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Wednesday, October 28, 2026

रटंती काली का आह्वान

बराक घाटी के श्रीगौरी ग्राम में माघ की ठिठुरती रात थी। कुशियारा नदी से उठते कोहरे ने विश्वंभर के पुश्तैनी घर को चारों ओर से घेर रखा था। आँगन में रखे तुलसी के चबूतरे के पास खड़े होकर विश्वंभर ने आकाश की ओर देखा। उनके मन में बस एक ही प्रार्थना चल रही थी— "हे माँ विमुख कोरियो ना" (हे माँ, इस बार खाली हाथ न लौटाना)।

पिछले कई सालों से विश्वंभर रटंती काली की पूजा करने का मन बना रहे थे। उनके बड़े भाई विश्वजीत जी की भी यही इच्छा थी, मगर वे इसे पूरा नहीं कर सके। शायद किस्मत भी परीक्षा ले रही थी। कभी विश्वंभर के बेटे नीलांजन की बेटी के जन्म के कारण सूतक लग गया, तो कभी किसी सगे-संबंधी के निधन की खबर आ गई। उनकी पत्नी सृजा अक्सर अपनी आँखों को पोंछते हुए कहतीं, "ठाकुर, आमार कपाले की माँ-र पूजा देखा नाई नी?" (क्या मेरे भाग्य में माँ की पूजा देखना नहीं लिखा है?)

इस बार मौका और भी बड़ा था। स्वर्गीय बड़े भाई विश्वजीत की बेटी की शादी तय हुई थी। भाई की मृत्यु के करीब एक साल बाद जाकर यह रिश्ता पक्का हो पाया था। लेकिन कुछ-न-कुछ अड़चन आती ही रहती थी—कभी गहने खो जाते, तो कभी पंडित जी की तबीयत बिगड़ जाती। पूरा परिवार एक अनजाने डर में रहता था।

एक शाम, जब बौ माँ (सुमना) रसोई में चाय बना रही थीं और सृजा और नयनिका संध्या बाती दे रही थी, तभी विश्वंभर को एक पुराने संदूक में कुछ जरूरी कागज़ ढूंढते समय अपने बड़े भाई की एक पुरानी डायरी मिली। उसमें लिखा था— "रटंती काली की रात ही वह शक्ति है, जो हमारे खानदान की बेटियों का रास्ता साफ करती है।" अपने भाई के इन विचारों को पढ़कर वे भावुक हो उठते हैं। उन्होंने तभी  पक्का इरादा कर लिया कि चाहे जो हो जाए, वे इस बार पूजा करके ही रहेंगे। उन्होंने तुरंत घर के सभी सदस्यों को इक्ट्ठा किया और अपने रिश्तेदारों को भी बुलाया और बड़े ही विश्वास के साथ कहा, "एई बार रटंती पूजा होईबो! माँ ना आइले मेये विदाय ओइतो नाय।" (इस बार रटंती पूजा होकर ही रहेगी! माँ के आए बिना बेटी विदा नहीं होगी।) सभी ने उनकी बात सुनकर आश्चर्य प्रकट किया फिर आपसी परामर्श कर वे तैयारियों में जुट गए। मकर संक्रांति के बाद माघ चतुर्दशी की तिथि आने वाली थी, जिसके बाद भतीजी के विवाह का शुभ मुहूर्त निकलना था। इसी माघ चतुर्दशी में रटंती काली पूजा होती है जो कि पूरे बराक घाटी तथा श्रीभूमि समेत अन्य स्थानों में रहने वाले कई बंगाली समुदायों में लोग श्रद्धा से करते हैं।

आखिरकार माघ की चतुर्दशी आई। पूरे श्रीगौरी गाँव में ढोल और ढाक की आवाजें गूँजने लगीं। नीलांजन और नयनिका ने मिलकर पूजा की वेदी तैयार की। बौ माँ ने आँगन को चावल के घोल (पिठुलि) की सुंदर अल्पनाओं से सजा दिया।

