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Monday, December 29, 2025

अनोखी एकादशी

 


 


​शम्पा ने अभी-अभी घर के बाहर झाड़ू लगाया था। कूड़ा-कचरा एक डिब्बे में भरकर, वह उसे गेट के बाहर रखकर घर में मुड़ी ही थी कि एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति तेज़ी से आया और कूड़े के पास रुक गया। वह डिब्बे को टटोलने लगा और उसमें से कोई आधी रोटी का सूखा टुकड़ा निकालकर खाने लगा।

​आज एकादशी थी, इसलिए शम्पा ने घर की साफ़-सफ़ाई कर कूड़ा बाहर रखा था। आज रसोई में कुछ नहीं पकना था। वह केवल नारियल पानी पीकर दिन भर काम चलाएगी, और शाम को थोड़े से मीठे आलू उबालकर सेंधा नमक के साथ खाएगी।

​शम्पा विधवा थी, और अकेली भी। शादी के बाद घर सास-ससुर और पति से भरा-पूरा था। शम्पा का एक बेटा भी हुआ था, मगर वह सात साल का होते-न-होते ही दुनिया छोड़कर चला गया। उसी सदमे में ससुर जी भी गुज़र गए। लोगों ने कहा कि यह सब लड़के की मृत्यु में त्रिपाद दोष के कारण हुआ है। परिवार आधुनिक विचारों वाला था, इसलिए इस दोष का कोई निवारण नहीं किया गया। फिर क्या हुआ, सास, ससुर और फिर पति—तीनों की मृत्यु हो गई। पड़ोसियों के बार-बार कहने पर शम्पा ने पुरोहित को बुलाकर सभी का अंतिम संस्कार पूरा करवाया  तथा दोष का भी निवारण करवाया और तब से विधवाओं के सारे नियमों का पालन करने लगी।

​शम्पा की नज़र जब गेट पर पड़ी, तो वह 'हट! हट!' कहकर आगे बढ़ी। उसने देखा कि वह व्यक्ति, जो कचरा उठाकर खा रहा था, उसे देखकर दाँत निकालकर हँस रहा था। शम्पा को बहुत बुरा लगा। उसने उसे डाँटकर भगा दिया। बेचारा दुःखी और उदास चेहरा लिए, धीरे-धीरे चला गया। उसके जाने के बाद शम्पा ने कूड़े के डिब्बे को अच्छी तरह बंद किया, माथे पर शिकन लाते हुए घर के अंदर चली गई।

​नहा-धोकर उसने पूजा घर में बैठकर ध्यान और पूजा की। फिर घर के दूसरे कामों में लग गई। आज उसे श्यामानंद आश्रम भी जाना था, जहाँ कीर्तन होने वाला था। घर की इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद, उसका मन भगवान की भक्ति में लगना लाज़मी था। साथ ही, मायके वालों का भी दबाव था। वे सभी ठाकुर भक्त थे, इसलिए शम्पा को उनकी बात माननी ही थी, वरना वे उससे किनारा कर लेते।

​शाम को जब शम्पा आश्रम जाने लगी, तो रास्ते में वही पागल दिखा। वह उसके घर से दो घर आगे, एक नाले के किनारे, बिजली के खंभे से सटकर बैठा था और ठंड से काँप रहा था। शाम के अँधेरे में शम्पा को पता नहीं चला कि उसे अभी-अभी किसी ने गुस्से में पानी से भिगोकर सज़ा दी है। शम्पा उसे देखकर थोड़ी देर रुकी, फिर वहाँ से आश्रम की ओर चली गई।

