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Saturday, October 17, 2026

ममता की डोर

गुवाहाटी के एक छोटे से मोहल्ले लाल गानों बस्ती में अरुणाभ का परिवार रहता था। अरुणाभ एक साधारण प्राइवेट नौकरी करने वाला सीधा-साधा इंसान था, जो दिनभर मेहनत करके शाम को घर लौटता था। उसके घर में उसकी बूढ़ी माँ कमला देवी, पत्नी अनन्या और दो छोटे बच्चे—पाँच साल का अनुज और चार साल की अनुष्का थे।


अनन्या का स्वभाव शुरू से ही बहुत जिद्दी और लड़ने-झगड़ने वाला था। शादी से पहले ही उसके मायके वालों ने भी सबको बता दिया था कि वह बात-बात पर कलेश करती है और इसी वजह से उसकी शादी में बहुत अड़चनें आई थीं। सबको लगा कि शादी के बाद ससुराल में रहेगी तो वह भी ठीक हो जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।


घर की सबसे बड़ी समस्या यह थी अनन्या का अपनी सास के साथ नहीं बनना।  अनन्या को अक्सर इस बात से चिढ़ थी कि सास कमला देवी अपने पोते-पोतियों से बहुत प्यार करती थीं। जब भी वे उन बच्चों को अपने पास बिठाकर कहानियां सुनातीं, या उनके लिए कुछ अच्छा बनाकर खिलातीं, तो अनन्या गुस्सा होकर बच्चों की छोटी मोटी गलतियां निकालने लगती और उन्हें बिना बात के बेरहम होकर  पीटती। वे चार-पाँच साल के मासूम बच्चे अपनी ही माँ की मार से सहम जाते और एक कोने में दुबक कर रोने लगते।

जब अरुणाभ या कमला देवी उसे ऐसा करने से रोकते, तो वह दोनों को बहुत अपमानित करती और कड़वे ताने मारती। बदनामी के डर से दोनों चुपचाप अपना दर्द सहते रहते। अरुणाभ ने कई बार अनन्या के मायके फोन करके शिकायत की, तो उधर से यही जवाब मिलता— "जमाई जी, वह बचपन से ऐसी ही है, हमने भी उससे परेशान होकर ही जल्दी विदा किया था।"

दिन बीतते गए और अत्याचार बढ़ता गया। एक दिन घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ कि क्यों सास कमला देवी ने उससे पूछे बगैर ही बच्चों को अपने साथ पड़ोस में हो रही मनसा पूजा में लेकर गई। अनन्या ने दहेज और घरेलू हिंसा के झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर अरुणाभ को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह अपनी बूढ़ी माँ को घर से निकाल दे और किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आए।

अंदर से पूरी तरह टूट चुका अरुणाभ दुखी होकर अपनी माँ कमला देवी को शहर के बाहर बने 'सत्संग आश्रम' छोड़ने गया। वो मन ही मन रो रहा था। कमला देवी भी आँखों में आँसू लिए बैठी थी। आश्रम वालों के पूछने पर उन्होंने सब कुछ बताया । तो आश्रम वालों ने उसे कानूनी मदद लेने को कहा, लेकिन डिजिटल दुनिया में बदनामी के डर, नौकरी का तनाव, बच्चों की जिम्मेदारी और मानसिक थकान के कारण उसमें लड़ने की हिम्मत नहीं बची थी।

माँ को आश्रम छोड़ने के बाद अरुणाभ का बुरा हाल हो गया। न उसे रात को नींद आती थी और न ही खाने में कुछ अच्छा लगता था। घर में बच्चे भी अपनी दादी को बहुत याद करते थे, पर माँ के डर से कुछ बोल नहीं पाते थे। आखिर एक दिन अरुणाभ से रहा नहीं गया और वह चुपचाप अपनी माँ से मिलने सत्संग आश्रम पहुँच गया।

वहाँ उसने देखा कि बेटा और पोते-पोतियों से दूर रहकर उसकी माँ बहुत कमजोर और दुबली हो गई हैं। अरुणाभ वहीं बैठकर खूब रोया। उस दिन के बाद से उसने एक रास्ता निकाला। वह ऑफिस के काम के बहाने छुप-छुपकर अपनी माँ से मिलने जाता, उनके लिए दवा और खाने का इंतजाम करता, आश्रम में थोड़ी सेवा (श्रमदान) करता और शहर में बाहर थोड़ा बहुत एक्स्ट्रा काम करके जो पैसे मिलते, वे चुपके से अपनी माँ को दे आता। साथ ही, उसने किसी तरह बच्चों को भी बहाने से दादी से मिलवाने का प्लान बना लिया था। 

लेकिन एक दिन अनन्या को इस बात की भनक लग गई। उसने घर में भयंकर तमाशा किया और खुद को ही पीटने लगी ताकि वह पति पर कोई नया इल्जाम लगा सके। पर इस बार किस्मत ने साथ दिया। पड़ोसियों को इस घर के हालात पहले से पता थे, इसलिए वे बीच में आ गए। अरुणाभ ने भी इस बार हिम्मत जुटाई और सबके सामने अपनी पत्नी की सारी सच्चाई बता दी। कुछ पड़ोसियों ने उस झगड़े का वीडियो भी बना लिया।