रात के दूसरे पहर में जब पूजा शुरू हुई, तो पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। विश्वंभर ने जब 'रटंती काली' का आह्वान किया, तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके बड़े भाई विश्वजीत उनके बगल में ही बैठे हों।

सृजा ने कांपते हाथों से माँ को लाल चुनरी ओढ़ाई।

बौ माँ और नयनिका ने मिलकर 'उलु-ध्वनि' दी। फिर शंख बजाया गया।

नीलांजन ने जब ढाक बजाना शुरू किया, तो लगा जैसे सालों से रुकी हुई सारी मुश्किलें उस आवाज के साथ दूर हो रही हैं।

घर का कोना-कोना माता की भक्ति से भर गया। विश्वंभर समझ गए कि माँ ने उनकी पुकार सुन ली है और अब शादी की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। वे बस ऐसा सोच ही रहे थे कि तभी कोहरे को चीरती हुई लालटेन की एक रोशनी आँगन में दाखिल हुई। वह गाँव के पुराने डाकिया 'हरी काका' थे। वे हांफते हुए आये और विश्वंभर के हाथ में एक पुराना कागज़ थमाया।

"विश्वंभर बाबू! यह आपकी भाभी (स्वर्गीय भाई की पत्नी) ने बरसों पहले बैंक के लॉकर में गहने सुरक्षित रखे थे, जिसके कागज खो गए थे। आज लॉकर के कागजात मुझे  पुराने हेड ऑफिस के कचरे से मिला है। न जाने ये कैसे हुआ? शायद इसके कागज़ वे आपके पास भिजवाना चाहते थे लेकिन डाक की गलती से ये यही रह गया। आपको दिया नहीं गया।" 

विश्वंभर ने कांपते हाथों से कागज़ का पैकेट खोला तो उसमें बैंक के लॉकर में रखे गहनों के काग़ज़ात थे। जो न मिलने पर गहने बैंक से निकाले नहीं जा सकते थे। वही गहनों के खोए जाने की बात भी अफवाह साबित हुई। 

सृजा ने आँखों में आंसू भरकर शंख बजाया और बौ माँ ने 'उलु-ध्वनि' दी। नीलांजन ने जब ढाक पर आखिरी चोट की, तो लगा जैसे सालों से रुका हुआ कोई भारी बोझ घर से उतर गया है। कोई चमत्कार नहीं हुआ था, बस सही समय पर पुरखों की अमानत का मिलना और विपरीत परिस्थितियों में अपनों का साथ आ जाना ही विश्वंभर के लिए 'रटंती काली' का साक्षात् आशीर्वाद था।

सुबह की पहली किरण के साथ जब कोहरा छँटा, तो विश्वंभर के चेहरे पर एक गहरी शांति थी। उन्हें यकीन हो गया कि माँ ने न केवल उनकी पुकार सुनी, बल्कि उनके बड़े भाई का अधूरा वचन भी पूरा कर दिया।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

A13, B Block Jana Jeeva Orchid apartment Hallehalli Survey no 54 Kithagnur Post K R Pura Bangalore-36 

