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Tuesday, February 24, 2026

अंधेरा या रोशनी

लोग कहते हैं—काली अँधेरी रात बीत जाएगी,

सुबह की पहली किरण के साथ खुशियाँ आएगी।

अँधेरी रात शायद किसी को पसंद नहीं आती,

मगर यह रात मुझे बहुत है भाती।

यह घुप घनेरी रातें, परिंदों को भी सुहाती हैं,

नए जीवन की तैयारी और विश्राम लाती हैं।

यही काली रातें प्रकृति को सृजन का मौका देती हैं,

थकी हुई सृष्टि को सुकून का झोंका देती हैं।

यह अँधेरी रातें उन्हीं को रास आती हैं,

जिनकी आँखें सितारों को तलाश पाती हैं।

सुकून की चादर बनकर आती हैं यह रातें,

चुपके से मिलने वालों के लिए सौगात हैं यह रातें।

यह रातें उनके लिए, जो रजाई में सिमट सपने देखते हैं,

उन शरारती बच्चों के लिए, जो पढ़ाई का बोझ फेंकते हैं।

यह रातें उन माँओं के लिए, जो थककर चूर सोती हैं,

अँधेरे की गोद में ही सच्ची शांति की बीज बोती हैं।

मगर आज हर गली-मोहल्ला, कृत्रिम रोशनी से चकाचौंध है,

इस बनावटी उजाले में, कुदरत की हर धड़कन मौन है।

टिमटिमाते खूबसूरत तारे इस नकली चमक में खो गए,

चाँदनी भी फीकी पड़ गई, जैसे सब जुगनू सो गए।

सृजन, सुकून और शांति को निगल रही यह बनावटी रोशनी,

सहवास और सहजता को कुचल रही यह दिखावटी रोशनी।

अब बताओ—अँधेरी रातें चाहिए या ऐसी रोशनी?

रोशनी चाँद की हो या सूरज की—भली लगती है,

रोशनी दीये की हो या मोमबत्ती की—भली लगती है।

ढेबरी की रोशनी हो या अलाव की, फिर भी कोई अर्थ है,

मशाल की हो या जलते वन की, फिर भी कोई अर्थ है।

मगर इस कृत्रिम प्रकाश का कोई सार नहीं,

इस बनावटी उजाले में जीवन का आधार नहीं।

इससे तो भली वह घनेरी अँधेरी रातें ही हैं,

जिनमें प्रकृति की सच्ची और पावन बातें ही हैं।

अब तुम ही कहो, तुम्हें क्या चाहिए—

अँधेरी रातें या यह अर्थहीन रोशनी?


Monday, February 16, 2026

न्याय का आंगन

 


अगरतला कृष्ण नगर की एक पुरानी हवेली की मुंडेर पर बैठी गौरैया भी शायद जानती थी कि रमेशकांति बाबू के घर की चाय में मिठास से ज्यादा कड़वाहट घुली होती है। सुबह की पहली किरण के साथ ही रसोई से बर्तनों की खनक नहीं, बल्कि रमा देवी के तीखे स्वर गूंजने लगते थे। "मंटू! अरे ओ मंटू! अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा? देख, शानटू को दफ्तर जाना है, उसके लिए गरम पानी चढ़ा दिया या नहीं? खुद तो बस सांड की तरह पड़ा रहता है।" मंटू, जिसका स्वभाव शांत जल की तरह गहरा था, बिना कुछ कहे अपनी चादर समेटकर बाहर आया। वह खुद भी एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छी नौकरी करता था और सुबह की शिफ्ट के लिए उसे भी निकलना था, पर घर के अनुशासन का बोझ सिर्फ उसके कंधों पर था। उसने अपनी सौतेली मां की आंखों में झांकने की कोशिश भी नहीं की, क्योंकि वहां उसे बचपन से ही अपने लिए सिवाय एक ठंडी उपेक्षा के कुछ और नहीं मिला था। अपनी सगी मां के गुजर जाने के बाद उसने इसी पत्थर की मूरत को 'मां' पुकारा था, पर रमा देवी के लिए ममता का अर्थ सिर्फ उनका अपना बेटा शानटू था।