इसके बाद अरुणाभ ने बिना डरे पहली बार पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज कराई कि कैसे उसकी पत्नी उन सबको मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रही है। अनन्या ने भी थाने जाकर विमेन सेल में पति और सास पर झूठे आरोप लगाए, पर अब अरुणाभ के मन में कोई डर नहीं था। वह अपनी माँ कमला देवी को सम्मान के साथ  घर वापस ले आता है। इस बात पर  अनन्या बहुत झगड़ा करती है लेकिन अरुणाभ नहीं सुनता है। वो भी उस पर चिल्ला कर कहता है -- मेरी मां है, ये घर मेरे मां-बाप का है, तेरा नहीं है। जा जो करना है कर ले लेकिन मैं मेरी मां को घर पर ही रखूंगा। कमला देवी अपने बेटे-बहू के झगड़े से डर जाती है। वे रोने लगती है और बेटे और बहू के बीच बचाव करने की कोशिश करती है। लेकिन कमला अपनी सास को ही गालिया देना शुरू कर देती है। पड़ोसी तमाशबीन होकर ये सब कुछ फोन पर रिकॉर्ड कर लेते हैं। 


वही अनन्या अपने घर से निकल जाती है और मायके जाती है । लेकिन वे लोग उसे घर में घुसने नहीं देते हैं क्योंकि वहां यदि ये रही थी बेकार के झगड़े में उन्हें फंसा देगी। वे उसके इसी झगड़ालू स्वभाव के कारण उसे उसी समय ही घर से निकाल देते हैं। तब वो मायके में जगह न पाने की वजह से वीमेन सेल जाकर संरक्षण मांगती है और उनके संरक्षण गृह  में रहने लगती है।  वहाँ उसका पाला ऐसी महिलाओं से पड़ा जिनकी जिंदगी के संघर्ष बहुत दर्दनाक थे। वहाँ कुछ बुजुर्ग औरतें भी थीं जिन्हें उनके बच्चों ने छोड़ दिया था। क्योंकि उन्होंने भी अपने घर से कलह किया था और अब उनके ही कर्मों का फल है कि वे अब निराश्रित हैं। कानूनी लड़ाई चल रही है और जब तक कोई नतीजा नहीं निकलता है तब तक वे इसी प्रकार बेसहारा रहेंगी। 

दिन बीतने के साथ जब अनन्या ने उन सबकी कहानियाँ सुनीं, तो उसे समझ आया कि उसने अपने ही हाथों अपना हँसता-खेलता घर उजाड़ दिया है। हालांकि अभी भी उसके अंदर थोड़ी अकड़ बची हुई थी।

इधर अरुणाभ अनन्या को तलाक देने का मन बना लेता है। घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना आदि का मुकदमा चलाने की तैयारी होने लगती है। दोनों पक्षों को वकील भी मिलते हैं। लेकिन कानूनी प्रक्रिया में देर होने की संभावना के कारण इसे कोर्ट के बाहर सुलझाने का सुझाव वकील पक्ष देता है। आखिरी  में वीमेन सेल और सत्संग आश्रम के लोगों ने एक मीटिंग रखी, जहाँ अरुणाभ, कमला देवी और अनन्या आमने-सामने थे। वहाँ दोनों पक्षों के वकील भी थे। वही अरुणाभ ने अनन्या के खिलाफ कुछ साक्ष्य भी जुटा लिए थे जिसने वह मोबाइल रिकॉर्डिंग भी थी जो कि लड़ाई वाले दिन एक पड़ोसी ने की थी। सभी सबूत सामने थे परन्तु अनन्या अभी भी अपनी जिद पर अड़ी थी और कह रही थी, "मैंने कुछ गलत नहीं किया, सब मुझे दबाना चाहते थे।"


तभी वहाँ शेल्टर होम की एक बुजुर्ग महिला आगे आती , जिसके खुद के बच्चों ने उसे ठुकरा दिया था। उसने प्यार से अनन्या के सिर पर हाथ रखकर कहा:

"बेटी, जिद और अहंकार इंसान को अकेला कर देता है। मैंने भी यही किया था। झगड़ा करके अपनी सास को भी निकाल दिया था। आज मेरे बेटे ने खुद मुझे निकाल दिया है।ये तेरा पति और तेरी सास हैं, इन्होंने तुझे जेल भेजने के बजाय सुधरने का मौका दिया है। जिस दिन तेरे बच्चे तुझसे नफरत करने लगेंगे, उस दिन तुझे समझ आएगा कि तूने क्या खोया है।"

उन बुजुर्ग महिला की बात सीधे अनन्या के दिल पर लगी। उसे अपने वे छोटे बच्चे याद आ गए जिन्हें वह बेकसूर मारती थी। उसकी आँखें पहली बार सचमुच भर आईं और वह अपनी सास कमला देवी के पैरों में गिरकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसने मान लिया कि उसकी गलत आदतों की वजह से सब कुछ बर्बाद हुआ था।


इसके बाद यह तय हुआ कि अनन्या को सीधे घर नहीं ले जाया जाएगा। उसे कुछ महीने सत्संग आश्रम में रहकर बुजुर्गों की सेवा करनी होगी और अपनी काउंसलिंग करवाएगी और घर की सभी छोटी बड़ी समस्याओं का बिना कलह के समाधान पर जोर दिया जाएगा। अनन्या को अपने क्रोध और अहंकार पर काबू पाना होगा। उसने जो अपने पति, बच्चों और सास पर बिना वजह जुल्म किये है उसके लिए आश्रम में छह महीने श्रमदान करना होगा। उसके बाद ही उसकी रिहाई हो सकती है । वही अरुणाभ ने एक जिम्मेदार पति का फर्ज निभाते हुए अनन्या को एक और मौका देने का फैसला किया और अपने परिवार को संभाला और बच्चों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा।

वही अनन्या अब सत्संग आश्रम में महिला कैदी की सादी वर्दी वाली साड़ी पहनकर श्रमदान कर रही थी। बुजुर्गों के कपड़े धोते हुए वो सोच रही थी कि काश " मैं अपने आप पर थोड़ा सा अंकुश लगा लेती।"

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