8217797037

Saturday, October 17, 2026

ये कैसा पानी

बिनोता अभी अभी सिलचर शहर जाने के लिए बस अड्डे पर पहुंची ही थी कि उसे पता चला कि बारिश से रास्ता खराब हो चुका है इसलिए शहर जाने वाला रास्ता अभी बंद है।उसका दिल बैठ गया। बड़ी मुश्किल से उसे एक जगह काम मिला था। सिलचर में एक बुजुर्ग दंपति को पूरे दिन की चिरौरी के लिए कोई चाहिए था। काम उस दंपति के बेटे ने लगवाया था जो कि नौकरी के कारण बाहर रहता है। बुजुर्ग दंपति को घर का काम और हाथ बटाने और बूढ़ी महिला को बात चित करके वाला कोई चाहिए था। बिनोता के घर में उसकी तीन बेटियां थी। तीनों सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। पति भी मिस्त्री का काम करते हैं। लेकिन आमदनी अच्छी नहीं थी। घर का किराया बच्चियों की पढ़ाई के खर्चें सभी में ही सारा रुपया खत्म हो जाता था। बिनोता पहले गांव में ही कभी कभी किसी के यहां शादी ब्याह में खाना पकाने और दूसरे काम करने चली जाती थी जिससे थोड़ी आमदनी होने लगी थी। लेकिन अभी बिनोता की बड़ी बेटी को मैट्रिक की परीक्षा देनी थी। ट्यूशन मास्टर बहुत फीस मांगते थे इसलिए पैसों की कमी के चलते उसको ट्यूशन नहीं भेज सकी। परन्तु घर पर रहकर भी अच्छी पढ़ाई के लिए जरूरी चीजें तो चाहिए ही। सो उसी ने अपनी पति से बात की थी कि कही किसी घर में बात कर ले। बिनोता का पति माधव सिलचर में ही जगाई मिस्त्री के साथ उसी दंपति के घर पर ही कुछ काम पर लगा था। उनके घर के दोमंजिले के काम में। दंपति सारा दिन घर के काम खुद को घसीटते हुए करते। उनके खाने पीने का भी समय होता तब भी देर होती। कभी पत्नी बीमार तो कभी पति बीमार। बुजुर्ग दंपति सारा दिन ही किसी प्रकार कराहते हुए काम करते। बेटा और बहु जब जब छुट्टियों में आते तो अच्छी सेवा होती लेकिन नौकरी के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता। एक बेटी थी वो भी कभी कभी मैके आती तो माता पिता की खूब देखभाल करती। लेकिन अब अकेले अकेले उनसे कोई काम नहीं होता। तो बच्चों की सलाह पर ही दूसरी मंजिल बनवाने की सोची कि कही एक किराएदार मिल जाए तो मकान बुजुर्ग दंपति को भी को अकेला न रहना पड़े। बिनोता के पति ने ही उनके बेटे से बात चलाई और बेटे को अपने माता पिता के लिए यह उचित लगा कि कोई साथ होगा तो उन्हें भी चिंता न होगी। बिनोता का काम भी बहुत साधारण सा था। सुबह आकर वो घर के काम के साथ साथ वो बुजुर्गों की दवाई का खयाल रखेगी। जो जो काम उससे कहा जाएगा वो कर देगी। बदले में सुबह की चाय और दोपहर का खाना मिलेगा और तनखा अलग। बिनोता को भी यह काम सही लगा। बुजुर्ग दंपति की सेवा का पुण्य भी मिलेगा और घर में चार पैसे आयेंगे।


लेकिन हाय री किस्मत। जिस दिन काम पर जाने की बात पक्की कर माधव घर लौटा उसी दिन शाम से आंधी पानी ऐसा बरसने लगा कि जैसे वो भगवान अपने क्रोध दिखा रहे हो। वैसे भी बिनोता के गांव सागरपानी में बरसात के दिन नौका चलने का पुराना इतिहास रहा है। इसीलिए इस गांव का नाम सागरपल्ली से बदल कर सागरपानी रख दिया गया था। पर तीन साल पहले ही सरकार ने इसके जैसे सभी अन्य गांव को सिलचर और अन्य सभी राष्ट्रीय सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए रास्ता बनवा दिया था। लेकिन सरकारी तंत्र के काम तो सभी को पता है। ढंग का काम न था। सो बारिश में पहले ही दो गांव के सड़क पहले ही धरती में समा गए। इस बार उनकी बारी थी। उनके गांव से जो सड़क मुख्य राजमार्ग से जुड़ती थी उस रास्ते कई खेत वाले जगह है। हर बार बारिश में पानी सड़क के ऊपर ही बहता है। लेकिन गांव वालों ने सड़क के दोनों और बांस के बाड़े लगा रखे हैं ताकि सड़क और खेत के बीच अंतर रहे लेकिन कुछ बदमाशाें को यह रास न आया और बांस का बेड़ा कई जगहों से उखाड़ डाला। वही सड़क पर बार बार पानी आते रहने से सड़क भी कमज़ोर होने लगा। 