रमेशकांति बाबू, जो कभी पूरे कृष्ण नगर के रसूखदार व्यक्ति थे, अब एक व्हीलचेयर तक सिमट कर रह गए थे। विकलांगता ने उनके शरीर को तो जकड़ा ही था, शायद उनकी जुबान पर भी रमा देवी के दबदबे का ताला जड़ दिया था। बरामदे में बैठे वह मंटू को बाल्टी भरकर पानी ले जाते देखते, तो उनकी आंखें नम हो जातीं। तभी रसोई से रमा देवी का स्वर फिर उभरा, "जयश्री बहू, जरा शानटू के लिए बादाम वाला दूध ले जा, बेचारा रात भर फाइलें देखता रहा है। और मनस्री, तू खड़ी क्या देख रही है? जा, आंगन की सफाई कर, मंटू की पगार तो बस घर के राशन और बिजली के बिलों में ही उड़ जाती है, कम–से–कम काम तो ढंग से करे।" मनस्री, जो मंटू की पत्नी थी, अपनी सास के इस भेदभाव को रोज पीती थी। वह जानती थी कि शानटू भी कमाता है, पर उसकी कमाई रमा देवी 'भविष्य' के नाम पर तिजोरी में जमा करवा लेती थीं, जबकि घर का एक-एक ढेला मंटू की जेब से निकलता था।

एक शाम जब मंटू दफ्तर से थका-हारा लौटा, तो शानटू दबे पांव उसके कमरे में आया। "भाई, यह रख लीजिए," शानटू ने धीरे से कुछ नोट मंटू की जेब में डालते हुए कहा। मंटू ने चौंककर उसे देखा, तो शानटू ने नजरें झुका लीं, "मां को पता चला तो फिर क्लेश होगा। वह कहती हैं कि मेरा पैसा मेरा है और आपका पैसा 'हमारा' है। मुझे अच्छा नहीं लगता कि सारा बोझ आप उठाएं, पर घर की शांति के लिए मैं चुप रहता हूँ।" मंटू ने छोटे भाई के सिर पर हाथ फेर दिया। वह जानता था कि शानटू बुरा नहीं है, बस वह मां की जिद और भाई के सम्मान के बीच फंसा हुआ है। लेकिन यह लुका-छिपी का खेल ज्यादा दिन चलने वाला नहीं था। मनस्री यह सब देख रही थी और उसके भीतर एक ज्वालामुखी पक रहा था।

घर में तनाव की एक महीन लकीर तब और खिंच गई जब रात के खाने पर मेज सजी। रमा देवी ने बड़े चाव से शानटू की थाली में घी परोसा, जबकि मंटू की थाली की तरफ देखा तक नहीं। रमा देवी ने बात शुरू की, "मंटू, इस महीने तेरे पिताजी  की फिजियोथेरेपी का खर्च बढ़ गया है, और जयश्री के लिए कुछ गहने भी लेने हैं। तुम्हारी तनख्वाह में से कुछ बचेगा या सब मनस्री के मायके भेजने का प्लान है?" मनस्री का धैर्य जवाब दे गया। उसने एक तीखी नजर अपनी सास पर डाली और अपने कमरे से एक पुरानी लोहे की डिबिया ले आई। उसने उसे मेज पर पटक दिया।

 "यह क्या है मनस्री?" मंटू ने पूछा। मनस्री की आंखों में दृढ़ता थी, "यह आपकी मेहनत की वो ढाल है जो मैंने आपकी पगार के उस छोटे से हिस्से से बचाई थी जिसे आपने कभी मां जी को नहीं बताया था। और मां जी, आप फिजियोथेरेपी की बात करती हैं? पिछले तीन महीनों से बाबूजी के इलाज का पैसा ये दे रहे हैं। इस वजह से उनके पास एक भी पैसा नहीं बचता था। ये तो भला हो शानटू दा का कि वे  छुपकर भाई को कुछ पैसे दे रहे थे क्योंकि आपकी ममता ने बड़े बेटे को सिर्फ एक एटीएम मशीन समझ लिया है।"

