बराक घाटी के श्रीगौरी ग्राम में माघ की ठिठुरती रात थी। कुशियारा नदी से उठते कोहरे ने विश्वंभर के पुश्तैनी घर को चारों ओर से घेर रखा था। आँगन में रखे तुलसी के चबूतरे के पास खड़े होकर विश्वंभर ने आकाश की ओर देखा। उनके मन में बस एक ही प्रार्थना चल रही थी— "हे माँ विमुख कोरियो ना" (हे माँ, इस बार खाली हाथ न लौटाना)।
पिछले कई सालों से विश्वंभर रटंती काली की पूजा करने का मन बना रहे थे। उनके बड़े भाई विश्वजीत जी की भी यही इच्छा थी, मगर वे इसे पूरा नहीं कर सके। शायद किस्मत भी परीक्षा ले रही थी। कभी विश्वंभर के बेटे नीलांजन की बेटी के जन्म के कारण सूतक लग गया, तो कभी किसी सगे-संबंधी के निधन की खबर आ गई। उनकी पत्नी सृजा अक्सर अपनी आँखों को पोंछते हुए कहतीं, "ठाकुर, आमार कपाले की माँ-र पूजा देखा नाई नी?" (क्या मेरे भाग्य में माँ की पूजा देखना नहीं लिखा है?)
इस बार मौका और भी बड़ा था। स्वर्गीय बड़े भाई विश्वजीत की बेटी की शादी तय हुई थी। भाई की मृत्यु के करीब एक साल बाद जाकर यह रिश्ता पक्का हो पाया था। लेकिन कुछ-न-कुछ अड़चन आती ही रहती थी—कभी गहने खो जाते, तो कभी पंडित जी की तबीयत बिगड़ जाती। पूरा परिवार एक अनजाने डर में रहता था।
एक शाम, जब बौ माँ (सुमना) रसोई में चाय बना रही थीं और सृजा और नयनिका संध्या बाती दे रही थी, तभी विश्वंभर को एक पुराने संदूक में कुछ जरूरी कागज़ ढूंढते समय अपने बड़े भाई की एक पुरानी डायरी मिली। उसमें लिखा था— "रटंती काली की रात ही वह शक्ति है, जो हमारे खानदान की बेटियों का रास्ता साफ करती है।" अपने भाई के इन विचारों को पढ़कर वे भावुक हो उठते हैं। उन्होंने तभी पक्का इरादा कर लिया कि चाहे जो हो जाए, वे इस बार पूजा करके ही रहेंगे। उन्होंने तुरंत घर के सभी सदस्यों को इक्ट्ठा किया और अपने रिश्तेदारों को भी बुलाया और बड़े ही विश्वास के साथ कहा, "एई बार रटंती पूजा होईबो! माँ ना आइले मेये विदाय ओइतो नाय।" (इस बार रटंती पूजा होकर ही रहेगी! माँ के आए बिना बेटी विदा नहीं होगी।) सभी ने उनकी बात सुनकर आश्चर्य प्रकट किया फिर आपसी परामर्श कर वे तैयारियों में जुट गए। मकर संक्रांति के बाद माघ चतुर्दशी की तिथि आने वाली थी, जिसके बाद भतीजी के विवाह का शुभ मुहूर्त निकलना था। इसी माघ चतुर्दशी में रटंती काली पूजा होती है जो कि पूरे बराक घाटी तथा श्रीभूमि समेत अन्य स्थानों में रहने वाले कई बंगाली समुदायों में लोग श्रद्धा से करते हैं।
आखिरकार माघ की चतुर्दशी आई। पूरे श्रीगौरी गाँव में ढोल और ढाक की आवाजें गूँजने लगीं। नीलांजन और नयनिका ने मिलकर पूजा की वेदी तैयार की। बौ माँ ने आँगन को चावल के घोल (पिठुलि) की सुंदर अल्पनाओं से सजा दिया।
रात के दूसरे पहर में जब पूजा शुरू हुई, तो पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। विश्वंभर ने जब 'रटंती काली' का आह्वान किया, तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके बड़े भाई विश्वजीत उनके बगल में ही बैठे हों।
सृजा ने कांपते हाथों से माँ को लाल चुनरी ओढ़ाई।
बौ माँ और नयनिका ने मिलकर 'उलु-ध्वनि' दी। फिर शंख बजाया गया।
नीलांजन ने जब ढाक बजाना शुरू किया, तो लगा जैसे सालों से रुकी हुई सारी मुश्किलें उस आवाज के साथ दूर हो रही हैं।
घर का कोना-कोना माता की भक्ति से भर गया। विश्वंभर समझ गए कि माँ ने उनकी पुकार सुन ली है और अब शादी की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। वे बस ऐसा सोच ही रहे थे कि तभी कोहरे को चीरती हुई लालटेन की एक रोशनी आँगन में दाखिल हुई। वह गाँव के पुराने डाकिया 'हरी काका' थे। वे हांफते हुए आये और विश्वंभर के हाथ में एक पुराना कागज़ थमाया।
"विश्वंभर बाबू! यह आपकी भाभी (स्वर्गीय भाई की पत्नी) ने बरसों पहले बैंक के लॉकर में गहने सुरक्षित रखे थे, जिसके कागज खो गए थे। आज लॉकर के कागजात मुझे पुराने हेड ऑफिस के कचरे से मिला है। न जाने ये कैसे हुआ? शायद इसके कागज़ वे आपके पास भिजवाना चाहते थे लेकिन डाक की गलती से ये यही रह गया। आपको दिया नहीं गया।"
विश्वंभर ने कांपते हाथों से कागज़ का पैकेट खोला तो उसमें बैंक के लॉकर में रखे गहनों के काग़ज़ात थे। जो न मिलने पर गहने बैंक से निकाले नहीं जा सकते थे। वही गहनों के खोए जाने की बात भी अफवाह साबित हुई।
सृजा ने आँखों में आंसू भरकर शंख बजाया और बौ माँ ने 'उलु-ध्वनि' दी। नीलांजन ने जब ढाक पर आखिरी चोट की, तो लगा जैसे सालों से रुका हुआ कोई भारी बोझ घर से उतर गया है। कोई चमत्कार नहीं हुआ था, बस सही समय पर पुरखों की अमानत का मिलना और विपरीत परिस्थितियों में अपनों का साथ आ जाना ही विश्वंभर के लिए 'रटंती काली' का साक्षात् आशीर्वाद था।
सुबह की पहली किरण के साथ जब कोहरा छँटा, तो विश्वंभर के चेहरे पर एक गहरी शांति थी। उन्हें यकीन हो गया कि माँ ने न केवल उनकी पुकार सुनी, बल्कि उनके बड़े भाई का अधूरा वचन भी पूरा कर दिया।
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
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