अरुणाचल प्रदेश के ख़ूबसूरत पहाड़ी ज़िले पश्चिमी सियांग का सुंदर शहर अलोंग । यह 90 के दशक का अंतिम समय रहा होगा, और शहर अपनी हरी-भरी ख़ूबसूरती लिए दुनिया के सामने इठला रहा था। अभी-अभी अच्छी बारिश होकर गुज़री थी। हल्की-सी धुंध और भीगी हरियाली तन-मन को जितनी शीतलता दे रही थी, उससे कहीं अधिक एक अजीब-सी कसक पैदा कर रही थी। चंदा अपने क्वार्टर के बरामदे में माँ के साथ छत से टपकते बारिश के पानी को पास रखे एक लोहे के ड्रम में इकट्ठा कर रही थी। इतनी ऊँचाई वाली जगहों पर पानी की आपूर्ति दिन में केवल एक ही बार आती थी, इसलिए घर के अन्य ज़रूरतों के लिए पानी बड़ी मुश्किल से हो पाता था। असम राइफल्स के क्वार्टर में रहने वाले सभी परिवारों का यही एक तरीक़ा था जिससे वे पानी की कमी पूरी करते थे। सभी के घर में बड़े-बड़े, खाली पड़े पेट्रोल के ड्रम थे, जिनमें वे बारिश के दिनों का पानी भरते और उसी से काम चलाते थे।
अगले दिन चंदा की स्कूल से छुट्टी थी। घर के सारे काम हो चुके थे। शाम के समय चंदा माँ के साथ बैठकर एक सफ़ेद कपड़े पर पास रखी एक किताब से देखकर क्रॉस स्टिच की फूलों-पत्तियों की डिज़ाइन बना रही थी। वहीं उसकी माँ क्रोशिए से मेज़ पर रखने के लिए सुंदर-सा मैट बुन रही थीं। पुराने समय में घर की महिलाएँ ही ज़्यादातर साज-सज्जा का सामान स्वयं तैयार किया करती थीं। चंदा अपनी सिलाई बड़े ध्यान से किताब में से देखकर बना रही थी, तभी पास के घर से मोहन पीटी यूनिफ़ॉर्म पहने निकलता है। वह असम राइफल्स में जवान था। उसके पिता भी असम राइफल्स के अस्पताल में नर्सिंग असिस्टेंट का काम करते थे। दोनों परिवार एक ही क्वार्टर परिसर में रहते थे। लगभग हर दिन मोहन की ट्रेनिंग का कोई-न-कोई सत्र चलता ही रहता था, और आज शाम उसकी पीटी थी। जब मोहन चंदा के क्वार्टर के सामने से गुज़रता है तो दोनों की नज़रें आपस में मिलती हैं और दोनों हल्के से मुस्कुरा देते हैं। चंदा सतर्कतापूर्वक कँखियों से अपनी माँ को देखती है, जो सिलाई में पूरी तरह मग्न थीं। चंदा मोहन को दूर तक देखती रहती है। मोहन भी पलट-पलटकर चंदा को देख पीटी के लिए निकल जाता है। चंदा मोहन को बहुत चाहती थी। 15 साल की उस अल्हड़ उम्र में 'चाहत' के गहरे मायने उसे पता नहीं थे, पर मोहन के लिए उसके मन में एक आकर्षण था। वह यह भी नहीं जानती थी कि मोहन भी उसे क्यों चाहता होगा।
चंदा एक भोली और चंचल लड़की थी। वह अभी भी अपनी सहेलियों के साथ स्टापू या किट-किट खेला करती थी। उसे अपने भाई-बहनों के साथ बाँस की तीलियों से अस्थाई गुड़िया-घर बनाकर खेलना बहुत पसंद था, जिसमें तीनों पागलपन की हद तक हँसते थे। चंदा स्कूल के अलावा अपने बालों की चोटी नहीं करती थी, उसे खुले, बिखरे बाल ही रखना पसंद था।
एक शाम स्कूल से लौटते समय चंदा को मोहन दिखाई दिया जो अपनी यूनिट के बाकी जवानों के साथ वर्दी में राइफ़ल लेकर दौड़ लगा रहा था। पीछे-पीछे उसके कमांडर साहब चले आ रहे थे। चंदा रास्ते के एक किनारे खड़ी हो जाती है। मोहन उसके पास से गुज़रते वक़्त बड़ी सावधानी से एक काग़ज़ का टुकड़ा फेंक जाता है। चंदा यह देख नहीं पाती और वहीं खड़ी हो सबको जाते हुए देखती रह जाती है। सभी जवानों की नज़रें एक-एक बार कँखियों से चंदा को घूरकर आगे निकल जाती हैं। जैसे ही चंदा आगे बढ़ती है तो उसके पैरों के नीचे वही काग़ज़ का टुकड़ा पड़ता है। चंदा उसे उठाती है तो पाती है कि मोहन ने उसे एक ख़त लिखा था, जिसमें उसने अपने दिल की बात कह रखी थी। वह ख़त पढ़कर बहुत ख़ुश होती है। घर लौटकर वह माँ से छुपाकर उस चिट्ठी को बिस्तर के नीचे दबा देती है। प्रेम की यह उसकी पहली कड़ी थी और मोहन की ओर से उसे मिला यह प्रेम-पत्र पहला उपहार।
