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Monday, February 2, 2026

लोहितपुर की चाँदनी रात और एक अधूरी प्रेम कथा

 


साल 1999 अरुणाचल प्रदेश की वादियों में बसा लोहितपुर किसी कवि की कविता जैसा सुंदर था। असम राइफल्स कैंपस के बाहर का एक छोटा सा बाज़ार था और उसके आस-पास की ढलानें। दूर दूर तक सुंदर पहाड़ियों से घिरा, जब रात होती, तो ऐसा लगता मानो आसमान ज़मीन पर उतर आया हो। लोहितपुर की हवा में एक खास किस्म की ताज़गी थी। चाँदनी रातों में जब सफेद और गुलाबी बोगनवेलिया के गुच्छे और आड़ू के पेड़ों की टहनियाँ चाँद की रोशनी में नहाती थीं, तो पूरा मोहल्ला चाँदी की चादर ओढ़े हुए सा लगता था। इसी शुद्ध और शीतल वातावरण में सुनील और रेखा के प्रेम की खुशबू महकी थी।

सुनील के पिता, जिन्हें सब 'मारवाड़ी अंकल' कहते थे, बाज़ार के प्रतिष्ठित व्यापारी थे। वहीं रेखा के पिता, एक मेहनती नेपाली प्रवासी, जो घर-घर दूध पहुँचाकर अपना गुज़ारा करते थे। दोनों परिवार एक ही मोहल्ले में रहते थे, इसलिए जान-पहचान पुरानी थी। रेखा अक्सर दूध देने सुनील के घर आती और वहीं छिपकर दोनों की नज़रें मिल जातीं।
 गर्मी के दिन रात को बिजली चली जाती तो अक्सर लोग चांदनी का मज़ा लेने और खुली हवा में टहलने निकलते तो रेखा और सुनील भी चोरी छिपे एक दूसरे से मिलने की कोशिश करते। 
तो कभी सुनील अपने आँगन में बैठता और रेखा खुले आसमान में चमकते तारों को देखने के बहाने अपनी बालकनी से उसे निहारती। दोनों के घर आस पास एक स्थानीय अरुणाचली के घर के ऊपर वाले हिस्से में था। वे किराए पर रहा करते थे। जब भी रेखा सुबह स्कूल जाने के बहाने उसके घर के सामने से होकर गुजरती तो सुनील अपने घर में टैप रिकॉर्डर में फिल्मी गीत बजाता ताकि रेखा को पता चले कि उसके मन में क्या है। उस वक्त रेडियो और कैसेट ही एक मात्र प्रेमियों का सहारा हुआ करता था। एक रात बिजली चले जाने पर बहने से सुनील घर से निकला और रेखा से चुपके से मोहल्ले के पीछे बोगनवेलिया के पेड़ के नीचे मिला तो दबी आवाज़ में कहा था, "रेखा, ये तारे गवाह हैं, मेरा प्रेम इन पहाड़ों की तरह अटल है।" रेखा बस मुस्कुरा दी थी, पर उसकी आँखों में अनजाना डर था।

कहते हैं प्रेम और खुशबू छुपते नहीं। जब सुनील की माँ को भनक लगी कि उनका बेटा एक 'दूध बेचने वाले' की बेटी से दिल लगा बैठा है, तो उनका मारवाड़ी स्वाभिमान जाग उठा। वे सीधे रेखा के घर जा पहुँचीं।
मोहल्ले के बीचों-बीच सुनील की माँ ने रेखा की माँ को खरी-खोटी सुनानी शुरू कर दी। सुनील की माँ चिल्लाकर बोली, "तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी बेटी को मेरे बेटे के पीछे लगाने की? हम ठहरे ऊँचे खानदान के व्यापारी और तुम लोग परदेसी दूधवाले! अपनी औकात देख ली होती।"
रेखा की माँ ने हाथ जोड़कर कहा, "भाभी, बच्चा लोग गलती किया मेरे को क्या मालूम? ऐसा आप क्यों बोलता है, आपका लड़का भी मेरा लड़की को बिगाड़ा है। मेरा बेटी ऐसा नहीं करता आपका लड़का प्यार करता है मेरा बेटी को तो मेरा बेटी क्या करेगा? आप अपना लड़का को संभालो।"
पर सुनील की माँ कहाँ रुकने वाली थीं? उन्होंने पूरे मोहल्ले के सामने रेखा के चरित्र पर सवाल उठा दिए। रेखा अपने घर के कोने में दुबककर रो रही थी, जबकि बाहर उसके परिवार का मान-सम्मान धूल में मिलाया जा रहा था। इस झगड़े ने दोनों परिवारों के बीच नफरत की एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसे लाँघना नामुमकिन था। इधर रेखा की मां उसे दो थप्पड़ लगाकर डांट कर अपने घर के अन्य कामों में लग जाती है।