हवेली के हॉल में सन्नाटा पसर गया। रमा देवी का चेहरा सफेद पड़ गया जब उन्हें पता चला कि उनका 'आज्ञाकारी' लाडला बेटा भी मंटू की मदद कर रहा है। रमेशकांति बाबू की व्हीलचेयर अचानक आगे बढ़ी। उनकी आवाज में आज सालों बाद वह पुरानी कड़क थी। उन्होंने रमा देवी की ओर देखा और बोले, "रमा, मैंने अपनी विकलांगता के कारण तुम्हारी ज्यादतियों पर आंखें मूंद ली थीं, पर इसका मतलब यह नहीं था कि मैं अंधा था। मंटू मेरा बेटा है, और उसने इस घर के लिए जितना किया, उतना शायद मैं भी न कर पाता। तुम्हारी यह दोगली मानसिकता इस घर की ईंटें हिला रही है। तुम शानटू की कमाई को जोड़ती रही और मंटू को निचोड़ती रही, पर देखो, खून के रिश्ते फिर भी एक रहे।"

रमेशकांति बाबू ने मंटू को अपने पास बुलाया और उसके हाथ में हवेली के पिछले हिस्से के कागजात रख दिए, जो पूरी तरह स्वतंत्र और आलीशान था। "मंटू, बेटा, तूने मेरा और इस औरत का बहुत सम्मान कर लिया। अब वक्त है कि तू अपनी गृहस्थी शांति से जिए। यह हिस्सा तुम्हारा है। आज से तुम और मनस्री अपनी मर्जी के मालिक हो। वहां रसोई भी अलग होगी और हिसाब भी।" रमा देवी ने विरोध करना चाहा पर रमेशकांति ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया, "तुम्हारे लाड ने शानटू को समझदार तो बनाया, पर मंटू को पराया कर दिया। अब इसी शानटू के साथ रहो और देखो कि बिना मंटू के ये घर और तुम्हारी तिजोरी कैसे चलती है।" मंटू की आंखों में आंसू थे, पर इस बार सुकून के। शानटू ने आगे बढ़कर बड़े भाई के पैर छुए, यह जताते हुए कि दीवारें भले खिंच जाएं, पर भाइयों का प्रेम नहीं बंटेगा।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती

Wednesday, February 4, 2026

मिसेज खम्बानी की 'सुनहरी' सनक

 