​आश्रम में भजन चल रहा था, लेकिन शम्पा का मन आज नहीं लग रहा था। उसे बार-बार वह पागल याद आ रहा था। सुबह उसे देखकर जो बातें उसने महसूस की थीं, वे सब तस्वीर की तरह उसके मन में उतर गई थीं। बेचारा अधेड़ उम्र का था, लेकिन गरीबी, भूख और तकलीफ़ों ने उसके शरीर का सारा तेज छीन लिया था। न जाने वह कब से घर से बिछड़ा होगा। उसके कपड़ों में इतनी धूल और गंदगी थी कि पास जाने पर बदबू से उल्टी आ जाए। सिर के बाल उलझे हुए थे और मैल से आधे सफ़ेद हो चुके थे। लेकिन चेहरा देखने पर एक मासूमियत झलकती थी। दाढ़ी के बीच भी जैसे कोई छोटा बच्चा झाँक रहा हो, ऐसा लगता। शम्पा को समझते देर नहीं लगी कि बेचारा मानसिक रूप से बीमार होगा, और घर वालों ने ही उसे छोड़ दिया होगा।

​शम्पा से ज़्यादा देर कीर्तन में बैठा नहीं गया। वह घर के लिए निकल पड़ी। गली में जब पहुँची, तो देखा कि वह पागल वहीं बैठा था और ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। उसे देखकर शम्पा की भी आँखों में आँसू आ गए। हिम्मत करके वह उसके पास गई और पूछा कि वह कौन है और क्यों रो रहा है। वह दुःख से हकलाने लगा और बस इतना बोला:

​“ऊऊऊ... मुझे मारा! आंटी ने मारा! खाना भी नहीं दिया... मैं... मैं...”


​शम्पा उसकी पूरी बात नहीं समझ पाई। तब शम्पा ने उसे खाना देने की बात कही। यह सुनकर वह पागल ऐसे देखता है, जैसे कोई मासूम बच्चा हो। शम्पा ने उसे अपने पीछे आने को कहा। वह डरा-सहमा-सा उसके पीछे आया। शम्पा ने उसे घर के गेट के अंदर एक कोने में बैठने का इशारा किया और भीतर चली गई।

​एकादशी का व्रत होने के बावजूद, शम्पा ने आज दाल-चावल की खिचड़ी बना दी और कुछ आलू की सब्ज़ी भी तल दी। एक पुरानी थाली में खाना परोसकर, वह उसके सामने ले गई। खाना देखते ही वह पागल इतना बेताब हो गया कि झपटकर शम्पा के हाथ से थाली ले ली और खाने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, गरम खिचड़ी से उसका हाथ जल गया। गुस्से में आकर वह थाली फेंकने वाला था कि शम्पा ने डाँटकर उसे रोक दिया। पागल सहम गया। शम्पा ने उसे थाली ज़मीन पर रखकर, किनारे से खाने को कहा। इस पर वह दोबारा न समझते हुए, किनारे से बड़ा निवाला लेता है। इस बार उसके मुँह में गरम खिचड़ी गई, जिससे उसकी जीभ जल गई और वह रोने लगा।

​शम्पा का धैर्य टूट गया। वह न चाहते हुए भी, अब अपने हाथों से उस बेचारे को खाना खिलाना शुरू करती है। इस बार वह पागल शम्पा के हाथों से खाना खाकर, एक मासूम बच्चे की तरह शांत हो जाता है।

​पास वाले घर के पाल बाबू तब तक यह तमाशा देख रहे थे। जल्द ही यह बात आग की तरह कॉलोनी में फैल गई। लोग एक-एक कर शम्पा के घर के सामने जमा हो गए।

​पाल बाबू ने शम्पा की तरफ़ ताने मारते हुए कहा,

​“ऐसे तो बड़े धार्मिक बनते हो, आचार-विचार का बड़ा दिखावा करते हो, लेकिन यह ग़लत काम कब से शुरू कर दिया?”


​शम्पा को उनकी बात साफ़ समझ नहीं आई। उसने पूछा,

​“किसने ग़लत काम किया है काका? और क्या किया है? क्या आप मुझे सुना रहे हैं?”


​पाल बाबू गुस्से में बोले,

​“अरे अपशगुनी! पूरे परिवार को खा गई! अब यह क्या नया ड्रामा है? इस पागल को घर में क्यों घुसा लाई?”


