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Wednesday, January 14, 2026

भाई-दूज



सन् 1970 की बात है। असम की शांत बराक घाटी के एक छोटे से गाँव, कातीराइल, में उत्सव की धीमी आहट सुनाई दे रही थी। मीनू अभी-अभी आं गन से सूख चुके कपड़े समेटकर भीतर लाई थी। उसकी माँ, खिरोदा देवी, ने तुरंत उसे आवाज़ दी और तुलसी के पौधे की जड़ से थोड़ी मिट्टी लाने को कहा। घर के एक कोने में चंदन घिसने की धीमी, सोंधी क्रिया चल रही थी। पीतल की थाली में धान और दूर्वा (दूब घास) करीने से सज चुके थे। आज कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि थी, और कल 'भाई दूज' (यम द्वितीया) का पावन पर्व था। माँ और बेटी इसी मंगल तैयारी में तल्लीन थीं।

वहीं, घर के पुराने, छोटे से खाट पर लेटे उपेन्द्र जी रह-रहकर व्याकुलता से पूछ रहे थे, "अनिल आया क्या रे?"

मीनू ने धीमे से उत्तर दिया, "नहीं, बाबा। छुड़दा (छोटा दादा) अभी कहाँ पहुंचे होंगे। बदरपुर घाट पर रेलगाड़ी शाम छः बजे ही पहुँचती है। फिर वहाँ से कोई बस मिलेगी तो रानी फेरी के रास्ते आएंगे।"

उपेन्द्र जी की व्याकुलता कम नहीं हुई। "अरे! पता नहीं कितना समय लगेगा? अनिल कब आएगा? ओ अनिल की माँ, कहाँ हो तुम?"

खिरोदा देवी ने रसोई से आवाज़ दी, "क्या हुआ जी? क्यों बुला रहे हैं?"

उपेन्द्र जी बोले, "पंचांग में देखो, प्रतिपदा कितने बजे तक है? और हाँ, अनिल जब आए तो उसके लिए 'संदेश' (बंगाली मिठाई) और खीर बनाकर रखना। मेरे अनिल को बहुत पसंद है। न जाने उसे वहाँ ये सब खाने को मिलता भी होगा या नहीं।"

खिरोदा देवी बोलीं, "प्रतिपदा तो कल सुबह नौ बजे तक है। पर ये सब मुझसे क्यों पूछते हैं जी? भाई दूज पर बहन ही भोजन कराती है। मीनू से पूछो, उसने सारी तैयारी की है कि नहीं।"

मीनू ने दोनों को आश्वस्त किया, "आप दोनों इतनी चिंता क्यों करते हैं? जुगल (सबसे छोटा भाई) और मैंने सब कुछ लाकर रख दिया है। छुड़दा की पसंद का ही सब बनेगा। आख़िर पूरे दो साल बाद जो आ रहे हैं! भगवान का शुक्र है कि वे जीवित और सकुशल लौट रहे हैं।"

देखते-ही-देखते शाम पाँच बजते-न-बजते अंधेरा गहराने लगा। तभी, कातीराइल से कुछ दूर सती रेल जंक्शन से आती ट्रेन की लंबी, गम्भीर आवाज़ सुनाई दी। सभी चौंक उठे।

मीनू प्रसन्नता से बोली, "माँ! आज यह ट्रेन बड़ी जल्दी आ गई! लगता है घाट पर यह बीस मिनट में ही लग जाएगी। छुड़दा जल्दी आएंगे!"