मिसेज खम्बानी, एक ऐसी महिला थीं, जिनका जीवन 'गोल्ड' के इर्द-गिर्द घूमता था, लेकिन अजीबोगरीब तरीके से। उनके लिए, "गोल्ड" केवल एक धातु नहीं, बल्कि एक जीवनशैली थी, जो उनके किराने की लिस्ट से शुरू होती थी। वह किसी भी ब्रांड का सामान नहीं खरीदती थीं, जब तक उस पर 'गोल्ड' का लेबल न चिपका हो – टाटा टी गोल्ड, मेरी गोल्ड बिस्कुट, फॉर्च्यून गोल्ड तेल, यहां तक कि उनके डिटर्जेंट पर भी "सर्फ एक्सेल गोल्ड" लिखा होता था (हालांकि ऐसा कोई ब्रांड था नहीं, ये सिर्फ उनकी कल्पना थी)।
मोहल्ले में उनकी इस 'गोल्ड' वाली सनक की चर्चा आम थी। अक्सर दोपहर की किटी पार्टियों में, मिसेज खम्बानी अपनी पड़ोसनों को बतातीं, "अरे सुनिए, हमारे यहां तो सिर्फ गोल्ड वाला ही सामान आता है। और ये जो फॉर्च्यून गोल्ड का तेल है ना, इससे बनी पकौड़ियों का स्वाद ही कुछ और होता है!" उनकी पड़ोसनें, जो अमूमन अपने पतियों की कमाई के हिसाब से हिसाब-किताब रखती थीं, उन्हें बड़े विस्मय से देखतीं। आखिर मिसेज खम्बानी के पति, बेचारे खम्बानी जी, एक स्थानीय नेताजी के दफ्तर में मामूली क्लर्क थे। नेताजी के नाम का रौब तो था, लेकिन खम्बानी जी की तनख्वाह उतनी ही 'गोल्ड' थी, जितनी एक साधारण मिडिल क्लास आदमी की हो सकती है – यानी नाम मात्र की।
इस 'गोल्ड' प्रेम की वजह से मोहल्ले में एक गलतफहमी फैल गई थी। सबको लगता था कि खम्बानी जी के पास अथाह दौलत है, या शायद वो नेताजी का काला धन संभालते हैं। ये बात धीरे-धीरे चोरों के गिरोह तक भी पहुँच गई। उनका सरगना, लाला लंगड़ा, जो अपनी एक टांग से लंगड़ाने के बावजूद चोरी में पीएचडी था, उसने अपने गुर्गों के साथ मीटिंग बुलाई। "भाई, सुना है खम्बानी के घर में सोना ही सोना है। 'गोल्ड' से कम कुछ नहीं खरीदते वो।"
ठीक उसी समय, प्रवर्तन निदेशालय (ED) के कानों तक भी ये खबर पहुँच गई। एक गुमनाम शिकायत मिली थी कि नेताजी का सारा काला धन खम्बानी के घर में छिपा है, क्योंकि उनकी पत्नी 'गोल्ड' के सिवा कुछ नहीं खरीदती। ED के अधिकारी, मिस्टर तेजपाल, जो अपनी कड़क छवि और तेज दिमाग के लिए जाने जाते थे, उन्होंने तुरंत एक टीम खम्बानी निवास की ओर रवाना कर दी।
एक रात, जब चारों ओर सन्नाटा पसरा था, लाला लंगड़ा का सबसे फुर्तीला चोर, चीकू, खम्बानी के घर में सेंध लगाने पहुंचा। उसने बड़ी चालाकी से पिछली दीवार फांदी और बालकनी तक पहुँच गया। लेकिन किस्मत का खेल देखिए! मिसेज खम्बानी ने अपनी नई "गोल्ड" साड़ी (जिसे उन्होंने सेल में ख़रीदा था, जिस पर 'गोल्डन ऑफर' लिखा था) बालकनी में सूखने के लिए डाली हुई थी। चीकू ने जैसे ही छलांग लगाई, वह साड़ी में उलझ गया। साड़ी भी ऐसी कि एकदम नई और मजबूत! चीकू उसमें फँस गया, और फिर फिसलकर बालकनी और दीवार के बीच की पतली सी जगह में जा फँसा, जहां से निकलना असंभव था।
रात भर चीकू वहीं फंसा रहा, "बचाओ! बचाओ!" चिल्लाता रहा। सुबह जब मिसेज खम्बानी अपनी मॉर्निंग वॉक से लौटीं, तो उन्हें बालकनी से अजीब आवाजें सुनाई दीं। उन्होंने देखा, चीकू बुरी तरह फंसा हुआ है। मोहल्ले के लोग इकट्ठा हुए, किसी तरह दीवार तोड़कर बेचारे चीकू को बाहर निकाला गया। मिसेज खम्बानी, अपने चिर-परिचित अंदाज़ में, उसे अंदर ले गईं और गरमा-गरम टाटा टी गोल्ड की चाय और मेरी गोल्ड बिस्कुट खिलाए। "बड़ा बुरा हुआ बेटा, तुमने चोरी करने की क्यों सोची? देखो, भगवान ने तुम्हें सजा दी।"
इस घटना की चर्चा मोहल्ले में आग की तरह फैल गई। ठीक इसी समय, ED की टीम भी खम्बानी निवास पहुँच गई। मिस्टर तेजपाल ने कड़क आवाज़ में पूछा, "मिस्टर खम्बानी, हमें सूचना मिली है कि आपके घर में काला धन है।"
खम्बानी जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वह जानते थे कि उनकी पत्नी की 'गोल्ड' वाली सनक ने उन्हें मुसीबत में डाल दिया है। मिसेज खम्बानी, हमेशा की तरह, मुस्कुराते हुए बोलीं, "अरे साहब! काला धन? हमारे घर में तो सब कुछ गोल्ड है!" उन्होंने बड़े गर्व से टाटा टी गोल्ड की चाय और मेरी गोल्ड बिस्कुट पेश किए। "और फॉर्च्यून गोल्ड तेल में तले गरमा-गरम पकौड़े भी बनाए हैं।"
मिस्टर तेजपाल और उनकी टीम ने चाय, बिस्कुट और पकौड़े खाए। उन्हें घर में कहीं भी कोई काला धन नहीं मिला। मिसेज खम्बानी ने हर एक गोल्ड-ब्रांडेड चीज़ को बड़े उत्साह से दिखाया – डिटर्जेंट से लेकर टूथपेस्ट तक।
खम्बानी जी गुस्से से लाल थे। जैसे ही ED वाले चले गए, वह अपनी पत्नी पर भड़क पड़े, "तुम! तुम्हारी इस गोल्ड वाली सनक ने हमारी नाक कटवा दी! पहले चोर फँसा, अब ED वाले आ गए! क्यों करती हो ऐसा?"
मिसेज खम्बानी मासूमियत से बोलीं, "अरे मैंने तो सोचा था कि इससे अपना रुतबा बढ़ेगा! अब देखो, ED वाले भी हमारे यहां चाय-नाश्ता कर गए।"
मिस्टर तेजपाल और उनकी टीम अपने दफ्तर लौट रहे थे। गाड़ी में बैठे-बैठे मिस्टर तेजपाल मुस्कुराए। "लगता है, इस बार हमें 'गोल्ड' की बजाय 'गोल्डन' सबक मिल गया। काला धन नहीं, बस एक महिला का 'गोल्ड' प्रेम!"