जिस दिन से आंधी पानी बरसने लगा उस दिन से ही सागरपानी वालों के दिल जोर से धड़कने लगे। खेत पहले हो पानी में डूब चुके थे। सड़क भी चली गई तो गांव वालों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। जरूरत का सामान तो पास के बाज़ार से लाया जा सकता है लेकिन बाज़ार तक जाने का यही एक रास्ता है। बरसों से गांव वाले इसी का ही इस्तेमाल करते रहे हैं। सड़क नहीं थी तब भी। लेकिन तब की बात अलग थी क्योंकि तब खेत डूबने पर भी नाँव चलाकर भी काम निकलता था। लेकिन सड़क बनने के बाद अब नाँव नहीं चल सकती। क्योंकि बीच में सड़क आ जाती है। बिनोता इसी सड़क के किनारे अब खड़ी थी। साथ में माधव भी खड़ा था। दोनों अब इसी उलझन में खड़े थे कि अब सिलचर शहर जाय तो जाय कैसे और यदि आज नहीं गए तो कही काम न छूट जाय। दोनों के आंखों में पानी आ रहा था। वही बादल भी अब धीरे धीरे पानी बरसा रहा था। सड़क तो पहले से ही पानी लेकर उनके सामने उपस्थित था।

एक किरण और एक अंतहीन रात



मोहल्ले की तंग गलियों में सुबह का सूरज उतरने से पहले ही विष्णु शंकर राय के घर में चूल्हा जलने की सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी। उस पूरी बस्ती में कायस्थ परिवारों का बाहुल्य था। ऐसे में एकमात्र ब्राह्मण परिवार होने के नाते विष्णु जी और उनकी पत्नी आशा को सामाजिक आदर तो पूरा मिलता, लोग उन्हें इज्जत से 'पंडित जी' कहकर बुलाते, लेकिन इस मुखौटे के पीछे दबी हुई फुसफुसाहटें थीं। कोई उनकी आर्थिक लाचारी पर हंसता, तो कोई उनकी निःसंतानता को लेकर दबी जुबान से तंज कसता।

विष्णु जी सुबह-सवेरे दो-चार घरों में पूजा-पाठ और थोड़ा-बहुत कर्मकांड कराकर बमुश्किल दो पैसे कमा पाते थे। दिन ढलते वे कुछ स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते, जिससे महीने के अंत में घर का किराया और राशन का जुगाड़ हो पाता था। उनकी पत्नी आशा पास के ही एक निजी कॉन्वेंट स्कूल में अध्यापिका थीं। दोनों की शादी को आठ साल बीत चुके थे, लेकिन घर सूना था। आर्थिक तंगी, कर्ज के दबाव और हर पल की अनिश्चितता ने दोनों के भीतर गहरे मानसिक तनाव को जन्म दे दिया था।

एक रविवार की सर्द सुबह में जब विष्णु जी गली के नुक्कड़ पर दूध लेने जा रहे थे, तो उनकी नजर सामने पड़े कूड़े के ढेर पर पड़ी। वहां से किसी नवजात शिशु के रोने की बहुत ही धीमी और क्षीण आवाज आ रही थी। विष्णु जी का दिल दहल उठा। उन्होंने आगे बढ़कर जब गंदे कपड़ों की पोटली हटाई, तो ठंड से ठिठुरती एक नन्ही सी नवजात बच्ची सांसें ले रही थी।

"ईश्वर! यह तुमने क्या परीक्षा ली है?" विष्णु जी की आंखें भर आईं।

जो गोद इतने सालों से सूनी थी, उसमें आज अचानक सृष्टि के उपहार की तरह वह बच्ची आ गिरी थी। वे बिना एक पल गंवाए बच्ची को अपनी छाती से लगाकर भागे-भागे घर आए। आशा ने जब उस फूल सी बच्ची को देखा, तो उसके आंसुओं का बांध टूट गया। दोनों ने मिलकर उस बेसहारा जान को साफ किया, गर्म कपड़े पहनाए और तुरंत प्राथमिक चिकित्सा के लिए नजदीकी अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने राहत की सांस लेते हुए बताया कि समय पर लाने से बच्ची की जान बच गई है।