खिरोदा देवी का चेहरा खुशी से दमक उठा। उसी समय, आस-पास के घरों से संध्या की दीया-बाती और झाँझ (छोटी-छोटी मंजीरा) बजने की मंगल ध्वनि आने लगी। महिलाओं ने मिलकर 'उलू ध्वनि' (प्रसन्नता प्रकट करने का ध्वनि) की। खिरोदा देवी और बेटी मीनू ने भी जल्दी से शाम की दीया-बाती पूरी की। इसके बाद मीनू ने तुरंत अपने भाइयों के लिए भाई दूज की थाली सजानी शुरू कर दी। आज प्रतिपदा पर वह तुलसी की मिट्टी से टीका करके एक नियम रखेगी, और कल चंदन से भाई दूज का टीका करके यम-द्वार में एक बाधा डालेगी (या 'काँटा गाड़ेगी', स्थानीय रीति अनुसार) ताकि यम उसके भाइयों को छू भी न सके।

इधर, उसका मंझला भाई भी अपने परिवार सहित आ चुका था। नागालैंड के दिमापुर में एक छोटी सी दुकान चलाने वाले मझले भाई की दो संतानें थीं – चार साल की झूमा और गोद भर का रोंटू। मीनू अपनी मंझली भाभी के संग खाने की तैयारी में जुट गई। खिरोदा देवी अपने पोते-पोती को संभालने लगीं।

तभी, अचानक बाहर से "माँ!" की पुकार सुनकर सभी के चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गई। मीनू रसोई में से लालटेन लेकर बाहर निकली। अनिल अभी-अभी घर पहुँचा था। मीनू ने दौड़कर अपने भाई का हाथ पकड़ा और उसे घर के भीतर ले आई।

दो साल बाद बेटे को देखकर खिरोदा देवी की आँखें भर आईं। दुबला-पतला अनिल अब काफ़ी बलिष्ठ हो गया था। सेना की वर्दी में वह बहुत सुंदर लग रहा था और मूंछें भी बड़ी कर ली थीं। हाथों में अपना बिस्तर और ट्रंक पकड़े हुए, वह माँ के पास आकर खड़ा हुआ। उसने अपना सामान रखा, पहले माँ को प्रणाम किया, फिर पिता के चरण स्पर्श किए। इसके बाद मंझले भाई (या मेजदा) और मंझली भाभी के पैर छूकर उनसे भी आशीर्वाद लिया। घर के हर चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। खिरोदा देवी बार-बार अपने आँसू पोंछने लगीं।

फिर, मीनू ने दोनों भाइयों को आसन पर बिठाया, प्रतिपदा का टीका लगाया और धान-दूर्वा से उन्हें शुभकामनाएँ दीं कि दोनों स्वस्थ और सफल रहें। उसने अपने हाथों से भोजन कराने का आग्रह किया।

रात को, सब अनिल के आस-पास बैठ गए और उसके सेना के कैंप की कहानियाँ सुनने लगे। उसने बताया कि कैसे उन्हें अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर बनी चौकी की गश्त के लिए भेजा गया था। वहाँ वे तेज़ बर्फ़बारी और बरसात के दिनों में लगातार गश्त लगाते थे, और रात की ड्यूटी सबसे ज़्यादा उसी की लगा करती थी।

तभी खिरोदा देवी ने उस घटना के बारे में पूछा जिसमें उनकी झूठी गुमशुदगी की रिपोर्ट आ गई थी।

अनिल ने बताया कि एक बार चौकी पार से चीनी सैनिक ज़बरदस्ती घुस आए थे। उन्हें रोक तो लिया गया था, पर थोड़ी-बहुत गोलाबारी भी हुई थी। तभी अनिल को हेडक्वार्टर में रिपोर्ट करने की ज़िम्मेदारी दी गई। अनिल वापस अपनी चौकी पर जाकर वायरलेस रेडियो सेट से संपर्क साधने की कोशिश करने लगा, लेकिन अधिक बर्फ़बारी के कारण चौकी के भीतर से संपर्क करना मुश्किल था। वह मशीन को बाहर ले जाकर संपर्क साधने की कोशिश कर ही रहा था कि धूर्त चीनी सेना के एक जवान ने चौकी की तरफ़ एक ग्रेनेड फेंक दिया, जिससे चौकी ध्वस्त हो गई। चौकी के पास की ढलान काफी दिनों की घनी बर्फबारी से अस्थिर हो चली थी। ग्रेनेड के असर से एक 'एवलांच' (हिमस्खलन) आया, जिसने चौकी के साथ-साथ सभी सैनिकों को भी बहा दिया।