Tuesday, February 3, 2026

मध्यम वर्ग का "गोल्ड" मेडल

 




बाज़ार में सोने के भाव ने, छुआ है आसमान,

पर हमारी गृहणियों का देखो, निराला है स्वैग और शान।

तिजोरी भले ही खाली हो, पर घर में 'गोल्ड' की खान है,

हर मध्यमवर्गीय नारी आज, बनी 'गोल्ड' की सुल्तान है!

सुबह की शुरुआत होती है, टाटा टी गोल्ड की चुस्की से,

पति को चाय पिलाती हैं, बड़ी ही चालाकी और फुर्ती से।

पड़ोसन से कहती हैं, "बहन, हम तो रोज़ सोना पीते हैं,"

भले ही फटे हुए बनियान में, पतिदेव हमारे जीते हैं!

नाश्ते में परोसा जाता है, मारी गोल्ड का बिस्कुट कड़क,

बच्चे खाते हैं 'सोना', उनकी सेहत में आती है धड़क।

मम्मी कहती हैं शान से, "देख बेटा, हम कितने रईस हैं,

हर सुबह बिस्कुट के पैकेट में, गोल्ड की बीस पीस हैं!"

दोपहर को जब सताती है, कमज़ोरी और थोड़ी थकान,

तो च्यवनप्राश गोल्ड खाकर, बढ़ाती हैं अपनी जान।

सासू माँ को भी खिलाती हैं, ताकि उनका गुस्सा शांत रहे,

सोना रग-रग में दौड़ेगा, तो शायद जुबान भी लगाम रहे!

हाथ पोंछने को भी अब, आम कागज़ नहीं भाता है,

रॉयल गोल्ड टिश्यू पेपर ही, डाइनिंग टेबल पर आता है।

खाना बनता है फॉर्च्यून राइस ब्रान गोल्ड के तेल में,

पूरी फैमिली लगी हुई है, इस 'गोल्डन' हेरा-फेरी के खेल में!

