बिनोता अभी अभी सिलचर शहर जाने के लिए बस अड्डे पर पहुंची ही थी कि उसे पता चला कि बारिश से रास्ता खराब हो चुका है इसलिए शहर जाने वाला रास्ता अभी बंद है।उसका दिल बैठ गया। बड़ी मुश्किल से उसे एक जगह काम मिला था। सिलचर में एक बुजुर्ग दंपति को पूरे दिन की चिरौरी के लिए कोई चाहिए था। काम उस दंपति के बेटे ने लगवाया था जो कि नौकरी के कारण बाहर रहता है। बुजुर्ग दंपति को घर का काम और हाथ बटाने और बूढ़ी महिला को बात चित करके वाला कोई चाहिए था। बिनोता के घर में उसकी तीन बेटियां थी। तीनों सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। पति भी मिस्त्री का काम करते हैं। लेकिन आमदनी अच्छी नहीं थी। घर का किराया बच्चियों की पढ़ाई के खर्चें सभी में ही सारा रुपया खत्म हो जाता था। बिनोता पहले गांव में ही कभी कभी किसी के यहां शादी ब्याह में खाना पकाने और दूसरे काम करने चली जाती थी जिससे थोड़ी आमदनी होने लगी थी। लेकिन अभी बिनोता की बड़ी बेटी को मैट्रिक की परीक्षा देनी थी। ट्यूशन मास्टर बहुत फीस मांगते थे इसलिए पैसों की कमी के चलते उसको ट्यूशन नहीं भेज सकी। परन्तु घर पर रहकर भी अच्छी पढ़ाई के लिए जरूरी चीजें तो चाहिए ही। सो उसी ने अपनी पति से बात की थी कि कही किसी घर में बात कर ले। बिनोता का पति माधव सिलचर में ही जगाई मिस्त्री के साथ उसी दंपति के घर पर ही कुछ काम पर लगा था। उनके घर के दोमंजिले के काम में। दंपति सारा दिन घर के काम खुद को घसीटते हुए करते। उनके खाने पीने का भी समय होता तब भी देर होती। कभी पत्नी बीमार तो कभी पति बीमार। बुजुर्ग दंपति सारा दिन ही किसी प्रकार कराहते हुए काम करते। बेटा और बहु जब जब छुट्टियों में आते तो अच्छी सेवा होती लेकिन नौकरी के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता। एक बेटी थी वो भी कभी कभी मैके आती तो माता पिता की खूब देखभाल करती। लेकिन अब अकेले अकेले उनसे कोई काम नहीं होता। तो बच्चों की सलाह पर ही दूसरी मंजिल बनवाने की सोची कि कही एक किराएदार मिल जाए तो मकान बुजुर्ग दंपति को भी को अकेला न रहना पड़े। बिनोता के पति ने ही उनके बेटे से बात चलाई और बेटे को अपने माता पिता के लिए यह उचित लगा कि कोई साथ होगा तो उन्हें भी चिंता न होगी। बिनोता का काम भी बहुत साधारण सा था। सुबह आकर वो घर के काम के साथ साथ वो बुजुर्गों की दवाई का खयाल रखेगी। जो जो काम उससे कहा जाएगा वो कर देगी। बदले में सुबह की चाय और दोपहर का खाना मिलेगा और तनखा अलग। बिनोता को भी यह काम सही लगा। बुजुर्ग दंपति की सेवा का पुण्य भी मिलेगा और घर में चार पैसे आयेंगे।
लेकिन हाय री किस्मत। जिस दिन काम पर जाने की बात पक्की कर माधव घर लौटा उसी दिन शाम से आंधी पानी ऐसा बरसने लगा कि जैसे वो भगवान अपने क्रोध दिखा रहे हो। वैसे भी बिनोता के गांव सागरपानी में बरसात के दिन नौका चलने का पुराना इतिहास रहा है। इसीलिए इस गांव का नाम सागरपल्ली से बदल कर सागरपानी रख दिया गया था। पर तीन साल पहले ही सरकार ने इसके जैसे सभी अन्य गांव को सिलचर और अन्य सभी राष्ट्रीय सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए रास्ता बनवा दिया था। लेकिन सरकारी तंत्र के काम तो सभी को पता है। ढंग का काम न था। सो बारिश में पहले ही दो गांव के सड़क पहले ही धरती में समा गए। इस बार उनकी बारी थी। उनके गांव से जो सड़क मुख्य राजमार्ग से जुड़ती थी उस रास्ते कई खेत वाले जगह है। हर बार बारिश में पानी सड़क के ऊपर ही बहता है। लेकिन गांव वालों ने सड़क के दोनों और बांस के बाड़े लगा रखे हैं ताकि सड़क और खेत के बीच अंतर रहे लेकिन कुछ बदमाशाें को यह रास न आया और बांस का बेड़ा कई जगहों से उखाड़ डाला। वही सड़क पर बार बार पानी आते रहने से सड़क भी कमज़ोर होने लगा।
जिस दिन से आंधी पानी बरसने लगा उस दिन से ही सागरपानी वालों के दिल जोर से धड़कने लगे। खेत पहले हो पानी में डूब चुके थे। सड़क भी चली गई तो गांव वालों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। जरूरत का सामान तो पास के बाज़ार से लाया जा सकता है लेकिन बाज़ार तक जाने का यही एक रास्ता है। बरसों से गांव वाले इसी का ही इस्तेमाल करते रहे हैं। सड़क नहीं थी तब भी। लेकिन तब की बात अलग थी क्योंकि तब खेत डूबने पर भी नाँव चलाकर भी काम निकलता था। लेकिन सड़क बनने के बाद अब नाँव नहीं चल सकती। क्योंकि बीच में सड़क आ जाती है। बिनोता इसी सड़क के किनारे अब खड़ी थी। साथ में माधव भी खड़ा था। दोनों अब इसी उलझन में खड़े थे कि अब सिलचर शहर जाय तो जाय कैसे और यदि आज नहीं गए तो कही काम न छूट जाय। दोनों के आंखों में पानी आ रहा था। वही बादल भी अब धीरे धीरे पानी बरसा रहा था। सड़क तो पहले से ही पानी लेकर उनके सामने उपस्थित था।

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