हेडक्वार्टर को इसकी जानकारी चीनी रेडियो से आ रही ख़बरों से पता चली। वे तुरंत अपनी दूसरी टुकड़ी लेकर चौकी के लोकेशन तक पहुँचे और लगभग तीन-चार दिनों की कठिन खोज के बाद सभी घायल भारतीय और चीनी सैनिकों को ढूँढ़ निकाला। अनिल ने बताया कि उसके तीन साथी इसमें शहीद हुए, जबकि घायल चीनी सैनिकों को भारतीय सेना ने गिरफ़्तार कर लिया और कड़ी निगरानी में आर्मी अस्पताल में इलाज के लिए रखा गया।

जब माँ ने पूछा कि उसकी गुमशुदगी क्यों घोषित की गई थी, तो अनिल ने बताया, "ग्रेनेड का हमला इतना तेज़ था कि मैं काफ़ी दूर जाकर गिरा था, और मशीन भी टूट गई थी। मैं बर्फ़ की पाँच फ़िट मोटी परत के नीचे दबा हुआ था। लेकिन किस्मत अच्छी थी कि वहाँ एक बर्फ की गुफा जैसी बनी हुई थी। थोड़ी सी जगह होने के कारण मुझे उस समय अपने आप को बचा पाने के लिए उपाय सोचने का अवसर मिला। बर्फ़ के नीचे दबने के बाद मैंने बहुत संघर्ष किया और अपनी राइफ़ल से एक सुराख कर लिया, जिससे मैं थोड़ा साँस ले पा रहा था। पूरे सात दिन बाद भी जब उन्हें मैं नहीं मिला, तो उन्होंने मुझे गुमशुदा घोषित कर दिया।"

अनिल आगे बोला, "माँ, यह तुम्हारा ही आशीर्वाद था कि जहाँ मैं गिरा था, उधर से कुछ ही दूरी पर पहाड़ी चरवाहों की बस्ती शुरू होती थी। उन्हीं में से दो चरवाहे थे, जिनकी बकरी खो गई थी। उसे ढूँढ़ते हुए जब वे भटक रहे थे, तो उन्हें मेरी बंदूक नोक दिखी। उन्होंने ही दूसरी टुकड़ी को ख़बर दी। माँ, मुझे तो यह सब मालूम न था क्योंकि मैं तो घायल और बेहोश हो चुका था। मेरे दोस्त ने बताया कि कैसे मुझे उन्होंने बर्फ से निकाला और हस्पताल पहुंचाया। पूरे चार हफ़्ते लगे मेरे घाव सूखने में, और तब जाकर मैं खड़ा हो सका। मैं तो छुट्टी पर आना चाहता था, लेकिन कमांडर साहब ने मुझे पूरी तरह से स्वस्थ होने के लिए गुवाहाटी के अस्पताल भेज दिया। जब मैं स्वस्थ हुआ, तो चौकी पर हुए हमले की जाँच (इंक्वायरी) हुई। सारी बातें जब साफ़ हो गईं, तब उन्होंने हमारे चौकी के कमांडर और हम सबकी छुट्टी मंज़ूर की।"

बेटे की साहस भरी कहानी सुनकर खिरोदा देवी का हृदय गर्व से भर उठा। वहीं मीनू भी अपने भाई की सुरक्षा और दीर्घायु की कामना कर रही थी। अगले दिन, सभी ने बड़े उत्साह और प्रेम से भाई दूज का पर्व मनाया।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

अतिथि व्याख्याता 

सरकारी प्रथम दर्जा कॉलेज के आर पूरा बंगलुरू 36

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