ईडी (ED) वाले भी आए, तो बेचारे चकरा कर लौट जाएँगे,

रसोई के डिब्बों में उन्हें, सिर्फ 'गोल्ड' ही 'गोल्ड' नज़र आएँगे।

अधिकारी सोचेंगे, "इतना सोना? पर ज़ब्त कैसे करें भाई?

ये तो विम लिक्विड गोल्ड है, जिससे होती बर्तनों की सफाई!"

पति बेचारा खड़ूस है, और बच्चे थोड़े शैतान हैं,

सास-ससुर की सेवा में, निकले इनके प्राण हैं।

पर इन महिलाओं का हक है, ये 'गोल्ड' वाला अधिकार,

जब असली सोना पहुँच से बाहर, तो किराना ही सही यार!

शौक बड़ी चीज़ है भाई, चाहे वो कागज़ का ही सोना हो,

भारतीय नारी का जलवा है, चाहे घर का कोई कोना हो।

तो बोलो जोर से, मध्यम वर्ग की जीत हमेशा जारी है,

असली सोने पर भारी, अपनी 'ग्रोसरी गोल्ड' वाली नारी है!


Monday, February 2, 2026

लोहितपुर की चाँदनी रात और एक अधूरी प्रेम कथा

 


साल 1999 अरुणाचल प्रदेश की वादियों में बसा लोहितपुर किसी कवि की कविता जैसा सुंदर था। असम राइफल्स कैंपस के बाहर का एक छोटा सा बाज़ार था और उसके आस-पास की ढलानें। दूर दूर तक सुंदर पहाड़ियों से घिरा, जब रात होती, तो ऐसा लगता मानो आसमान ज़मीन पर उतर आया हो। लोहितपुर की हवा में एक खास किस्म की ताज़गी थी। चाँदनी रातों में जब सफेद और गुलाबी बोगनवेलिया के गुच्छे और आड़ू के पेड़ों की टहनियाँ चाँद की रोशनी में नहाती थीं, तो पूरा मोहल्ला चाँदी की चादर ओढ़े हुए सा लगता था। इसी शुद्ध और शीतल वातावरण में सुनील और रेखा के प्रेम की खुशबू महकी थी।

सुनील के पिता, जिन्हें सब 'मारवाड़ी अंकल' कहते थे, बाज़ार के प्रतिष्ठित व्यापारी थे। वहीं रेखा के पिता, एक मेहनती नेपाली प्रवासी, जो घर-घर दूध पहुँचाकर अपना गुज़ारा करते थे। दोनों परिवार एक ही मोहल्ले में रहते थे, इसलिए जान-पहचान पुरानी थी। रेखा अक्सर दूध देने सुनील के घर आती और वहीं छिपकर दोनों की नज़रें मिल जातीं।
 गर्मी के दिन रात को बिजली चली जाती तो अक्सर लोग चांदनी का मज़ा लेने और खुली हवा में टहलने निकलते तो रेखा और सुनील भी चोरी छिपे एक दूसरे से मिलने की कोशिश करते। 
तो कभी सुनील अपने आँगन में बैठता और रेखा खुले आसमान में चमकते तारों को देखने के बहाने अपनी बालकनी से उसे निहारती। दोनों के घर आस पास एक स्थानीय अरुणाचली के घर के ऊपर वाले हिस्से में था। वे किराए पर रहा करते थे। जब भी रेखा सुबह स्कूल जाने के बहाने उसके घर के सामने से होकर गुजरती तो सुनील अपने घर में टैप रिकॉर्डर में फिल्मी गीत बजाता ताकि रेखा को पता चले कि उसके मन में क्या है। उस वक्त रेडियो और कैसेट ही एक मात्र प्रेमियों का सहारा हुआ करता था। एक रात बिजली चले जाने पर बहने से सुनील घर से निकला और रेखा से चुपके से मोहल्ले के पीछे बोगनवेलिया के पेड़ के नीचे मिला तो दबी आवाज़ में कहा था, "रेखा, ये तारे गवाह हैं, मेरा प्रेम इन पहाड़ों की तरह अटल है।" रेखा बस मुस्कुरा दी थी, पर उसकी आँखों में अनजाना डर था।