चंदा बहुत ख़ुश थी। स्कूल आते-जाते वह प्रायः मोहन को देखा करती थी। मोहन भी उसे ख़ूब देखता रहता था। दोनों के क्वार्टर आस-पास होने के कारण उन्हें किसी-न-किसी बहाने मिलने का मौक़ा मिल जाता, लेकिन वे कभी भी प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलते थे कि कहीं उनका भेद न खुल जाए। परंतु ईश्वर ने उनके प्रेम मिलन का एक सहज बहाना ढूँढ लिया था। मोहन के क्वार्टर के आँगन में एक बड़ा-सा हरसिंगार का पेड़ था, जिस पर अब ख़ूब फूल खिलने लगे थे। चंदा के घर के आँगन में फूलों की क्यारियाँ तो थीं, पर शीत ऋतु में खिलने वाला हरसिंगार का फूल नहीं था। इसलिए वह मोहन के घर हरसिंगार के फूल लेने जाया करती थी। मोहन के पिताजी से इजाज़त लेकर वह फूल तोड़ती थी। मोहन के पिता भी अपने सहकर्मी की बेटी को पूजा के फूल चुनने के लिए आया देखकर ख़ुश होते और उसे फूल तोड़ने की अनुमति दे दिया करते थे। यही वह मौक़ा होता था जब मोहन के पिता अनजाने में मोहन को चंदा को फूल तोड़ने में मदद करने के लिए बाग़ में भेज देते थे। चंदा एक-एक कर फूल चुनती और अपनी फूलों की टोकरी में भरती। मोहन भी दूसरे शीत ऋतु के फूलों को, जो ऊँची डालियों पर होते थे, चुनकर उसकी टोकरी में रख दिया करता था। तब दोनों की नजरें मिला करती और मुस्कुराहट में बदल जाती। यह सिलसिला तब तक चलता जब तक मोहन की सुबह की कोई ड्यूटी न होती। बाकी दिनों में मोहन घर पर ज़्यादा समय नहीं रहता था; उसे ट्रेनिंग और अन्य कार्यों के लिए जाना पड़ता था। चंदा उन दिनों उसे न देख उदास हो जाया करती थी।
प्रेम की पराकाष्ठा विरह में ही अधिक दिखाई पड़ती है, और प्रेम का सच्चा रूप भी तभी निखरकर आता है। शायद नियति भी इस नियम को अच्छे से जानती थी, तभी वह प्रेमियों को ज़्यादा देर मिलने नहीं देती। बात कुछ यूं हुई कि असम राइफल्स में हर महीने दो दिन निरीक्षण हुआ करता था, जिसमें बड़े अफ़सरों की पत्नियाँ पूरे कैंपस में जाकर क्वार्टर में यह देखती थीं कि कितनी सफ़ाई और स्वच्छता बरती जा रही है। इसकी घोषणा दो-तीन दिन पहले ही कर दी जाती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। चंदा के माता-पिता और चंदा के दोनों भाई-बहन घर की साफ़-सफ़ाई में लग जाते हैं। अच्छे से एक-एक कोना झाड़कर साफ़ किया जाता है। तभी चंदा के कमरे की सफ़ाई के दौरान उसके बिस्तर के नीचे रखी चिट्ठी पर उसकी माँ की नज़र पड़ जाती है। वह यह चिट्ठी सीधे चंदा के बापू को दे देती है, जिसे पढ़कर उनका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वे चंदा को पास बुलाकर पूछते हैं, मगर चंदा डर के मारे कुछ न कहकर सीधे रोने लगती है। चंदा की माँ उसे ज़ोर-ज़ोर से डाँटने लगती हैं, लेकिन तभी उसके पिता उन्हें रोक देते हैं। जब चंदा की माँ उनके रोकने का कारण पूछती हैं तो वे कहते हैं, "अरे, यहाँ क्वार्टर में आज हर कोई मौजूद है। तुम इतनी ज़ोर-ज़ोर से डाँटोगी तो हमारी बेटी की करतूतों का सबको पता चल जाएगा। चुप रहो। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?" इस पर चंदा की माँ कहती हैं, "मुँह से दूध के दाँत नहीं टूटे कि महारानी को प्रेम सूझ गया है। घर के काम बोलो तो बड़े नख़रे करती है। जानती है न, प्रेम करके ब्याह कर ले जाएगा तो तुझे घर का ही काम करना पड़ेगा। तब न तो तू सुबह नौ-नौ बजे तक सो पाएगी और न ही अपनी मर्ज़ी का चोरी-चोरी कुछ खा पाएगी। ये तो तेरे नख़रे हैं, जो हम ही लोग बर्दाश्त कर रहे हैं। " चंदा की माँ उसे बहुत डाँट सुनाती हैं और चंदा खड़े-खड़े आँसू बहा रही थी।
अगले दिन निरीक्षण हो जाने के बाद चंदा सामने के बरामदे में खड़ी थी। तभी वह देखती है कि मोहन भी निकल कर जा रहा है। उसके कंधे पर अपना बस्ता टंगा था और हाथ में एक बड़ा-सा ट्रंक। चंदा की माँ ने मोहन को व्यंग्यात्मक दृष्टि से देखने के बाद पूछा, तब पता चला कि मोहन का चीन सीमा के पास कहीं तबादला हो गया है और उसे आज ही निकलना है। मोहन का चेहरा गंभीर था। चंदा और मोहन दोनों एक-दूसरे को विरह-भरी दृष्टि से देखते हैं और एक-दूसरे को मन ही मन विदा करते हैं।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
के आर पूरा बंगलुरू 36

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