अभी वे अस्पताल से लौटे ही थे कि उनके घर के बाहर भीड़ जमा हो गई। पास की ही एक झुग्गी बस्ती से एक अनजान महिला रोते-बिलखते हुए वहां पहुंची और विष्णु जी पर चीखते हुए सनसनीखेज आरोप लगाने लगी— "यही हैं वो पंडित! इन्होंने ही मेरा बच्चा चुराया है! ये लोग बांझ हैं, इसलिए इन्होंने मेरी औलाद पर हाथ साफ कर दिया!"

देखते ही देखते बात आग की तरह फैल गई। मोहल्ले के लोग जो पहले पीठ पीछे हंसते थे, वे अब तमाशबीन बन गए। किसी ने तुरंत पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस आई और बिना किसी तहकीकात के विष्णु जी को थाने उठा ले गई।

पुलिस ने जब मामले की तह तक जाने की ठानी, तो असली जाल खुलना शुरू हुआ। पुलिस वास्तविक अपराधी उस युवती को ढूंढने में जुट गई जिसने डर और कलंक के मारे रात के अंधेरे में बच्ची को कूड़े में फेंका था, साथ ही उस झूठा आरोप लगाने वाली महिला की नीयत की भी जांच शुरू हुई। लेकिन इस कानूनी और दस्तावेजी प्रक्रिया, डीएनए मिलान और गवाहों के बयानों में पूरे छः महीने का वक्त बीत गया। इन छः महीनों में विष्णु जी ने बिना किसी दोष के हवालात और जेल की काल कोठरी की हवा खाई।

बाहर आशा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए फर्जी वीडियो और आधे-अधूरे सच के आधार पर स्कूल प्रबंधन ने उस पर लगातार दबाव बनाया, जिससे तंग आकर आशा को खुद अपनी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। वह एक तरफ अपनी गृहस्थी संभालती, तो दूसरी तरफ अपने निर्दोष पति को बेदाग बाहर निकालने के लिए कचहरी और पुलिस थानों के चक्कर काटती रही। समाज ने बिना कुछ जाने उन्हें अपराधी मान लिया था।

छः महीने बाद सच्चाई की जीत हुई। सीसीटीवी फुटेज, डीएनए रिपोर्ट और उस लावारिस बच्ची को फेंकने वाली असली मां के पकड़े जाने से यह साबित हो गया कि विष्णु जी पूरी तरह निर्दोष थे। कोर्ट के डालने पुलिस ने सारे तथ्य रखे और कानून ने विष्णु जी को सम्मान के साथ रिहा कर दिया और झूठा आरोप लगाने वाली महिला को गिरफ्तार करने और मुकदमा चलाने के आदेश दे दिए। 

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समाज और मोहल्ले के ताने इस हद तक बढ़ चुके थे कि उस मध्यवर्गीय परिवार के लिए वहां एक दिन भी बिताना मुश्किल था। अंततः, वे मोहल्ला और वह शहर हमेशा के लिए छोड़कर जाने को मजबूर हो गए।

उधर, प्रशासनिक नियमों के तहत वह नवजात बच्ची बाल कल्याण समिति के संरक्षण गृह में एक पालने में सुरक्षित पल रही थी। वह अनजान और मासूम बच्ची शायद यह नहीं समझ पा रही थी कि उसके रक्षक कौन थे, लेकिन पालने में लेटे-लेटे उसकी नन्ही आंखें लगातार चारों तरफ ऐसे टकटकी लगाकर देख रही थीं, मानो वह अपने उन नए माता-पिता—विष्णु और आशा—को ही खोज रही हो, जिन्होंने उसे एक नई जिंदगी दी थी।