कहते हैं प्रेम और खुशबू छुपते नहीं। जब सुनील की माँ को भनक लगी कि उनका बेटा एक 'दूध बेचने वाले' की बेटी से दिल लगा बैठा है, तो उनका मारवाड़ी स्वाभिमान जाग उठा। वे सीधे रेखा के घर जा पहुँचीं।
मोहल्ले के बीचों-बीच सुनील की माँ ने रेखा की माँ को खरी-खोटी सुनानी शुरू कर दी। सुनील की माँ चिल्लाकर बोली, "तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी बेटी को मेरे बेटे के पीछे लगाने की? हम ठहरे ऊँचे खानदान के व्यापारी और तुम लोग परदेसी दूधवाले! अपनी औकात देख ली होती।"
रेखा की माँ ने हाथ जोड़कर कहा, "भाभी, बच्चा लोग गलती किया मेरे को क्या मालूम? ऐसा आप क्यों बोलता है, आपका लड़का भी मेरा लड़की को बिगाड़ा है। मेरा बेटी ऐसा नहीं करता आपका लड़का प्यार करता है मेरा बेटी को तो मेरा बेटी क्या करेगा? आप अपना लड़का को संभालो।"
पर सुनील की माँ कहाँ रुकने वाली थीं? उन्होंने पूरे मोहल्ले के सामने रेखा के चरित्र पर सवाल उठा दिए। रेखा अपने घर के कोने में दुबककर रो रही थी, जबकि बाहर उसके परिवार का मान-सम्मान धूल में मिलाया जा रहा था। इस झगड़े ने दोनों परिवारों के बीच नफरत की एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसे लाँघना नामुमकिन था। इधर रेखा की मां उसे दो थप्पड़ लगाकर डांट कर अपने घर के अन्य कामों में लग जाती है।

वही सुनील के पिता ने तुरंत अपने एक मारवाड़ी दोस्त की बेटी से सुनील का रिश्ता पक्का कर दिया। वे लोग लोहित पुर से अपने गांव चले जाते हैं। जाने से पहले भी सुनील ने किसी तरह रेखा से मिलने की कोशिश की थी और उसे वादा किया था कि वह शादी नहीं करेगा और लौट कर उसी के लिए आयेगा। मगर ऐसा न हुआ। सुनील की शादी तय हुई और उसे अपने पिता के आदेश अनुसार शादी भी करनी पड़ी। शादी का दिन तय हुआ—दिसंबर की एक सर्द रात। पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था, पर सुनील के अंदर अंधेरा था।
जब सुनील को दूल्हा बनाकर आईने के सामने खड़ा किया गया, तो उसने खुद को नहीं, बल्कि उस हारते हुए प्रेमी को देखा जिसने वादा किया था। बाहर ढोल-नगाड़े बज रहे थे, पर सुनील को सिर्फ रेखा की सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं। जैसे ही उसने सेहरा बाँधा, उसकी आँखों से एक आँसू टपक कर उसकी शेरवानी पर जा गिरा।
सुनील के पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा और सख्त लहजे में कहा: "आज अपनी ज़िद छोड़ और कुल की मर्यादा रख। वह लड़की हमारे लायक नहीं थी।"

सुनील ने बेबसी में सिर झुका लिया। वह अपनी ही शादी में एक चलते-फिरते शव जैसा लग रहा था। जब उसने अग्नि के फेरे लिए, तो उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ सात फेरे नहीं ले रहा, बल्कि रेखा की उम्मीदों की चिता जला रहा है।

इधर रेखा सुनील के इंतज़ार करके लगी। उसकी हालत बिगड़ने लगी। जिस रास्ते से शहर के बाहर जाने का रास्ता था, रेखा घंटों वहीं खड़ी रहती। वह बोगनवेलिया के उन फूलों को नोचती और पूछती, "क्या ये आज भी चाँदी के दिखते हैं? सुनील कहाँ है?"