​शम्पा को बात समझते देर न लगी। उसने पलटकर कहा,

​“आप कौन होते हैं यह तय करने वाले कि मेरे घर में क्या चल रहा है? क्या मैं जो भी करूँ, उसकी सफ़ाई आपको दूँगी? क्या आँखों से नहीं दिखता कि यह यहाँ खाना खा रहा है? बेचारा भूखा था और ठंड से काँप रहा था, तो मैंने उसे खाना दिया! क्या मैंने पाप किया?”


​इस पर पाल बाबू और भड़क गए और बोले,

​“तेरी हिम्मत कैसे हुई! मैं तुझे इस कॉलोनी में रहने नहीं दूँगा! अभी तुझे बाहर करवाता हूँ!”


​पाल बाबू की यह सब बातें कॉलोनी के दूसरे लोग भी सुन रहे थे। उन्हें पाल बाबू पर गुस्सा आया। कुछ लोग शम्पा की तरफ़ से, तो कुछ पाल बाबू की तरफ़ से बहस करने लगे। इस लड़ाई-झगड़े के कारण वह बेचारा पागल ठीक से खाना भी नहीं खा पाया। पाल बाबू उसे लात मारने की कोशिश करते हैं कि तभी शम्पा सामने आकर उन्हें रोकते हुए कहती है,

​“बहुत हो गया! यह मेरा घर है, मेरे पति का। इस घर की मालकिन मैं हूँ। मैं न तो आप लोगों का दिया खाती हूँ, न पहनती हूँ। एक इंसान होने के नाते मैंने इस बेचारे को खाना खिलाया, उस पर आप लोगों को इसलिए आपत्ति है, क्योंकि मैं विधवा हूँ और जवान हूँ? याद रखिए, मैं एक बच्चे की माँ भी थी। यह बेचारा भी मानसिक रूप से कमज़ोर, एक छोटे बच्चे जैसा ही है। मुझे लगा कि इसे भोजन और सहारा चाहिए, सो मैंने दिया। कोई पाप नहीं किया। आगे भी इसकी ऐसे ही मदद करूँगी।”


​शम्पा की बात सुनकर बाकी लोगों को भी उसमें सच्चाई दिखी, सो उन्होंने भी उसका समर्थन किया। पाल बाबू लड़ाई में हार गए और शम्पा को बदनाम करने की धमकी देकर वहाँ से चले गए।

​लेकिन शम्पा अपनी बात पर अडिग रही। शायद उसे अब अपने अकेले जीवन में एक मक़सद मिल चुका था। उसने उस पागल की सेवा करके ही, आगे ऐसे लाचार लोगों के जीवन में कुछ अच्छा करने के विचार को ही अपना लक्ष्य बनाने की ठान ली थी।


​डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

 के आर पूरा बंगलुरू 36 

8217797037

Sunday, December 28, 2025

भगवान के अनेक रूप--डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती



बात 1980 के दशक की है।

इंफाल, मणिपुर का एक मनमोहक शहर, अपनी प्राकृतिक संपदा को लिए भरा-पूरा था। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों, घने जंगलों, और विविध प्रजातियों के फूलों से सजा यह शहर, टीक और ओक जैसे विशाल वृक्षों से घिरा अपनी सुंदरता पर इठलाता था। लेकिन यह शहर जितना प्राकृतिक रूप से सुंदर था, उतना ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण भी। सरकारी दफ्तरों के साथ-साथ, असम राइफल्स की बटालियन का विशाल कैम्पस भी इसी शहर में मौजूद था। यहाँ हर तरफ सुरक्षा के कड़े पहरे थे, जो शहर की शांत सुंदरता के नीचे दबे एक अदृश्य तनाव का संकेत देते थे।

यहीं पर, इसी सैन्य छावनी के भीतर, तुतुल और उसका परिवार रहता था। तुतुल के पिता असम राइफल्स के स्कूल में शिक्षक थे। तुतुल स्वयं इंफाल के सेंट्रल स्कूल में पढ़ने जाया करती थी। कैम्पस के लगभग सभी बच्चे उसी सेंट्रल स्कूल में पढ़ने जाते थे।

