां जी, आप फिजियोथेरेपी की बात करती हैं? पिछले तीन महीनों से बाबूजी के इलाज का पैसा ये दे रहे हैं। इस वजह से उनके पास एक भी पैसा नहीं बचता था। ये तो भला हो शानटू दा का कि वे  छुपकर भाई को कुछ पैसे दे रहे थे क्योंकि आपकी ममता ने बड़े बेटे को सिर्फ एक एटीएम मशीन समझ लिया है।"

हवेली के हॉल में सन्नाटा पसर गया। रमा देवी का चेहरा सफेद पड़ गया जब उन्हें पता चला कि उनका 'आज्ञाकारी' लाडला बेटा भी मंटू की मदद कर रहा है। रमेशकांति बाबू की व्हीलचेयर अचानक आगे बढ़ी। उनकी आवाज में आज सालों बाद वह पुरानी कड़क थी। उन्होंने रमा देवी की ओर देखा और बोले, "रमा, मैंने अपनी विकलांगता के कारण तुम्हारी ज्यादतियों पर आंखें मूंद ली थीं, पर इसका मतलब यह नहीं था कि मैं अंधा था। मंटू मेरा बेटा है, और उसने इस घर के लिए जितना किया, उतना शायद मैं भी न कर पाता। तुम्हारी यह दोगली मानसिकता इस घर की ईंटें हिला रही है। तुम शानटू की कमाई को जोड़ती रही और मंटू को निचोड़ती रही, पर देखो, खून के रिश्ते फिर भी एक रहे।"

रमेशकांति बाबू ने मंटू को अपने पास बुलाया और उसके हाथ में हवेली के पिछले हिस्से के कागजात रख दिए, जो पूरी तरह स्वतंत्र और आलीशान था। "मंटू, बेटा, तूने मेरा और इस औरत का बहुत सम्मान कर लिया। अब वक्त है कि तू अपनी गृहस्थी शांति से जिए। यह हिस्सा तुम्हारा है। आज से तुम और मनस्री अपनी मर्जी के मालिक हो। वहां रसोई भी अलग होगी और हिसाब भी।" रमा देवी ने विरोध करना चाहा पर रमेशकांति ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया, "तुम्हारे लाड ने शानटू को समझदार तो बनाया, पर मंटू को पराया कर दिया। अब इसी शानटू के साथ रहो और देखो कि बिना मंटू के ये घर और तुम्हारी तिजोरी कैसे चलती है।" मंटू की आंखों में आंसू थे, पर इस बार सुकून के। शानटू ने आगे बढ़कर बड़े भाई के पैर छुए, यह जताते हुए कि दीवारें भले खिंच जाएं, पर भाइयों का प्रेम नहीं बंटेगा।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती

No comments:

Post a Comment

अंधेरा या रोशनी

लोग कहते हैं—काली अँधेरी रात बीत जाएगी, सुबह की पहली किरण के साथ खुशियाँ आएगी। अँधेरी रात शायद किसी को पसंद नहीं आती, मगर यह रात मुझे बहुत ह...