वही सुनील के पिता ने तुरंत अपने एक मारवाड़ी दोस्त की बेटी से सुनील का रिश्ता पक्का कर दिया। वे लोग लोहित पुर से अपने गांव चले जाते हैं। जाने से पहले भी सुनील ने किसी तरह रेखा से मिलने की कोशिश की थी और उसे वादा किया था कि वह शादी नहीं करेगा और लौट कर उसी के लिए आयेगा। मगर ऐसा न हुआ। सुनील की शादी तय हुई और उसे अपने पिता के आदेश अनुसार शादी भी करनी पड़ी। शादी का दिन तय हुआ—दिसंबर की एक सर्द रात। पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था, पर सुनील के अंदर अंधेरा था।
जब सुनील को दूल्हा बनाकर आईने के सामने खड़ा किया गया, तो उसने खुद को नहीं, बल्कि उस हारते हुए प्रेमी को देखा जिसने वादा किया था। बाहर ढोल-नगाड़े बज रहे थे, पर सुनील को सिर्फ रेखा की सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं। जैसे ही उसने सेहरा बाँधा, उसकी आँखों से एक आँसू टपक कर उसकी शेरवानी पर जा गिरा।
सुनील के पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा और सख्त लहजे में कहा: "आज अपनी ज़िद छोड़ और कुल की मर्यादा रख। वह लड़की हमारे लायक नहीं थी।"

सुनील ने बेबसी में सिर झुका लिया। वह अपनी ही शादी में एक चलते-फिरते शव जैसा लग रहा था। जब उसने अग्नि के फेरे लिए, तो उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ सात फेरे नहीं ले रहा, बल्कि रेखा की उम्मीदों की चिता जला रहा है।

इधर रेखा सुनील के इंतज़ार करके लगी। उसकी हालत बिगड़ने लगी। जिस रास्ते से शहर के बाहर जाने का रास्ता था, रेखा घंटों वहीं खड़ी रहती। वह बोगनवेलिया के उन फूलों को नोचती और पूछती, "क्या ये आज भी चाँदी के दिखते हैं? सुनील कहाँ है?"

उसका प्रेम इतना गहरा था कि विछोह ने उसके मानसिक संतुलन को हिला दिया। वह कभी हँसती, कभी रोती और कभी एकदम खामोश हो जाती। लोहितपुर के उसी खूबसूरत बाज़ार में वह अब एक 'पागल लड़की' बन चुकी थी।
उसके पिता, जो कभी गर्व से अपनी नेपाली टोपी पहनकर चलते थे, अब सिर झुकाकर चलते थे। अपनी इकलौती बेटी की यह दशा उनसे देखी नहीं गई। एक सुबह, जब लोहितपुर की पहाड़ियों पर कोहरा छाया हुआ था, रेखा के पिता ने अपना थोड़ा-बहुत सामान और अपनी बेसुध बेटी को लिया और उसे इलाज के लिए वापस नेपाल ले जाने का फैसला किया।
जाते वक्त रेखा ने एक बार पीछे मुड़कर उन आड़ू के पेड़ों को देखा, जो अब बिना फूलों के ठूँठ लग रहे थे। लोहितपुर की वह चाँदनी रात अब उसकी ज़िंदगी में कभी नहीं लौटने वाली थी। सुनील की मजबूरी और रेखा की खामोशी लोहितपुर की उन पहाड़ियों में आज भी दफन है।

डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 


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