अंधेरी रात के साये भले ही गहरे थे, पर उस मासूम की टकटकी में भविष्य की किसी अनजानी सुबह की हल्की सी उम्मीद अब भी बाकी थी।

ममता की डोर

गुवाहाटी के एक छोटे से मोहल्ले लाल गानों बस्ती में अरुणाभ का परिवार रहता था। अरुणाभ एक साधारण प्राइवेट नौकरी करने वाला सीधा-साधा इंसान था, जो दिनभर मेहनत करके शाम को घर लौटता था। उसके घर में उसकी बूढ़ी माँ कमला देवी, पत्नी अनन्या और दो छोटे बच्चे—पाँच साल का अनुज और चार साल की अनुष्का थे।


अनन्या का स्वभाव शुरू से ही बहुत जिद्दी और लड़ने-झगड़ने वाला था। शादी से पहले ही उसके मायके वालों ने भी सबको बता दिया था कि वह बात-बात पर कलेश करती है और इसी वजह से उसकी शादी में बहुत अड़चनें आई थीं। सबको लगा कि शादी के बाद ससुराल में रहेगी तो वह भी ठीक हो जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।


घर की सबसे बड़ी समस्या यह थी अनन्या का अपनी सास के साथ नहीं बनना।  अनन्या को अक्सर इस बात से चिढ़ थी कि सास कमला देवी अपने पोते-पोतियों से बहुत प्यार करती थीं। जब भी वे उन बच्चों को अपने पास बिठाकर कहानियां सुनातीं, या उनके लिए कुछ अच्छा बनाकर खिलातीं, तो अनन्या गुस्सा होकर बच्चों की छोटी मोटी गलतियां निकालने लगती और उन्हें बिना बात के बेरहम होकर  पीटती। वे चार-पाँच साल के मासूम बच्चे अपनी ही माँ की मार से सहम जाते और एक कोने में दुबक कर रोने लगते।

जब अरुणाभ या कमला देवी उसे ऐसा करने से रोकते, तो वह दोनों को बहुत अपमानित करती और कड़वे ताने मारती। बदनामी के डर से दोनों चुपचाप अपना दर्द सहते रहते। अरुणाभ ने कई बार अनन्या के मायके फोन करके शिकायत की, तो उधर से यही जवाब मिलता— "जमाई जी, वह बचपन से ऐसी ही है, हमने भी उससे परेशान होकर ही जल्दी विदा किया था।"

दिन बीतते गए और अत्याचार बढ़ता गया। एक दिन घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ कि क्यों सास कमला देवी ने उससे पूछे बगैर ही बच्चों को अपने साथ पड़ोस में हो रही मनसा पूजा में लेकर गई। अनन्या ने दहेज और घरेलू हिंसा के झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर अरुणाभ को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह अपनी बूढ़ी माँ को घर से निकाल दे और किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आए।

अंदर से पूरी तरह टूट चुका अरुणाभ दुखी होकर अपनी माँ कमला देवी को शहर के बाहर बने 'सत्संग आश्रम' छोड़ने गया। वो मन ही मन रो रहा था। कमला देवी भी आँखों में आँसू लिए बैठी थी। आश्रम वालों के पूछने पर उन्होंने सब कुछ बताया । तो आश्रम वालों ने उसे कानूनी मदद लेने को कहा, लेकिन डिजिटल दुनिया में बदनामी के डर, नौकरी का तनाव, बच्चों की जिम्मेदारी और मानसिक थकान के कारण उसमें लड़ने की हिम्मत नहीं बची थी।

माँ को आश्रम छोड़ने के बाद अरुणाभ का बुरा हाल हो गया। न उसे रात को नींद आती थी और न ही खाने में कुछ अच्छा लगता था। घर में बच्चे भी अपनी दादी को बहुत याद करते थे, पर माँ के डर से कुछ बोल नहीं पाते थे। आखिर एक दिन अरुणाभ से रहा नहीं गया और वह चुपचाप अपनी माँ से मिलने सत्संग आश्रम पहुँच गया।