तुतुल मात्र पाँच साल की थी और अभी प्राथमिक कक्षा में ही पढ़ती थी। उसकी माँ, रुनु देवी, उसे अपने पड़ोसी के समझदार और उम्र में बड़े बेटे, चेतन, के साथ स्कूल भेजा करती थीं। तुतुल असम राइफल्स की ओर से मिली बस से ही आना-जाना करती थी। तुतुल का स्वभाव थोड़ा निराला था: उसकी माँ खाने में उसे कुछ भी देती, तो वह झट से अपने सहपाठियों में बाँट देती और उनके टिफिन से खाकर आती थी। सुबह माँ जितनी मेहनत से उसे साफ-सुथरा, एक अनुशासित बच्ची की तरह तैयार कर भेजती, शाम को तुतुल स्कूल से वापस आते समय धूल और मिट्टी में सनी हुई आती। बगल वाले दक्षिण भारतीय अय्ययर जी अपने विशेष लहजे में कहते थे, "जाने के टाइम तो मास्टर जी की बेटी लगती है, आने के टाइम तो भिखारी की बच्ची लगती है अय्यो!" तुतुल यह सुनकर बस हँसती रहती। उसकी माँ और पिताजी भी हँसते थे, क्योंकि वे जानते थे कि तुतुल को सुधारना 'पत्थर में से तेल निकालने' के बराबर है।

स्कूल के पास लगे जंगल की तरफ़ जो फेंसिंग थी, तुतुल अक्सर वहाँ पहुँच जाती और सुंदरबन के फूल तथा रंग-बिरंगे पत्थर उठा लाती। बेचारी माँ को रोज़ उसके कपड़े धोकर सुखाने पड़ते और रोज़ ही उसका स्कूल बैग साफ़ करना पड़ता। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मिट्टी और अपने खिलौनों से खेलने बाहर चली जाती। कैम्पस के चिल्ड्रन पार्क से उसे बहुत मनाकर लाना पड़ता था; वरना उसके लिए तो इधर-उधर खेलना और भटकते रहना ही ज़्यादा अच्छा लगता था।और इसी मनमानी का खामियाजा एक दिन उस बेचारी नन्हीं बच्ची को भुगतना पड़ा।

उस दिन शिक्षक दिवस था, जिसके कारण स्कूल में केवल आधे दिन की छुट्टी घोषित की गई थी। स्कूल जाते समय, उसकी माँ ने उसे सख़्त हिदायत दी थी कि छुट्टी होते ही इधर-उधर भटकना नहीं, सीधे बस से घर चली आना। स्कूल में शिक्षक दिवस मनाया गया। फिर बच्चों को लड्डू देकर वापस भेज दिया गया।

तुतुल स्कूल से निकलकर गेट के सामने पहुँची। वहाँ उसकी नज़र अपने एक सहपाठी पर पड़ी जो बड़े चाव से आइसक्रीम खा रहा था। बेचारी नन्हीं बच्ची आइसक्रीम देखकर वहीं रुक गई और आइसक्रीम वाले से एक आइसक्रीम मांग ली। वह उसे खाने में इतनी मशगूल हो गई कि पड़ोसी का चेतन, जो तुतुल को लेने आया था, उसे आवाज़ देता रहा, पर वह उसकी बात सुन ही नहीं पाई। चेतन भी उसे बुला-बुलाकर थक गया और यह मानकर कि तुतुल उसके पीछे आ रही होगी, वहाँ से चला गया। जब तुतुल ने आइसक्रीम खाकर आँखें उठाईं, तो देखा—उसकी बस जा चुकी थी। वह बस को रोकने के लिए पीछे दौड़ी, लेकिन इतनी नन्हीं बच्ची की पुकार कौन सुनता? पलक झपकते ही बस ओझल हो गई, और तुतुल वहीं सड़क किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।

