मोहल्ले की तंग गलियों में सुबह का सूरज उतरने से पहले ही विष्णु शंकर राय के घर में चूल्हा जलने की सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी। उस पूरी बस्ती में कायस्थ परिवारों का बाहुल्य था। ऐसे में एकमात्र ब्राह्मण परिवार होने के नाते विष्णु जी और उनकी पत्नी आशा को सामाजिक आदर तो पूरा मिलता, लोग उन्हें इज्जत से 'पंडित जी' कहकर बुलाते, लेकिन इस मुखौटे के पीछे दबी हुई फुसफुसाहटें थीं। कोई उनकी आर्थिक लाचारी पर हंसता, तो कोई उनकी निःसंतानता को लेकर दबी जुबान से तंज कसता।
विष्णु जी सुबह-सवेरे दो-चार घरों में पूजा-पाठ और थोड़ा-बहुत कर्मकांड कराकर बमुश्किल दो पैसे कमा पाते थे। दिन ढलते वे कुछ स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते, जिससे महीने के अंत में घर का किराया और राशन का जुगाड़ हो पाता था। उनकी पत्नी आशा पास के ही एक निजी कॉन्वेंट स्कूल में अध्यापिका थीं। दोनों की शादी को आठ साल बीत चुके थे, लेकिन घर सूना था। आर्थिक तंगी, कर्ज के दबाव और हर पल की अनिश्चितता ने दोनों के भीतर गहरे मानसिक तनाव को जन्म दे दिया था।
एक रविवार की सर्द सुबह में जब विष्णु जी गली के नुक्कड़ पर दूध लेने जा रहे थे, तो उनकी नजर सामने पड़े कूड़े के ढेर पर पड़ी। वहां से किसी नवजात शिशु के रोने की बहुत ही धीमी और क्षीण आवाज आ रही थी। विष्णु जी का दिल दहल उठा। उन्होंने आगे बढ़कर जब गंदे कपड़ों की पोटली हटाई, तो ठंड से ठिठुरती एक नन्ही सी नवजात बच्ची सांसें ले रही थी।
"ईश्वर! यह तुमने क्या परीक्षा ली है?" विष्णु जी की आंखें भर आईं।
जो गोद इतने सालों से सूनी थी, उसमें आज अचानक सृष्टि के उपहार की तरह वह बच्ची आ गिरी थी। वे बिना एक पल गंवाए बच्ची को अपनी छाती से लगाकर भागे-भागे घर आए। आशा ने जब उस फूल सी बच्ची को देखा, तो उसके आंसुओं का बांध टूट गया। दोनों ने मिलकर उस बेसहारा जान को साफ किया, गर्म कपड़े पहनाए और तुरंत प्राथमिक चिकित्सा के लिए नजदीकी अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने राहत की सांस लेते हुए बताया कि समय पर लाने से बच्ची की जान बच गई है।
अभी वे अस्पताल से लौटे ही थे कि उनके घर के बाहर भीड़ जमा हो गई। पास की ही एक झुग्गी बस्ती से एक अनजान महिला रोते-बिलखते हुए वहां पहुंची और विष्णु जी पर चीखते हुए सनसनीखेज आरोप लगाने लगी— "यही हैं वो पंडित! इन्होंने ही मेरा बच्चा चुराया है! ये लोग बांझ हैं, इसलिए इन्होंने मेरी औलाद पर हाथ साफ कर दिया!"
देखते ही देखते बात आग की तरह फैल गई। मोहल्ले के लोग जो पहले पीठ पीछे हंसते थे, वे अब तमाशबीन बन गए। किसी ने तुरंत पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस आई और बिना किसी तहकीकात के विष्णु जी को थाने उठा ले गई।
पुलिस ने जब मामले की तह तक जाने की ठानी, तो असली जाल खुलना शुरू हुआ। पुलिस वास्तविक अपराधी उस युवती को ढूंढने में जुट गई जिसने डर और कलंक के मारे रात के अंधेरे में बच्ची को कूड़े में फेंका था, साथ ही उस झूठा आरोप लगाने वाली महिला की नीयत की भी जांच शुरू हुई। लेकिन इस कानूनी और दस्तावेजी प्रक्रिया, डीएनए मिलान और गवाहों के बयानों में पूरे छः महीने का वक्त बीत गया। इन छः महीनों में विष्णु जी ने बिना किसी दोष के हवालात और जेल की काल कोठरी की हवा खाई।
बाहर आशा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए फर्जी वीडियो और आधे-अधूरे सच के आधार पर स्कूल प्रबंधन ने उस पर लगातार दबाव बनाया, जिससे तंग आकर आशा को खुद अपनी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। वह एक तरफ अपनी गृहस्थी संभालती, तो दूसरी तरफ अपने निर्दोष पति को बेदाग बाहर निकालने के लिए कचहरी और पुलिस थानों के चक्कर काटती रही। समाज ने बिना कुछ जाने उन्हें अपराधी मान लिया था।
छः महीने बाद सच्चाई की जीत हुई। सीसीटीवी फुटेज, डीएनए रिपोर्ट और उस लावारिस बच्ची को फेंकने वाली असली मां के पकड़े जाने से यह साबित हो गया कि विष्णु जी पूरी तरह निर्दोष थे। कोर्ट के डालने पुलिस ने सारे तथ्य रखे और कानून ने विष्णु जी को सम्मान के साथ रिहा कर दिया और झूठा आरोप लगाने वाली महिला को गिरफ्तार करने और मुकदमा चलाने के आदेश दे दिए।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समाज और मोहल्ले के ताने इस हद तक बढ़ चुके थे कि उस मध्यवर्गीय परिवार के लिए वहां एक दिन भी बिताना मुश्किल था। अंततः, वे मोहल्ला और वह शहर हमेशा के लिए छोड़कर जाने को मजबूर हो गए।
उधर, प्रशासनिक नियमों के तहत वह नवजात बच्ची बाल कल्याण समिति के संरक्षण गृह में एक पालने में सुरक्षित पल रही थी। वह अनजान और मासूम बच्ची शायद यह नहीं समझ पा रही थी कि उसके रक्षक कौन थे, लेकिन पालने में लेटे-लेटे उसकी नन्ही आंखें लगातार चारों तरफ ऐसे टकटकी लगाकर देख रही थीं, मानो वह अपने उन नए माता-पिता—विष्णु और आशा—को ही खोज रही हो, जिन्होंने उसे एक नई जिंदगी दी थी।
अंधेरी रात के साये भले ही गहरे थे, पर उस मासूम की टकटकी में भविष्य की किसी अनजानी सुबह की हल्की सी उम्मीद अब भी बाकी थी।

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