वहाँ उसने देखा कि बेटा और पोते-पोतियों से दूर रहकर उसकी माँ बहुत कमजोर और दुबली हो गई हैं। अरुणाभ वहीं बैठकर खूब रोया। उस दिन के बाद से उसने एक रास्ता निकाला। वह ऑफिस के काम के बहाने छुप-छुपकर अपनी माँ से मिलने जाता, उनके लिए दवा और खाने का इंतजाम करता, आश्रम में थोड़ी सेवा (श्रमदान) करता और शहर में बाहर थोड़ा बहुत एक्स्ट्रा काम करके जो पैसे मिलते, वे चुपके से अपनी माँ को दे आता। साथ ही, उसने किसी तरह बच्चों को भी बहाने से दादी से मिलवाने का प्लान बना लिया था। 

लेकिन एक दिन अनन्या को इस बात की भनक लग गई। उसने घर में भयंकर तमाशा किया और खुद को ही पीटने लगी ताकि वह पति पर कोई नया इल्जाम लगा सके। पर इस बार किस्मत ने साथ दिया। पड़ोसियों को इस घर के हालात पहले से पता थे, इसलिए वे बीच में आ गए। अरुणाभ ने भी इस बार हिम्मत जुटाई और सबके सामने अपनी पत्नी की सारी सच्चाई बता दी। कुछ पड़ोसियों ने उस झगड़े का वीडियो भी बना लिया।

इसके बाद अरुणाभ ने बिना डरे पहली बार पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज कराई कि कैसे उसकी पत्नी उन सबको मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रही है। अनन्या ने भी थाने जाकर विमेन सेल में पति और सास पर झूठे आरोप लगाए, पर अब अरुणाभ के मन में कोई डर नहीं था। वह अपनी माँ कमला देवी को सम्मान के साथ  घर वापस ले आता है। इस बात पर  अनन्या बहुत झगड़ा करती है लेकिन अरुणाभ नहीं सुनता है। वो भी उस पर चिल्ला कर कहता है -- मेरी मां है, ये घर मेरे मां-बाप का है, तेरा नहीं है। जा जो करना है कर ले लेकिन मैं मेरी मां को घर पर ही रखूंगा। कमला देवी अपने बेटे-बहू के झगड़े से डर जाती है। वे रोने लगती है और बेटे और बहू के बीच बचाव करने की कोशिश करती है। लेकिन कमला अपनी सास को ही गालिया देना शुरू कर देती है। पड़ोसी तमाशबीन होकर ये सब कुछ फोन पर रिकॉर्ड कर लेते हैं। 


वही अनन्या अपने घर से निकल जाती है और मायके जाती है । लेकिन वे लोग उसे घर में घुसने नहीं देते हैं क्योंकि वहां यदि ये रही थी बेकार के झगड़े में उन्हें फंसा देगी। वे उसके इसी झगड़ालू स्वभाव के कारण उसे उसी समय ही घर से निकाल देते हैं। तब वो मायके में जगह न पाने की वजह से वीमेन सेल जाकर संरक्षण मांगती है और उनके संरक्षण गृह  में रहने लगती है।  वहाँ उसका पाला ऐसी महिलाओं से पड़ा जिनकी जिंदगी के संघर्ष बहुत दर्दनाक थे। वहाँ कुछ बुजुर्ग औरतें भी थीं जिन्हें उनके बच्चों ने छोड़ दिया था। क्योंकि उन्होंने भी अपने घर से कलह किया था और अब उनके ही कर्मों का फल है कि वे अब निराश्रित हैं। कानूनी लड़ाई चल रही है और जब तक कोई नतीजा नहीं निकलता है तब तक वे इसी प्रकार बेसहारा रहेंगी। 

दिन बीतने के साथ जब अनन्या ने उन सबकी कहानियाँ सुनीं, तो उसे समझ आया कि उसने अपने ही हाथों अपना हँसता-खेलता घर उजाड़ दिया है। हालांकि अभी भी उसके अंदर थोड़ी अकड़ बची हुई थी।