उसका प्रेम इतना गहरा था कि विछोह ने उसके मानसिक संतुलन को हिला दिया। वह कभी हँसती, कभी रोती और कभी एकदम खामोश हो जाती। लोहितपुर के उसी खूबसूरत बाज़ार में वह अब एक 'पागल लड़की' बन चुकी थी।
उसके पिता, जो कभी गर्व से अपनी नेपाली टोपी पहनकर चलते थे, अब सिर झुकाकर चलते थे। अपनी इकलौती बेटी की यह दशा उनसे देखी नहीं गई। एक सुबह, जब लोहितपुर की पहाड़ियों पर कोहरा छाया हुआ था, रेखा के पिता ने अपना थोड़ा-बहुत सामान और अपनी बेसुध बेटी को लिया और उसे इलाज के लिए वापस नेपाल ले जाने का फैसला किया।
जाते वक्त रेखा ने एक बार पीछे मुड़कर उन आड़ू के पेड़ों को देखा, जो अब बिना फूलों के ठूँठ लग रहे थे। लोहितपुर की वह चाँदनी रात अब उसकी ज़िंदगी में कभी नहीं लौटने वाली थी। सुनील की मजबूरी और रेखा की खामोशी लोहितपुर की उन पहाड़ियों में आज भी दफन है।

डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 


जंगल और बस्ती की जंग



सिमट रहा है जंगल अब,

गहरा उसका दुख है,

पशु-पक्षी बेघर हुए,

कैसा यह कलयुग है?

दूजी तरफ है भीड़ बड़ी,

इंसान को घर की प्यास है,

जहाँ दिखा थोड़ा जंगल,

वहाँ बस्ती की आस है।

चलती रस्सा-कस्सी दोनों में,

निर्दोष मारे जाते हैं,

कभी जानवर, कभी गरीब,

बिना वजह दुख पाते हैं।

बीच में बैठा स्वार्थी मानव,

अपनी लालसा बुनता है,

विकास का देकर नाम सिर्फ,

अपना फायदा चुनता है।

तहस-नहस सब कर देता वह,

करता सबकी अनदेखी,

लेकिन प्रकृति लिखती है,

एक भयंकर नयी लेखी।

जब क्रोध में आती कुदरत है,

तब सबक बड़ा सिखाती है,

इंसान की हर एक अकड़ को,

मिट्टी में मिलाती है।


डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती 

बेंगलुरू

পহলগাম

বাসর সেজে ছিল শুলো তে,
বাইশে ধোঁয়ায় চেয়েগেলো,
উত্তপ্ত বাতাস, এর সাথে,
কত সুহাগন সঁপে দিলো সিঁদুর,
বিধির বিধান এমন কেনো ছিল,
পেহেলগাম, নিদারণ আত্ত চিৎকার,
চারিদিকে বিশ্ব জুড়ে প্রতিবাদ ঝড়,
জীবন কাটে এমনি সুকায় অশ্রুজল,
জবাব নাই বোবার চাহনি লোকের,
অপরাধ কি বল এই কি রে বাস্তব?
এত্ত উন্মত্ততা কেড়ে নিল প্রাণ
বিচার করি কি বিচার এর করি,
প্রাণ কাঁদে অশ্রু ঝরে সান্তনা হারায়।

লেখিকা শ্রীমতী অনিতা চক্রবর্তী


अंधेरा या रोशनी

लोग कहते हैं—काली अँधेरी रात बीत जाएगी, सुबह की पहली किरण के साथ खुशियाँ आएगी। अँधेरी रात शायद किसी को पसंद नहीं आती, मगर यह रात मुझे बहुत ह...