लोग कहते हैं—काली अँधेरी रात बीत जाएगी,
सुबह की पहली किरण के साथ खुशियाँ आएगी।
अँधेरी रात शायद किसी को पसंद नहीं आती,
मगर यह रात मुझे बहुत है भाती।
यह घुप घनेरी रातें, परिंदों को भी सुहाती हैं,
नए जीवन की तैयारी और विश्राम लाती हैं।
यही काली रातें प्रकृति को सृजन का मौका देती हैं,
थकी हुई सृष्टि को सुकून का झोंका देती हैं।
यह अँधेरी रातें उन्हीं को रास आती हैं,
जिनकी आँखें सितारों को तलाश पाती हैं।
सुकून की चादर बनकर आती हैं यह रातें,
चुपके से मिलने वालों के लिए सौगात हैं यह रातें।
यह रातें उनके लिए, जो रजाई में सिमट सपने देखते हैं,
उन शरारती बच्चों के लिए, जो पढ़ाई का बोझ फेंकते हैं।
यह रातें उन माँओं के लिए, जो थककर चूर सोती हैं,
अँधेरे की गोद में ही सच्ची शांति की बीज बोती हैं।
मगर आज हर गली-मोहल्ला, कृत्रिम रोशनी से चकाचौंध है,
इस बनावटी उजाले में, कुदरत की हर धड़कन मौन है।
टिमटिमाते खूबसूरत तारे इस नकली चमक में खो गए,
चाँदनी भी फीकी पड़ गई, जैसे सब जुगनू सो गए।
सृजन, सुकून और शांति को निगल रही यह बनावटी रोशनी,
सहवास और सहजता को कुचल रही यह दिखावटी रोशनी।
अब बताओ—अँधेरी रातें चाहिए या ऐसी रोशनी?
रोशनी चाँद की हो या सूरज की—भली लगती है,
रोशनी दीये की हो या मोमबत्ती की—भली लगती है।
ढेबरी की रोशनी हो या अलाव की, फिर भी कोई अर्थ है,
मशाल की हो या जलते वन की, फिर भी कोई अर्थ है।
मगर इस कृत्रिम प्रकाश का कोई सार नहीं,
इस बनावटी उजाले में जीवन का आधार नहीं।
इससे तो भली वह घनेरी अँधेरी रातें ही हैं,
जिनमें प्रकृति की सच्ची और पावन बातें ही हैं।
अब तुम ही कहो, तुम्हें क्या चाहिए—
अँधेरी रातें या यह अर्थहीन रोशनी?