इधर अरुणाभ अनन्या को तलाक देने का मन बना लेता है। घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना आदि का मुकदमा चलाने की तैयारी होने लगती है। दोनों पक्षों को वकील भी मिलते हैं। लेकिन कानूनी प्रक्रिया में देर होने की संभावना के कारण इसे कोर्ट के बाहर सुलझाने का सुझाव वकील पक्ष देता है। आखिरी  में वीमेन सेल और सत्संग आश्रम के लोगों ने एक मीटिंग रखी, जहाँ अरुणाभ, कमला देवी और अनन्या आमने-सामने थे। वहाँ दोनों पक्षों के वकील भी थे। वही अरुणाभ ने अनन्या के खिलाफ कुछ साक्ष्य भी जुटा लिए थे जिसने वह मोबाइल रिकॉर्डिंग भी थी जो कि लड़ाई वाले दिन एक पड़ोसी ने की थी। सभी सबूत सामने थे परन्तु अनन्या अभी भी अपनी जिद पर अड़ी थी और कह रही थी, "मैंने कुछ गलत नहीं किया, सब मुझे दबाना चाहते थे।"


तभी वहाँ शेल्टर होम की एक बुजुर्ग महिला आगे आती , जिसके खुद के बच्चों ने उसे ठुकरा दिया था। उसने प्यार से अनन्या के सिर पर हाथ रखकर कहा:

"बेटी, जिद और अहंकार इंसान को अकेला कर देता है। मैंने भी यही किया था। झगड़ा करके अपनी सास को भी निकाल दिया था। आज मेरे बेटे ने खुद मुझे निकाल दिया है।ये तेरा पति और तेरी सास हैं, इन्होंने तुझे जेल भेजने के बजाय सुधरने का मौका दिया है। जिस दिन तेरे बच्चे तुझसे नफरत करने लगेंगे, उस दिन तुझे समझ आएगा कि तूने क्या खोया है।"

उन बुजुर्ग महिला की बात सीधे अनन्या के दिल पर लगी। उसे अपने वे छोटे बच्चे याद आ गए जिन्हें वह बेकसूर मारती थी। उसकी आँखें पहली बार सचमुच भर आईं और वह अपनी सास कमला देवी के पैरों में गिरकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसने मान लिया कि उसकी गलत आदतों की वजह से सब कुछ बर्बाद हुआ था।


इसके बाद यह तय हुआ कि अनन्या को सीधे घर नहीं ले जाया जाएगा। उसे कुछ महीने सत्संग आश्रम में रहकर बुजुर्गों की सेवा करनी होगी और अपनी काउंसलिंग करवाएगी और घर की सभी छोटी बड़ी समस्याओं का बिना कलह के समाधान पर जोर दिया जाएगा। अनन्या को अपने क्रोध और अहंकार पर काबू पाना होगा। उसने जो अपने पति, बच्चों और सास पर बिना वजह जुल्म किये है उसके लिए आश्रम में छह महीने श्रमदान करना होगा। उसके बाद ही उसकी रिहाई हो सकती है । वही अरुणाभ ने एक जिम्मेदार पति का फर्ज निभाते हुए अनन्या को एक और मौका देने का फैसला किया और अपने परिवार को संभाला और बच्चों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा।

वही अनन्या अब सत्संग आश्रम में महिला कैदी की सादी वर्दी वाली साड़ी पहनकर श्रमदान कर रही थी। बुजुर्गों के कपड़े धोते हुए वो सोच रही थी कि काश " मैं अपने आप पर थोड़ा सा अंकुश लगा लेती।"

रटंती काली का आह्वान

बराक घाटी के श्रीगौरी ग्राम में माघ की ठिठुरती रात थी। कुशियारा नदी से उठते कोहरे ने विश्वंभर के पुश्तैनी घर को चारों ओर से घेर रखा था। आँगन...