कहते हैं, जब भगवान किसी को बचाना चाहते हैं, तो वह किसी-न-किसी रूप में आकर उसकी सहायता करते हैं। और आज तुतुल को भगवान के दो रूप देखने को मिले।

जब तुतुल रो रही थी, तो उसकी चीखें सुनकर एक भद्र पुरुष उसके पास पहुँचे। उन्होंने ममता भरे स्वर में बांग्ला भाषा में उससे पूछा। तुतुल ने रोते-रोते अपने बारे में बताया। यह सुनकर, वह सज्जन व्यक्ति बच्ची को घर पहुँचाने के लिए आसपास रिक्शा ढूँढ़ने लगे। उन दिनों मंत्रिपूखरी में तीन पहियों वाला रिक्शा बहुत चलता था और मणिपुरी लोग इसका ख़ूब इस्तेमाल करते थे—कोई व्यवसाय के लिए तो कोई सवारी के लिए।

तभी उन्हें एक रिक्शावाला मिल गया। उस सज्जन व्यक्ति ने रिक्शावाले को पूरी बात समझाकर तुतुल को उस पर बिठा दिया। रिक्शावाला तुतुल को असम राइफल्स के कैम्पस ले जाने के लिए तैयार हो गया।

उन दिनों वैसे भी मणिपुर में उग्रवादियों का बहुत उपद्रव था। इसी कारण पूरे पूर्वोत्तर राज्यों में सेना का कड़ा पहरा और शासन था। इस तनावपूर्ण माहौल में कोई भी सेना से पंगा लेना नहीं चाहता था। ऐसे में, यदि सेना की छावनी से कोई बच्ची लापता हो जाती, तो न जाने क्या हो जाता! इसलिए वह रिक्शावाला, असम राइफल्स के ठिकानों को पहचानते हुए, तुतुल को लेकर एक जोखिम भरी यात्रा पर निकल पड़ा।

इधर, जब स्कूल से बाकी बच्चे लौट आए और तुतुल दिखाई नहीं दी, तो उसके माता-पिता परेशान हो गए। पहले तो उन्हें लगा कि शायद सभी बच्चों की छुट्टी नहीं हुई होगी, लेकिन जब देर होने लगी, तो उनके मन में अनजानी आशंकाएँ घर करने लगीं। उन्हें तुतुल के साथ हुई घटना का कोई अंदाज़ा नहीं था।

उधर, वह मणिपुरी रिक्शावाला तुतुल को लेकर पहले एक पुराने असम राइफल्स कैम्पस के सामने पहुँचा, लेकिन तुतुल ने कहा कि वह यहाँ नहीं रहती। रिक्शावाला बिना घबराए, उसे लेकर दोबारा नए और सही असम राइफल्स कैम्पस की तलाश करने लगा। आख़िरकार, वे लोग सही ठिकाने तक पहुँच गए।

तुतुल के घर के बगल वाले क्वार्टर में उसके पिता के एक मणिपुरी सहकर्मी रहते थे। उनके घर की भद्र महिला बाहर निकली और उन्होंने तुतुल के माता-पिता को ख़बर दी। तब तुतुल की तरफ़ देखने पर, मणिपुरी भद्र महिला ने उस रिक्शावाले से सारी बात पूछी और तुतुल के माता-पिता को घटना समझाई। उस दिन तुतुल के माता-पिता ने अश्रुपूर्ण आँखों से भगवान का शुक्रिया अदा किया कि उनकी बेटी को एक बहुत बड़ी विपत्ति से बाल-बाल बचा लिया गया। उस सज्जन व्यक्ति और उस रिक्शावाले के रूप में आए 'भगवान' को वे ज़िंदगी भर नहीं भूले।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

बंगलुरू

अंधेरा या रोशनी

लोग कहते हैं—काली अँधेरी रात बीत जाएगी, सुबह की पहली किरण के साथ खुशियाँ आएगी। अँधेरी रात शायद किसी को पसंद नहीं आती, मगर यह रात मुझे बहुत ह...