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Friday, July 17, 2026

होश का ज़हर


​होश में रहकर भी, वो ज़हर ही उगलते हैं,

हर शब्द में ताने, अपमान ही पलते हैं।

रात भर जागकर, मोबाइल की नीली रोशनी में,

वो दुनिया अपनी, किसी और की दुनिया में ढालते हैं।

​माँ की रसोई से आता है, उनके हिस्से का निवाला,

पर रसोई में मेरी, वो खाली ही है प्याला।

बिना कहे सब समझ लूँ— ये अपेक्षा उनकी जिद है,

पर न समझूँ तो, उनकी जुबान पर ताने की हद है।

​नशा तो बस एक बहाना है, जो उन्हें सुकून देता है,

होश में रहकर तो, वो मेरी हर छोटी भूल को गिनता है।

क्या मैं एक रोबोट हूँ? जो बिना कहे सब जान लूँ?

या उनकी खामोशी के पीछे, अपना स्वाभिमान छोड़ दूँ?

​मेरे शौकों को, वो मेरी कमज़ोरी मान बैठे हैं,

पिता और भाई के प्यार को, वो मेरा अहंकार मानते हैं।

हाथ जब उठता है, तो ज़हन में एक ही सवाल आता है—

क्या यही वो रिश्ता है, जो बरसों तक निभाना है?

​मैं उलझी हूँ अपनी ही आदतों की इन जंजीरों में,

सुविधाओं की चमक और अपमान की इन लकीरों में।

वो तो होश में रहकर, मेरी हस्ती को मिटा रहे हैं,

और मैं खुद को, खुद ही इस पिंजरे में सजा रही हूँ।

वो खुद को 'पीड़ित' बताकर मुझे दोषी ठहराते हैं,

अपनी ही कुंठाओं का इल्जाम मुझ पर मढ़ जाते हैं।

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