Total Pageviews

Tuesday, January 13, 2026

अभावों की मिठास

 


सिलचर की सर्द हवाएं हड्डियों को कँपा रही थीं। रूपक ने अपनी फटी हुई चादर को थोड़ा और कस लिया। वह एक दिहाड़ी मजदूर था, जिसके हाथों की लकीरें ईंटें ढोते-ढोते घिस चुकी थीं। उसकी पत्नी नैनामती दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर शाम को जब घर लौटती, तो दोनों की थकान एक-दूसरे को देख कर और बढ़ जाती।

"कल पौष संक्रांति है," नैनामती ने चूल्हे की राख साफ करते हुए धीरे से कहा। "मुन्ना पूछ रहा था कि क्या इस बार उसे भी ‘चुंगा पीठा‘ खाने को मिलेंगे?"

रूपक खामोश रहा। जेब में सिर्फ कुछ सिक्के थे, जिनसे अगले दो दिन का राशन भी मुश्किल था। संक्रांति का मतलब था—नए कपड़े, खजूर का गुड़ (नोलन गुड़), बिरौन चावल का पीठा, तिल के लड्डू । गरीबी के इस दौर में ये चीजें किसी शाही दावत से कम नहीं थीं।

अगली सुबह, पूरा शहर उत्सव की तैयारी में था। रूपक काम की तलाश में चौक पर खड़ा रहा, लेकिन कड़ाके की ठंड के कारण कंस्ट्रक्शन का काम बंद था। वह खाली हाथ घर लौटने लगा, तो रास्ते में उसे खेतों से ’नेरा’(पराली) ले जाते लोग दिखे। उसने सोचा, 'भले पेट खाली रहे, पर अपने बच्चे के लिए छोटा सा ’मेड़ा–मेड़ी घर’ तो बना ही सकता हूँ।' उसने कुछ गिरे हुए बाँस और पराली इकट्ठा की और शाम तक आंगन में एक नन्हा सा मेड़ा–मेड़ी घर खड़ा कर दिया। मुन्ना की आँखों में चमक देख उसे पल भर की खुशी मिली, पर पेट की भूख और त्योहार का अधूरापन उसे साल रहा था।

तभी नैनामती आई, उसकी आँखों में आँसू थे। जिस घर में वह काम करती थी, वहां उसे आज छुट्टी दे दी गई थी और पगार भी अगले हफ्ते मिलने वाली थी। उम्मीद की आखिरी किरण भी धुंधली पड़ गई।

तभी दरवाजे पर एक पुरानी साइकिल की घंटी बजी। वह उनके पुराने मालिक, प्रमोद बाबू थे। रूपक सालों पहले उनके बागान में काम करता था। प्रमोद बाबू के हाथ में एक भारी थैला था।

"रूपक रे! घर पर है क्या?" उन्होंने आवाज दी। "आज शहर आया था, सोचा तुझे पौष संक्रांति की कुछ सामग्री दे दूँ। तेरे हिस्से का पुराना बकाया भी बाकी था।"

थैले में चावल, मैदा,आटा, कुछ मीठे आलू , खजूर के गुड़ की एक भेली और ताज़ा नारियल था। रूपक और नैनामती की आँखों में कृतज्ञता के आँसू छलक आए। वह महज राशन नहीं, एक उम्मीद थी।

रात के सन्नाटे में, नैनामती ने सिलहटी परंपरा के अनुसार चूल्हा सुलगाया। उसने चावल के आटे को गूँथकर नन्हे-नन्हे चुंगा पीठा' और पाटीशापटा बनाए। दूध तो कम था, पर गुड़ की खुशबू ने पूरे झोपड़े को महका दिया। उधर रूपक ने आंगन में पवित्र 'बौनी' (धान की बालियां) बांधी, ताकि घर में बरकत बनी रहे।

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले, उन्होंने मुन्ना के साथ मिलकर मेड़ा– मेड़ी घर में अग्नि प्रज्वलित की। कड़कड़ाती ठंड में आग की तपिश और हाथ में गरम-गरम पीठे का कटोरा—रूपक और नैनामती के लिए यह किसी भी बड़े उत्सव से बढ़कर था। बाहर गौडिया मठ वाले अपनी कीर्तनियां की टोली लेकर हरि नाम गाते हुए जा रहे थे। उनके सामने उसने तिलुआ, बतासा, और कुछ फल भी लेकर रखता है और फिर हरि लूट(स्थानीय प्रथा) होती है। 

अभावों के बीच, पुराने मालिक की उदारता और अपनी जड़ों के प्रति प्रेम ने उनकी संक्रांति को सार्थक कर दिया था। मुन्ना के चेहरे पर गुड़ की मिठास और मुस्कान देखकर रूपक को लगा कि उसकी दिहाड़ी आज वसूल हो गई है।

No comments:

Post a Comment

अंधेरा या रोशनी

लोग कहते हैं—काली अँधेरी रात बीत जाएगी, सुबह की पहली किरण के साथ खुशियाँ आएगी। अँधेरी रात शायद किसी को पसंद नहीं आती, मगर यह रात मुझे बहुत ह...